IVF और Surrogacy में क्या है अंतर? कौन सी प्रोसेस ज्यादा सफल, खर्च और बेहतर ऑप्शन जानें
IVF और सरोगेसी आज के समय में बांझपन का समाधान बन चुके हैं. लेकिन दोनों प्रक्रियाएं एक-दूसरे से काफी अलग हैं। सही विकल्प चुनने के लिए इनके प्रोसेस, लागत और सफलता दर को समझना बेहद जरूरी है.
भोजपुरी इंडस्ट्री की फेमस एक्ट्रेस संभावना सेठ (Sambhavna Seth) शादी के 9 साल बाद मां बनने जा रही हैं. वह काफी सालों से प्रयास कर रही थी लेकिन 45 की उम्र में आते-आते उन्हें सेरोगेसी का सहारा लेना पड़ा. गुरुवार को एक्ट्रेस ने अपने इंस्टा हैंडल पर इस खुशख़बरी को शेयर को किया. उन्होंने ने इंस्टाग्राम पर एक प्यारा और इमोशनल पोस्ट करते हुए लिखा, 'हम प्रेग्नेंट हैं! हमारी सबसे खूबसूरत कहानी अब प्यार, उम्मीद और सरोगेसी के रास्ते आगे बढ़ रही है. काउंटडाउन शुरू हो गया है.' संभावना ने खुद अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि 7 बार आईवीएफ प्रोसेस फेल हुआ, इसके चलते उन्हें सरोगेसी का सहारा लेना पड़ा.
आईवीएफ जैसी मॉडर्न मेडिकल साइंस ने अब तक उन लाखों दंपतियों की सूनी गोद भरी है जो माता-पिता बनने के लिए तरसते रहे हैं. आम इंसानों समेत कई बड़ी-हस्तियों ने आईवीएफ और सरोगेसी का सहारा लिया है. जिसमें शाहरुख खान, नीता अंबानी, नयनतारा, प्रियंका चोपड़ा समेत कई सेलेब्स इस लिस्ट में शामिल हैं. लेकिन समझते है कि आखिर आईवीएफ से सरोगेसी कितना अलग है क्योंकि कुछ लोग इसे एक ही समझते है, जबकि दोनों के प्रोसेस बेहद अलग माने जाते हैं.
आईवीएफ क्या है?
आईवीएफ को टेस्ट ट्यूब बेबी टेक्निक भी कहा जाता है. इसमें महिला के एग्स और मेल स्पर्म को शरीर के बाहर प्रयोगशाला में मिलाया जाता है. फर्टिलाइजेशन के बाद बनने वाले भ्रूण (फ़ीटस ) को इच्छुक मां के यूट्रेस में इम्प्लांटेड किया जाता है. अगर मां का यूट्रेस हेल्दी हो और वह कंसीव कर सके, तो वह खुद ही बच्चे को जन्म देती है. यह प्रोसेस खास तौर से उन उन दंपतियों के लिए उपयोगी है जिन्हें नेचुरल रूप से कंसीव करने में मदद नहीं मिली या करने में समस्या का सामना कर रहे हैं. जैसे ट्यूब ब्लॉकेज, कम स्पर्म काउंट, एंडोमेट्रियोसिस या अनएक्सप्लेन्ड इनफर्टिलिटी. आईवीएफ का एक साइकिल आमतौर पर कुछ हफ्तों का होता है और इसमें ओवेरियन स्टिमुलेशन, एग रिट्रीवल, फर्टिलाइजेशन और एम्ब्रियो ट्रांसफर शामिल होते हैं
सरोगेसी क्या है?
सरोगेसी में इच्छुक माता-पिता के एग्स और स्पर्म से आईवीएफ के जरिए से भ्रूण (fetus) तैयार किया जाता है, लेकिन इसे सरोगेट मां (surrogate mother) के यूट्रेस में इम्प्लांटेड किया जाता है. सरोगेट मां पूरे नौ महीने तक कंसीव करती है, बच्चे को जन्म देती है और जन्म के बाद बच्चे के माता-पिता को सौंप देती है. सरोगेसी मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है:
ट्रेडिशनल: जिसमें सरोगेट का एग्स भी इस्तेमाल होता है
जेस्टेशनल: (Gestational), जिसमें सरोगेट का कोई जेनेटिक रिलेशनशिप बच्चे से नहीं होता. जेस्टेशनल सरोगेसी आजकल ज्यादा ट्रेंड और सेफ मानी जाती है.
