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महारानी कामसुंदरी की अंतिम यात्रा में वारिसों के बीच मारपीट, दरभंगा के गौरवशाली राज का क्या रहा है इतिहास? Video

दरभंगा राज की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी का निधन 96 वर्ष की आयु में 12 जनवरी को हो गया. उनका निधन से मिथिला में शोक की लहर फैली है. उनके अंतिम संस्कार के दौरान परिवार में उत्तराधिकार और पारिवारिक मतभेद के कारण विवाद की वजह से अंतिम संस्कार के दौरान मारपीट भी हुई. इस घटना ने इस ऐतिहासिक राजवंश के आखिरी अध्याय को और जटिल बना दिया.

महारानी कामसुंदरी की अंतिम यात्रा में वारिसों के बीच मारपीट, दरभंगा के गौरवशाली राज का क्या रहा है इतिहास? Video
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दरभंगा राज, जो सोलहवीं सदी में स्थापित एक प्रभावशाली जमींदारी और सांस्कृतिक घराना था, का एक और शानदार अध्याय समाप्त हो गया है. महारानी कामसुंदरी देवी, जो अंतिम शासक महाराज कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी थीं, का 96 वर्ष की आयु में निधन हो गया. यह सिर्फ एक शाही हस्ती का निधन नहीं, बल्कि एक युग की समाप्ति का प्रतीक भी मानी जा रही है. हालांकि, उनके जीवनकाल में दया, संस्कृति और सामाजिक सेवा का संदेश फैलाया गया, पर उनकी अंतिम यात्रा को परिवार के बीच विवाद और मारपीट की झलक भी मिली. यह दर्शाता है कि आज भी दरभंगा राजघराने के उत्तराधिकार और संपत्ति को लेकर मतभेद हैं.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक वह 96 वर्ष की थीं और निसंतान थीं. इससे पहले दो अन्य महारानियों का भी निधन हो गया था. सूत्रों के अनुसार, महारानी कामसुंदरी की अंतिम यात्रा श्यामा माई मंदिर परिसर से निकाली जाएगी. श्यामा माई मंदिर परिसर, राजपरिवार का परंपरागत अंत्येष्टि स्थल है और शाही परिसर के भीतर स्थित है.

अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही थी कि उनके वारिसों के बीच संपत्ति विवाद ने तूल पकड़ लिया. अंतिम संस्कार कौन करेगा, इसको लेकर परिवार के दो गुटों के बीच मारपीट भी हुई, जिसे स्थानीय लोग दुखद घटना मान रहे हैं. कल दरभंगा राज की महारानी का देहांत हुआ. उसके बाद उनके अंतिम संस्कार को लेकर उनके दूर के रिश्तेदारों में इस तरह विवाद हुआ. यह बहुत दुखद है. अब उनकी संपत्ति को लेकर भी विवाद जन्म ले सकता है!

तीसरी और अंतिम पत्नी

दरभंगा रियासत के अंतिम महाराजा महाराजा कामेश्वर सिंह से विवाह किया था. वह उनकी तीसरी और अंतिम पत्नी थीं. कामसुंदरी देवी काफी उम्र तक जीवित रहीं और 2026 में लगभग 96 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ. दरभंगा राज के इतिहास में वे आखिरी शासक परिवार की महिला सदस्य थीं और उनके निधन को एक युग के अंत के रूप में भी देखा गया.

विवाद क्यों, किसने दी मुखाग्नि?

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अंतिम संस्कार के दौरान दरभंगा राज परिवार के सदस्यों के बीच उत्तराधिकार और संपत्ति से जुड़े मतभेदों के कारण विवाद हुआ. और कुछ लोगों के बीच मारपीट भी हुई. इसी मौके पर उनके पोते रत्नेश्वर सिंह ने महारानी को मुखाग्नि दी.

समाज में उनकी छवि

कामसुंदरी देवी को उनके सादगी, दया, शिक्षा के प्रति समर्पण और सामाजिकता के लिए याद किया जाता है. उन्होंने शाही जीवन को पारंपरिक शोहरत से ऊपर रखकर समाज सेवा को प्राथमिकता दी. महारानी ने महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह के नाम से कल्याणी फाउंडेशन की स्थापना की. इस फाउंडेशन के तहत एक विशाल पुस्तकालय स्थापित किया गया जिसमें 15,000 से अधिक पुस्तकें हैं, जिसे छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए खुला रखा गया.

दरभंगा राजवंश का इतिहास

दरभंगा राज भारत के बिहार में मिथिला क्षेत्र में स्थित एक प्रख्यात राजघराना या जमींदारी था, जिसकी शुरुआत 16वीं सदी के आसपास हुई थी और यह क्षेत्रीय रूप से बहुत शक्तिशाली रहा. इस राजवंश की सबसे प्रसिद्ध और प्रभावशाली शख्सियतों में से एक महाराजा कामेश्वर सिंह थे, जो 20वीं सदी के मध्य में दरभंगा के अंतिम शासक रहे. दरभंगा राज ने शिक्षा, संस्कृति और समाज के विकास में बड़ा योगदान दिया. विश्वविद्यालय, शोध संस्थान, पुस्तकालय और औद्योगिक परियोजनाओं के माध्यम से. औपचारिक जमींदारी प्रणाली के अंत के बाद भी इस परिवार का सामाजिक असर बना रहा, लेकिन अब यह केवल इतिहास का हिस्सा बन चुका है.

महारानी कामसुंदरी देवी

महारानी कामसुंदरी देवी का जन्म 1930 में हुआ था. दरभंगा राज की अंतिम महारानी थीं और महाराजा कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी थीं. वे 96 वर्ष की आयु में निधन हुईं और उनका निधन एक युग के अंत जैसा माना गया, क्योंकि वे राजवंश की अंतिम जीवित शाही सदस्य थीं.

शिक्षा और संस्कृति

दरभंगा राज परिवार ने अनेक शिक्षा एवं सांस्कृतिक संस्थानों को दान और समर्थन दिया. इनमें विश्वविद्यालय भवन, पुस्तकालय और अनुसंधान संस्थान शामिल हैं. कामेश्वर सिंह संस्कृति विश्वविद्यालय और ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी उन्हीं की जमीन पर बनी है. आजादी के समय में कांग्रेस पार्टी को सबसे ज्यादा दरभंगा राज से ही मिलता था.

600 किलो सोना दान किया था

भारत–चीन युद्ध के समय देश की आवश्यकता के दौरान दरभंगा राज परिवार ने करीब 600 किलोग्राम सोना सरकार को दान किया, जिसमें महारानी की अगुवाई रही.

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