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क्या Bihar में करिश्माई नेताओं का दौर खत्म? ‘पोस्ट-करिश्माई पॉलिटिक्स’ पर छिड़ी नई बहस

बिहार की राजनीति लंबे समय तक करिश्माई नेताओं के इर्द-गिर्द रही, लेकिन अब नई पीढ़ी के उभार से बदलाव की चर्चा हो रही है. विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में राजनीति व्यक्तित्व के बजाय संगठन और नीतियों पर आधारित हो सकती है.

Bihar charismatic Leaders
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( Image Source:  ANI )

बिहार की राजनीति लंबे समय तक करिश्माई नेताओं के इर्द-गिर्ड घूमती रही है. कभी लालू प्रसाद यादव की जन अपील ने राजनीति को दिशा दी, तो बाद के दौर में नीतीश कुमार ने शासन और विकास के मुद्दों के साथ अपनी अलग पहचान बनाई. लेकिन अब बदलते राजनीतिक माहौल और नई पीढ़ी के नेताओं के उभार के बीच यह सवाल उठने लगा है कि क्या राज्य में ‘पोस्ट-करिश्माई पॉलिटिक्स’ का दौर शुरू हो रहा है, जहां राजनीति किसी एक बड़े नेता के बजाय संगठन, नीतियों और सामूहिक नेतृत्व के आधार पर आगे बढ़ेगी.

क्या ‘पोस्ट-करिश्माई पॉलिटिक्स’ का दौर शुरू हो गया?

बिहार की राजनीति लंबे समय तक करिश्माई नेताओं के इर्द-गिर्द घूमती रही है. कभी लालू प्रसाद यादव का प्रभाव रहा, तो बाद के दौर में नीतीश कुमार ने अपनी राजनीतिक शैली से राज्य की राजनीति को दिशा दी. लेकिन अब जब नई पीढ़ी के नेताओं की चर्चा बढ़ रही है और पुराने दिग्गजों का प्रभाव धीरे-धीरे सीमित होता दिख रहा है, तब यह सवाल उठने लगा है कि क्या बिहार में अब ‘पोस्ट-करिश्माई पॉलिटिक्स’ का दौर शुरू हो रहा है. यह अवधारणा राजनीति के उस दौर को दर्शाती है, जब राजनीति किसी एक बड़े करिश्माई नेता के बजाय संस्थाओं, संगठनों और सामूहिक नेतृत्व पर आधारित होने लगती है.

‘पोस्ट-करिश्माई पॉलिटिक्स’ क्या?

राजनीति विज्ञान में पोस्ट-करिश्माई पॉलिटिक्स उस स्थिति को कहा जाता है, जब किसी बड़े करिश्माई नेता के प्रभाव के बाद राजनीतिक व्यवस्था नए ढांचे में ढलने लगती है. करिश्माई नेता अक्सर अपने व्यक्तित्व, लोकप्रियता और जनसमर्थन के आधार पर राजनीति को प्रभावित करते हैं.

लेकिन जब उनका प्रभाव कम होने लगता है या नई पीढ़ी सामने आती है, तब राजनीति का केंद्र किसी एक व्यक्ति से हटकर संस्थागत राजनीति, गठबंधन, संगठन और नीतियों पर आ जाता है. इस दौर में नेताओं की व्यक्तिगत छवि से ज्यादा सिस्टम, पार्टी संरचना और प्रशासनिक मॉडल अहम हो जाते हैं.

करिश्माई नेताओं की परंपरा क्या है?

बिहार में राजनीति लंबे समय तक मजबूत व्यक्तित्व वाले नेताओं के इर्द-गिर्द घूमती रही है. 1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव ने अपनी शैली और जनभाषा के जरिए बड़ी सामाजिक-राजनीतिक ताकत खड़ी की. उन्होंने पिछड़े वर्गों की राजनीति को नई दिशा दी और लंबे समय तक राज्य की राजनीति पर प्रभाव बनाए रखा.