दोनों के बीच बड़ा अंतर
सबसे बड़ा अंतर यह है कि आईवीएफ में इच्छुक मां खुद कंसीव करती है, जबकि सरोगेसी में दूसरी महिला (सरोगेट) कंसीव करती है. आईवीएफ बांझपन के सामान्य उपचार के रूप में इस्तेमाल होता है, जबकि सरोगेसी तब चुनी जाती है जब महिला कंसीव नहीं कर सकती. जैसे गर्भाशय न होना, बार-बार मिसकैरेज, गंभीर स्वास्थ्य समस्या.आईवीएफ अपेक्षाकृत कम खर्चीला और कम जटिल है, जबकि सरोगेसी में कानूनी समझौते, सरोगेट की तलाश, मेडिकल और भावनात्मक पहलू ज्यादा जटिल होते हैं. लागत की दृष्टि से सरोगेसी काफी महंगी पड़ सकती है. दोनों प्रक्रियाएं दंपतियों को माता-पिता बनने का अवसर देती हैं, लेकिन चुनाव व्यक्तिगत स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिति और कानूनी नियमों पर निर्भर करता है.
आईवीएफ वर्सेज सरोगेसी सक्सेस
आईवीएफ और सरोगेसी दोनों ही बांझपन की समस्या के समाधान हैं, लेकिन इनकी सफलता दर अलग-अलग हो सकती है. सफलता दर कई बातों पर निर्भर करती है, जैसे महिला की उम्र, भ्रूण की क्वालिटी, स्वास्थ्य स्थिति और क्लिनिक की सुविधाएं. आईवीएफ की सफलता दर सामान्य आईवीएफ में स्वस्थ शिशु के जन्म की दर युवा महिलाओं (35 साल से कम) में एक साइकिल में ऑन एवरेज 40-55% तक होती है. जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, यह दर कम होती जाती है. अगर अपनी जगह डोनर एग्स का इस्तेमाल किया जाए, तो सफलता दर आमतौर पर 50-65% के आसपास पहुंच जाती है. कई साइकिल करने पर कुल सफलता दर और भी बढ़ सकती है.
सरोगेसी में भ्रूण को सरोगेट मां के यूट्रेस में इम्प्लांटेड किया जाता है. यहां सफलता दर अक्सर ज्यादा अच्छी होती है. कई रिपोर्ट्स के अनुसार, सरोगेसी में प्रेगनेंसी की दर 70-75% तक हो सकती है. एक बार गर्भ ठहर जाने के बाद स्वस्थ शिशु के जन्म की संभावना 90-95% तक पहुंच जाती है. खासकर डोनर एग्स के साथ सरोगेसी करने पर सफलता की संभावना और बढ़ जाती है.
आईवीएफ और सरोगेसी में कितना आता है खर्च?
सरोगेसी में आईवीएफ की तुलना में कई एक्सट्रा फेज शामिल होते हैं, इसलिए इसकी कुल लागत आमतौर पर ज्यादा होती है. आईवीएफ में सिर्फ भ्रूण बनाना और उसे इच्छुक मां के गर्भ में डालना होता है, जबकि सरोगेसी में सरोगेट मां की पूरी गर्भावस्था की देखभाल, कानूनी काम और अन्य खर्च भी जुड़ जाते हैं.
आईवीएफ की लागत
भारत में एक सामान्य आईवीएफ साइकिल की लागत ₹1 लाख से ₹2.5 लाख तक हो सकती है. इसमें दवाइयां, टेस्ट, एग्स रिमूव और भ्रूण ट्रांसफर शामिल है. अगर डोनर एग या स्पर्म का इस्तेमाल करें तो खर्च थोड़ा बढ़ सकता है. कई बार एक से ज्यादा साइकिल लगने पर कुल खर्च बढ़ जाता है.
सरोगेसी की लागत
सरोगेसी की कुल लागत भारत में ₹10 लाख से ₹25 लाख तक हो सकती है. अल्ट्रुइस्टिक सरोगेसी के नियम के अनुसार, इसमें शामिल मुख्य खर्चे इस प्रकार हैं:
आईवीएफ प्रोसेस : ₹3 लाख से ₹5 लाख
सरोगेट मां की जांच, दवाइयां और पूरी प्रेगनेंसी की देखभाल: ₹4 लाख से ₹7 लाख
कानूनी फीस और समझौते: ₹50,000 से ₹1.5 लाख
डिलीवरी और अस्पताल खर्च
स्क्रीनिंग, बीमा और अन्य प्रोफेशनल फीस
लागत शहर, क्लिनिक, डॉक्टर की टीम और केस के कॉम्प्लिकेशन पर डिपेंड करता है. दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में खर्च थोड़ा ज्यादा हो सकता है.




