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स्ट्रॉन्ग रूम आखिर कितना Strong- ये होता क्या है? कितना सुरक्षित है Vote का खजाना

स्ट्रॉन्ग रूम में EVM और VVPAT मशीनें सुरक्षित रखी जाती हैं. जानिए इसकी 3-लेयर सुरक्षा, CCTV निगरानी और चुनाव आयोग के सख्त नियम कैसे वोट को सुरक्षित रखते हैं.

EVM Security in India VVPAT Safety Election Strong Room
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भारत में चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाए रखने के लिए कई सख्त व्यवस्थाएं लागू की जाती हैं, जिनमें स्ट्रॉन्ग रूम की भूमिका सबसे अहम मानी जाती है. मतदान खत्म होने के बाद ईवीएम (EVM) और वीवीपैट (VVPAT) मशीनों को इसी सुरक्षित कमरे में रखा जाता है, जहां से सीधे मतगणना के दिन ही उन्हें बाहर निकाला जाता है. चुनाव आयोग द्वारा तय नियमों के अनुसार स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा बहु-स्तरीय होती है, जिसमें केंद्रीय अर्द्धसैनिक बल, जिला प्रशासन के शीर्ष अधिकारी व स्थानीय पुलिस और निगरानी सिस्टम शामिल होते हैं.

स्ट्रॉन्ग रूम को आमतौर पर “वोट का खजाना” भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें लाखों मतदाताओं के फैसले सुरक्षित रहते हैं. ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि स्ट्रॉन्ग रूम आखिर कितना सुरक्षित है, इसकी व्यवस्था कैसे काम करती है और इसमें किन नियमों का पालन किया जाता है. पांच राज्यों में संपन्न मतदान और मतगणना के लिए बड़ी संख्या में स्ट्रॉन्ग रूम बनाए गए हैं. इन केंद्रों पर सुरक्षा की ऐसी व्यवस्था होती है, जहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता.

स्ट्रॉन्ग रूम क्या होता है?

स्ट्रॉन्ग रूम वह विशेष सुरक्षित कमरा होता है, जहां मतदान समाप्त होने के बाद ईवीएम (EVM) और वीवीपैट (VVPAT) मशीनों को रखा जाता है. यह कोई साधारण कमरा या हॉल नहीं होता, बल्कि भारतीय चुनाव आयोग के तय सख्त मानकों के अनुसार तैयार अति सुरक्षित केंद्र होता है. ताकि ईवीएम तक कोई पहुंच न सके. केवल वहीं पहुंचें, जो इसके लिए अधिकृत हैं. मतदान के बाद मशीनों को उम्मीदवारों और उनके एजेंटों की मौजूदगी में सील करके इस कमरे में रखा जाता है. मतगणना के दिन ही इसे खोला जाता है. इसे “वोट का खजाना” इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें लाखों मतदाताओं के वोट सुरक्षित रहते हैं. इस वोट के दम पर नई सरकार का गठन होता है.

स्ट्रॉन्ग रूम कितना सुरक्षित होता है?

स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा बहु-स्तरीय होती है और इसे बेहद मजबूत बनाया जाता है. मशीनों को रखने के बाद कमरे को डबल लॉक और सील किया जाता है, जिस पर उम्मीदवारों के एजेंट भी अपनी सील लगा सकते हैं. पूरे परिसर में 24 घंटे सीसीटीवी निगरानी रहती है और हर गतिविधि रिकॉर्ड होती है. स्ट्रॉन्ग रूम खोलने और बंद करने की प्रक्रिया की वीडियोग्राफी की जाती है और हर व्यक्ति की एंट्री-एग्जिट लॉग बुक में दर्ज होती है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ईवीएम किसी भी नेटवर्क या इंटरनेट से जुड़ी नहीं होती, जिससे हैकिंग या बाहरी हस्तक्षेप की संभावना नहीं रहती.

स्ट्रॉन्ग रूम की कितनी लेयर में सुरक्षा होती है?

West Bengal जैसे संवेदनशील राज्य में स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा और भी ज्यादा कड़ी रखी जाती है. यहां आमतौर पर तीन-स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था लागू होती है. सबसे अंदर की परत में केंद्रीय अर्द्धसैनिक बल (CAPF) तैनात रहते हैं, जो सीधे स्ट्रॉन्ग रूम के दरवाजे की सुरक्षा करते हैं. दूसरी परत में केंद्रीय बलों के साथ राज्य पुलिस तैनात रहती है, जो प्रवेश मार्ग और आसपास के क्षेत्र पर नजर रखती है. तीसरी और बाहरी परत में स्थानीय पुलिस पूरे परिसर और उसके आसपास के इलाके की सुरक्षा संभालती है. कई जगहों पर सैकड़ों सुरक्षाकर्मी 24×7 तैनात रहते हैं और लगातार गश्त की जाती है.

पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों की जिम्मेदारियां क्या?

अर्द्धसैनिक बलों की जिम्मेदारी सबसे संवेदनशील हिस्से यानी स्ट्रॉन्ग रूम के अंदरूनी क्षेत्र की सुरक्षा करने की होती है. वे हथियारबंद रहते हैं और किसी भी अनधिकृत व्यक्ति को अंदर जाने से रोकते हैं. दूसरी तरफ स्थानीय पुलिस बाहरी सुरक्षा संभालती है, जिसमें परिसर की निगरानी, भीड़ नियंत्रण, गेट पर चेकिंग और कानून-व्यवस्था बनाए रखना शामिल है. इसके अलावा प्रशासनिक अधिकारी और मजिस्ट्रेट समय-समय पर निरीक्षण करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि सभी नियमों का पालन हो रहा है.