इसके बाद नितीश कुमार का दौर आया, जिन्होंने विकास और सुशासन के मुद्दे को केंद्र में रखा. उनकी प्रशासनिक शैली और गठबंधन राजनीति ने बिहार की सत्ता को लंबे समय तक स्थिर बनाए रखा. इन दोनों नेताओं की छवि इतनी मजबूत रही कि चुनावी राजनीति अक्सर उनके नाम और व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द ही घूमती रही. नीतीश और लालू से पहले की बात करें तो बिहार में श्री कृष्ण सिंह और जगन्नाथ मिश्रा का नाम भी सामने आता है.

बिहार में ‘पोस्ट-करिश्माई पॉलिटिक्स’ की चर्चा क्यों?

हाल के वर्षों में बिहार की राजनीति में कई बदलाव दिखाई दे रहे हैं. एक ओर पुराने दिग्गज नेताओं की उम्र और सक्रियता को लेकर सवाल उठ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर नई पीढ़ी के नेताओं की भूमिका बढ़ रही है.

उदाहरण के तौर पर तेजस्वी यादव राज्य की राजनीति में प्रमुख विपक्षी चेहरे के रूप में उभरे हैं. वहीं नितीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की संभावित राजनीतिक सक्रियता को लेकर भी चर्चा हो रही है.

इन बदलावों के बीच राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि आने वाले समय में बिहार की राजनीति में किसी एक करिश्माई नेता के बजाय बहु-नेतृत्व और संगठन आधारित राजनीति मजबूत हो सकती है. लोक जनशक्ति पार्टी में रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान सामने उभरकर आए हैं. बीजेपी में ऐसे नेताओं में सम्राट चौधरी का नाम लिया जा रहा है. सम्राट चौधरी बिहार के अगले सीएम बनने की रेस में भी सबसे आगे हैं.

क्या नई पीढ़ी के नेता इस बदलाव को आगे बढ़ाएंगे?

नई पीढ़ी के नेता अक्सर अलग राजनीतिक शैली के साथ सामने आते हैं. वे सोशल मीडिया, युवाओं और विकास के मुद्दों पर ज्यादा जोर देते हैं. तेजस्वी यादव की राजनीति में रोजगार, शिक्षा और युवाओं से जुड़े मुद्दे प्रमुख रहे हैं. इसी तरह अगर भविष्य में निशांत कुमार या अन्य युवा नेता सक्रिय होते हैं, तो वे भी नीतिगत और संगठनात्मक राजनीति को ज्यादा महत्व दे सकते हैं. यह बदलाव धीरे-धीरे राजनीति को व्यक्तित्व आधारित मॉडल से निकालकर नीति आधारित मॉडल की ओर ले जा सकता है.

क्या करिश्माई राजनीति पूरी तरह खत्म हो जाएगी?

यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि बिहार में करिश्माई राजनीति पूरी तरह खत्म हो जाएगी. भारत जैसे लोकतंत्र में नेताओं की व्यक्तिगत लोकप्रियता अभी भी बहुत मायने रखती है. हालांकि यह जरूर संभव है कि आने वाले समय में करिश्माई नेतृत्व और संस्थागत राजनीति का मिश्रण देखने को मिले. यानी नेता का व्यक्तित्व महत्वपूर्ण रहेगा, लेकिन पार्टी संगठन, गठबंधन और प्रशासनिक प्रदर्शन भी उतने ही महत्वपूर्ण कारक बन जाएंगे.

राजनीति का भविष्य किस दिशा में जा सकता है?

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक आने वाले वर्षों में बिहार की राजनीति पीढ़ी परिवर्तन के दौर से गुजर सकती है. पुराने नेताओं की विरासत के साथ-साथ नई पीढ़ी के नेताओं को अपनी पहचान बनानी होगी. अगर यह बदलाव स्थायी रूप लेता है, तो बिहार में राजनीति का फोकस व्यक्तिगत करिश्मा से हटकर नीतियों, शासन और संगठनात्मक ताकत पर आ सकता है. यही स्थिति राजनीतिक विज्ञान में पोस्ट-करिश्माई पॉलिटिक्स की शुरुआत मानी जाती है. फिलहाल, यह बदलाव शुरुआती संकेतों के रूप में दिख रहा है, लेकिन आने वाले चुनाव और नई राजनीतिक रणनीतियां तय करेंगी कि बिहार वास्तव में इस नए राजनीतिक दौर में प्रवेश करता है या नहीं.

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