Kingmaker से King: सिर्फ जीत-हार नहीं, ‘कद’ का इम्तेहान! BJP की जीत Himanta की और बढ़ा देगी साख?
क्या Himanta Biswa Sarma इस चुनाव के बाद BJP के राष्ट्रीय चेहरा बनेंगे? जानिए असम से राष्ट्रीय राजनीति तक उनके बढ़ते कद का पूरा विश्लेषण.
कल यानी 4 अप्रैल 2026 भारतीय राजनीति का अहम पड़ाव साबित होने वाला है. पांच राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में 9, 23 और 29 अप्रैल को बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुद्दूचेरी में डाले गए वोटों की गिनती होगी, लेकिन असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किस पार्टी को कितनी सीटें मिलेंगी. असली सवाल यह है कि क्या असम में हिमंता बिस्वा सरमा (Himanta Biswa Sarma) चुनाव के बाद सिर्फ असम के मुख्यमंत्री रहेंगे या भारतीय राजनीति में एक बड़े रणनीतिक चेहरा बनकर उभरेंगे. ऐसा इसलिए कि उनकी सत्ता में वापसी लगभग तय माना जा रहा है. फिर, पिछले एक दशक में हिमंता बिस्वा सरमा ने जिस तेजी से अपनी राजनीतिक पहचान बनाई है, वह भारतीय राजनीति में कम ही देखने को मिलती है. एक समय कांग्रेस के भीतर अहम भूमिका निभाने वाले सरमा आज बीजेपी के Northeast विस्तार के सबसे मजबूत स्तंभ माने जाते हैं.
कांग्रेस से BJP तक: Kingmaker से की थी शुरुआत
Himanta की राजनीतिक यात्रा एक दिलचस्प मोड़ से गुजरती है. कांग्रेस में रहते हुए वे सरकारों को बनाने और गिराने की क्षमता रखते थे. यानी एक “Kingmaker” की भूमिका में थे, लेकिन 2015 में BJP में शामिल होने के बाद उनका रोल और बड़ा हो गया.
2016 के असम विधानसभा चुनाव में BJP की जीत सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं थी, बल्कि Northeast में एक नए राजनीतिक युग की शुरुआत थी. इस जीत के पीछे हिमंता की रणनीति और गठबंधन बनाने की क्षमता को अहम माना गया. यहीं से उनकी पहचान एक क्षेत्रीय नेता से आगे बढ़कर एक रणनीतिकार के रूप में बनने लगी.
गवर्नेंस और पॉलिटिक्स का गजब संतुलन कैसे?
असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा की राजनीति सिर्फ चुनावी रणनीति तक सीमित नहीं है. उन्होंने शासन और राजनीति को एक साथ साधने की कोशिश की है. एक तरफ उन्होंने कानून और व्यवस्था पर सख्त रुख अपनाया, तो दूसरी तरफ वेलफेयर स्किम्स के जरिए आम लोगों तक पहुंच बनाई. इसके साथ ही पहचान की राजनीति जैसे CAA और NRC को भी उन्होंने अपने राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बनाया.
पॉलिटिक्स का संयोग कैसे बना 'Himanta Model?
बड़ा सवाल यह है- क्या यह मॉडल सिर्फ असम तक सीमित है, या इसे BJP अन्य राज्यों में भी लागू करना चाहेगी? ऐसा इसलिए उन्होंने कानून व्यवस्था, असमियां पहचान, सीएए और एनआरसी और फ्रीबीज का ऐसा कॉकटेल तैयार किया जो उनकी सफल राजनीति का पहचान बन गया. यानी हिमंता मॉडल हो गया.
चुनाव में दांव पर क्या? सीटें या सियासी कद
चार अप्रैल को वोटों की गिनती के बाद आने वाले नतीजे हिमंता के लिए सिर्फ जीत या हार का मामला नहीं हैं. यह उनके राजनीतिक कद की परीक्षा भी है.अगर BJP और उसके सहयोगी दल मजबूत प्रदर्शन करते हैं, तो यह साफ संकेत होगा कि हिमंता का प्रभाव सिर्फ असम तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे Northeast में फैला हुआ है. वहीं अगर नतीजे उम्मीद से कमजोर आते हैं, तो उनकी रणनीति और नेतृत्व पर सवाल उठ सकते हैं. इसलिए यह चुनाव Himanta के लिए एक तरह का “referendum” बन गया है.
Northeast से National पॉलिटिक्स तक
हिमंता बिस्वा सरमा की सबसे बड़ी ताकत उनकी नेटवर्क बिल्डिंग क्षमता मानी जाती है. North East Democratic Alliance (NEDA) के जरिए उन्होंने कई छोटे-बड़े दलों को एक साथ लाने का काम किया. यही वजह है कि उन्हें Northeast का “Chanakya” भी कहा जाता है. लेकिन अब सवाल यह है कि क्या उनका यह प्रभाव राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचेगा? क्या BJP उन्हें एक बड़े नेशनल स्ट्रेटजिस्ट के रूप में इस्तेमाल करेगी? अगर चुनावी नतीजे उनके पक्ष में आते हैं, तो इसकी संभावना और मजबूत हो सकती है.
हिमंता की राजनीति दोधारी तलवार कैसे?
हिमंता बिस्वा सरमा की राजनीति का एक पक्ष उनकी आक्रामक शैली भी है. उनके बयानों और फैसलों को लेकर कई बार विवाद भी हुए हैं. विपक्ष पर हिंदू मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण का आरोप लगाता है. जबकि समर्थक इसे “strong leadership” मानते हैं. यही दोधारी तलवार उनके कद को बढ़ाने के साथ-साथ सीमित भी कर सकती है.
यही वजह है कि असम चुनाव को लेकर कल आने वाले नतीजे उनके लिए सिर्फ एक चुनाव का परिणाम नहीं होंगे. वे यह भी तय करेंगे कि हिमंता बिस्वा सरमा की राजनीतिक यात्रा किस दिशा में आगे बढ़ेगी. अगर वे इस परीक्षा में सफल होते हैं, तो वे सिर्फ एक मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे, बल्कि BJP की भविष्य की रणनीति का अहम चेहरा बन सकते हैं. लेकिन अगर नतीजे उनके खिलाफ जाते हैं, तो यह Northeast की राजनीति में एक नए समीकरण की शुरुआत भी हो सकती है.




