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यूं ही नहीं माने सुशासन बाबू! सीएम का पद छोड़ने के लिए नीतीश कुमार ने रखी ये पांच शर्तें!

बिहार की राजनीति में विकास को एजेंडा बनाने वाले नीतीश कुमार ने सत्ता छोड़ने से पहले पांच प्रतिज्ञाओं का विजन रखा था. अब सवाल है कि नई सरकार इन वादों को उसी प्राथमिकता से आगे बढ़ाएगी या नहीं.

Nitish Kumar five conditions Bihar promises
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( Image Source:  ANI )

करीब दो दशक तक नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार की राजनीति में “सुशासन” और विकास का मॉडल चर्चा में रहा. अब जब नीतीश कुमार सक्रिय राज्य राजनीति से धीरे-धीरे पीछे हटने की ओर बढ़ते दिख रहे हैं और राज्यसभा के लिए नामांकन भर चुके हैं, तब उनकी विरासत को लेकर नई बहस शुरू हो गई है. 2005 से हर चुनावी मंच पर वह बिहार को विकसित बनाने के लिए अपनी “पांच प्रतिज्ञाओं” का जिक्र करते रहे, हर घर नल का जल और पक्की गली-नाली, भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस, युवाओं को रोजगार, महिलाओं का सशक्तिकरण और स्वास्थ्य-शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना. अब नई सरकार के गठन की प्रक्रिया के बीच उन्होंने एक अहम राजनीतिक शर्त भी रखी है कि गृह मंत्रालय जेडीयू के पास ही रहे. ऐसे में पटना से लेकर गांवों की चौपालों तक यह सवाल उठ रहा है कि क्या आने वाली सरकार नीतीश के इन विकास वादों और राजनीतिक संतुलन को उसी तरह आगे बढ़ा पाएगी.

क्यों चर्चा में है नीतीश कुमार की राजनीतिक विदाई?

करीब दो दशकों तक नीतीश कुमार ने बिहार की राजनीति में विकास और सुशासन को केंद्र में रखकर अपनी पहचान बनाई. अब संकेत मिल रहे हैं कि वह सक्रिय राज्य राजनीति से पीछे हटते हुए नई सरकार को मार्गदर्शन देने की भूमिका में रहेंगे. 2005 से लेकर हाल के वर्षों तक चुनावी सभाओं में उनका एक ही संदेश बार-बार सुनाई देता था, बिहार को विकसित बनाने के लिए पांच मूल प्रतिज्ञाओं से समझौता नहीं होगा. इसी सोच के साथ उन्होंने विकास का एक ढांचा तैयार किया, जिसे उनकी राजनीति की आधारशिला माना जाता है. अब जब वे राज्यसभा की ओर बढ़ रहे हैं और पटना के 1 अणे मार्ग पर नए मुख्यमंत्री के चयन की चर्चा तेज है, तब राज्यभर में यह सवाल उठ रहा है कि क्या अगली सरकार भी उसी विजन को जारी रखेगी.

‘विकसित बिहार के लिए पांच प्रतिज्ञा’ का विचार क्या था?

नीतीश कुमार ने बिहार की राजनीति में बुनियादी सुविधाओं और सामाजिक विकास को प्राथमिकता देते हुए “पांच प्रतिज्ञा” का खाका रखा था. इस योजना का उद्देश्य राज्य में बुनियादी ढांचे को मजबूत करना, युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करना और सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देना था. सरकार की दलील रही कि अगर पानी, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे क्षेत्रों में लगातार निवेश किया जाए तो राज्य की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में दीर्घकालिक सुधार संभव है. यही कारण था कि इन प्रतिज्ञाओं को सिर्फ चुनावी वादे नहीं बल्कि विकास की रणनीति के रूप में प्रस्तुत किया गया.

'पांच प्रतिज्ञा या सियासी शर्तें, क्या है मामला?

1. हर घर नल का जल और पक्की गली-नाली से क्या बदलने की कोशिश हुई?

पहली प्रतिज्ञा का केंद्र बिंदु बुनियादी सुविधाएं थीं. “हर घर नल का जल” योजना के जरिए घर-घर तक सुरक्षित पेयजल पहुंचाने की पहल की गई. बिहार के कई जिलों में भूजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड की समस्या सामने आती रही है, इसलिए पाइपलाइन आधारित जल आपूर्ति को स्वास्थ्य सुरक्षा से भी जोड़ा गया. इसके साथ ही ग्रामीण और शहरी इलाकों में पक्की गलियां और नालियां बनाने का लक्ष्य तय किया गया. बरसात के मौसम में जलजमाव की समस्या कम करना, स्वच्छता बढ़ाना और गांवों में आवागमन आसान बनाना इस योजना का प्रमुख उद्देश्य रहा.

2. भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति क्यों अहम मानी गई?

सुशासन की पहचान बनाने के लिए नीतीश कुमार ने प्रशासनिक पारदर्शिता को अपनी राजनीति का प्रमुख आधार बनाया. इसी कारण उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाने की बात कही. सरकार का दावा रहा कि सरकारी योजनाओं में अनियमितता रोकने, दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई करने और निगरानी तंत्र को मजबूत करने के लिए विशेष व्यवस्थाएं की गईं. इस नीति का मकसद यह संदेश देना था कि शासन व्यवस्था में जवाबदेही और पारदर्शिता को प्राथमिकता दी जाएगी.

3. युवाओं को रोजगार और कौशल विकास पर क्यों दिया गया जोर?

बिहार की जनसंख्या में युवाओं की हिस्सेदारी काफी अधिक है, इसलिए रोजगार का सवाल हमेशा राजनीतिक बहस के केंद्र में रहा है. तीसरी प्रतिज्ञा के तहत सरकारी नौकरियों में भर्ती की प्रक्रिया तेज करने, कौशल विकास कार्यक्रमों को बढ़ाने और उद्योगों को आकर्षित करने पर जोर दिया गया. सरकार ने यह भी कहा कि अगर राज्य में कौशल प्रशिक्षण और उद्यमिता को बढ़ावा दिया जाए तो बड़ी संख्या में युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिल सकता है.

4. महिला सशक्तिकरण को विकास से कैसे जोड़ा गया?

नीतीश सरकार ने महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने को सामाजिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण आधार माना. पंचायत और स्थानीय निकायों में महिलाओं को 50 प्रतिशत तक आरक्षण देकर उन्हें नेतृत्व की भूमिका में लाने की कोशिश की गई. इसके अलावा सरकारी नौकरियों में भी महिलाओं को आरक्षण देने की नीति लागू की गई. इस पहल का उद्देश्य यह था कि महिलाएं सिर्फ मतदाता नहीं बल्कि शासन और निर्णय प्रक्रिया की सक्रिय भागीदार बनें.

5. स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में सुधार क्यों जरूरी माना गया?

पांचवीं प्रतिज्ञा स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने से जुड़ी थी. राज्य में मेडिकल कॉलेजों, अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए गए ताकि ग्रामीण इलाकों तक बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंच सकें. इसी तरह स्कूलों और उच्च शिक्षा संस्थानों के विस्तार पर भी ध्यान दिया गया. सरकार का तर्क रहा कि मानव संसाधन के विकास के बिना आर्थिक प्रगति संभव नहीं है, इसलिए शिक्षा और स्वास्थ्य पर निवेश को प्राथमिकता देना आवश्यक है.

सामाजिक संतुलन और भाईचारे की राजनीति का क्या महत्व रहा?

इसके अलावा, नीतीश कुमार अक्सर यह कहते रहे कि विकास तभी टिकाऊ हो सकता है जब समाज में शांति और आपसी विश्वास बना रहे. भाजपा के साथ गठबंधन में रहते हुए भी उन्होंने बिहार में सांप्रदायिक तनाव को सीमित रखने की कोशिश की. जेडीयू का एक बड़ा समर्थन आधार अल्पसंख्यक और उदारवादी मतदाताओं से भी जुड़ा रहा है, इसलिए सामाजिक संतुलन बनाए रखना उनकी राजनीति का अहम हिस्सा रहा.

नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?

अब जब राज्य की राजनीति नए चरण में प्रवेश कर रही है, तब सबसे बड़ी चुनौती इन प्रतिज्ञाओं को उसी गति से आगे बढ़ाने की होगी. नई सरकार को यह तय करना होगा कि विकास के जिन कार्यक्रमों को पिछले वर्षों में प्राथमिकता दी गई, उन्हें कैसे आगे बढ़ाया जाए. साथ ही रोजगार सृजन, शिक्षा और स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने की अपेक्षाएं भी बनी रहेंगी.

क्या ‘पांच प्रतिज्ञा’ बिहार की दीर्घकालिक विकास रणनीति बन सकती हैं?

इन प्रतिज्ञाओं को बिहार के विकास के एक दीर्घकालिक मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया गया था. बुनियादी ढांचे, रोजगार, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक सेवाओं को मजबूत करने की यह रणनीति राज्य के भविष्य से जुड़ी मानी जाती है. आने वाले वर्षों में इन योजनाओं के क्रियान्वयन की गति और प्रभाव ही यह तय करेंगे कि बिहार विकास की राह पर कितनी तेजी से आगे बढ़ पाता है.

बिहारनीतीश कुमार
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