लोगों को क्यों रखा जाता है दूर?

स्ट्रॉन्ग रूम और मतगणना केंद्र के आसपास सख्त प्रतिबंध लागू होते हैं. आम जनता को पूरी तरह प्रतिबंधित रखा जाता है और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की भी बिना अनुमति एंट्री नहीं होती. मीडिया को भी एक तय दूरी तक ही रहने की अनुमति दी जाती है. आमतौर पर स्ट्रॉन्ग रूम के आसपास 100 मीटर का नो-एंट्री ज़ोन बनाया जाता है, जहां सिर्फ अधिकृत अधिकारी और सुरक्षाकर्मी ही जा सकते हैं.

स्ट्रॉन्ग रूम के नियम क्या होते हैं?

चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार मशीनों को सील करने के समय उम्मीदवार और उनके एजेंट मौजूद रहते हैं. स्ट्रॉन्ग रूम को एक बार बंद करने के बाद मतगणना से पहले नहीं खोला जाता. सीसीटीवी निगरानी और वीडियोग्राफी अनिवार्य होती है और हर गतिविधि का रिकॉर्ड रखा जाता है. सुरक्षा में किसी भी तरह की लापरवाही पर सख्त कार्रवाई की जाती है. पूरी प्रक्रिया पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए तय की गई होती है.

स्ट्रॉन्ग रूम के अंदर किसे जाने की इजाजत ?

स्ट्रॉन्ग रूम के अंदर जाने की अनुमति बहुत सीमित होती है. इसमें रिटर्निंग ऑफिसर, जिला निर्वाचन अधिकारी, चुनाव आयोग के ऑब्जर्वर और अधिकृत तकनीकी स्टाफ शामिल होते हैं. इसके अलावा, उम्मीदवार या उनके अधिकृत एजेंटों को केवल विशेष परिस्थितियों में, जैसे सीलिंग या मतगणना के समय, अंदर जाने की अनुमति दी जाती है. मतगणना के दिन स्ट्रॉन्ग रूम खोलते समय सभी उम्मीदवारों और उनके एजेंटों को बुलाया जाता है. ताकि वे सील की जांच कर सकें और प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके.

स्ट्रॉन्ग रूम कितना “Strong” होता है?

कुल मिलाकर स्ट्रॉन्ग रूम एक हाई-सिक्योरिटी सिस्टम का हिस्सा है, जिसमें तीन-स्तरीय सुरक्षा, 24 घंटे निगरानी, सख्त नियम और पारदर्शी प्रक्रिया शामिल होती है. खासकर पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में इसकी सुरक्षा और भी ज्यादा मजबूत होती है. इन सभी व्यवस्थाओं का उद्देश्य एक ही है. मतदाता के वोट को पूरी तरह सुरक्षित रखना और चुनाव परिणामों की निष्पक्षता सुनिश्चित करना.

स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा को लेकर सीनियर अफसर ने क्या कहा?

चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा बेहद सख्त और बहु-स्तरीय होती है. चुनाव आयोग में संयुक्त सचिव रह चुके एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, स्ट्रॉन्ग रूम का निर्माण चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त ऑब्जर्वर जरूरत के अनुसार करते हैं और यह पूरी प्रक्रिया तय मानकों के तहत होती है. मतदान समाप्त होने के बाद ईवीएम (EVM) और वीवीपैट (VVPAT) मशीनों को सभी प्रत्याशियों और उनके एजेंटों की मौजूदगी में सील किया जाता है, जिसमें किसी भी तरह की लापरवाही की गुंजाइश नहीं होती. सुरक्षा के लिहाज से तीन-स्तरीय व्यवस्था लागू होती है, जिसमें 24×7 अर्द्धसैनिक बल तैनात रहते हैं, जबकि बाहरी इलाके की जिम्मेदारी स्थानीय पुलिस संभालती है. मतगणना पूरी होने तक ये सुरक्षाकर्मी केंद्र पर लगातार तैनात रहते हैं.

सुरक्षा की निगरानी के लिए चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त विशेष ऑब्जर्वर, जिला मजिस्ट्रेट (DM) और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी नियमित रूप से स्ट्रॉन्ग रूम का निरीक्षण करते हैं और पूरी व्यवस्था का जायजा लेते हैं. हर दिन की गतिविधियों का रिकॉर्ड डायरी में दर्ज किया जाता है और अधिकारी हर समय सिस्टम से जुड़े रहते हैं. स्ट्रॉन्ग रूम के अंदर और बाहर सीसीटीवी कैमरे लगे होते हैं, जिससे हर गतिविधि पर नजर रखी जाती है. नियमों के तहत राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों और उनके एजेंटों को तय सीमा तक रहने की अनुमति होती है, ताकि प्रक्रिया पारदर्शी बनी रहे और किसी तरह के आरोप-प्रत्यारोप की गुंजाइश न रहे. हालांकि, स्ट्रॉन्ग रूम के बिल्कुल पास या अंदर बिना अनुमति किसी को जाने की इजाजत नहीं होती.

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