गांधी जी के रहे समर्थक, नेहरू की नीतियों का किया कड़ा विरोध; कौन थे राजगोपालाचारी जिनकी राष्ट्रपति भवन में लगाई गई प्रतिमा
राष्ट्रपति भवन में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की प्रतिमा लगने के बाद उनकी चर्चा फिर से शुरू हो गई है. उन्होंने गांधी जी के कहने पर वकालत छोड़ दी थी और आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया था. बाद में उन्होंने नेहरू की कुछ नीतियों का विरोध भी किया और अपने सिद्धांतों पर डटे रहे.
Who is Rajagopalachari: नई दिल्ली में राष्ट्रपति भवन परिसर में आयोजित 'राजाजी उत्सव’ के दौरान स्वतंत्र भारत के पहले भारतीय गवर्नर चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की प्रतिमा का अनावरण किया गया और एडविन लुटियंस की प्रतिमा को हटा दिया गया. राजगोपालाचारी की प्रतिमा केंद्रीय प्रांगण में स्थापित की गई है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ के 131वें एपिसोड में भी राजगोपालाचारी को याद किया. उन्होंने कहा कि राजगोपालाचारी उन नेताओं में थे, जिन्होंने सत्ता को पद नहीं बल्कि सेवा का माध्यम माना. सार्वजनिक जीवन में उनका आचरण, संयम और आज़ाद सोच आज भी प्रेरणा देती है. लुटियंस ने राष्ट्रपति भवन, जिसे तब वायसराय हाउस कहा जाता था, का डिजाइन तैयार किया था.
कौन थे चक्रवर्ती राजगोपालाचारी?
चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, जिन्हें राजाजी के नाम से जाना जाता है, का जन्म 10 दिसंबर 1878 को मद्रास प्रेसीडेंसी के सेलम (वर्तमान तमिलनाडु) के कृष्णागिरी जिले के थोरापल्ली गांव में एक तमिल भाषी ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनके माता-पिता उन्हें प्यार से राजन कहते थे. प्रारंभिक शिक्षा गांव में हुई और बाद में वे कानून की पढ़ाई के लिए मद्रास चले गए.
यहीं उन्हें राजनीति और स्वतंत्रता आंदोलन की जानकारी मिली. लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचारों से प्रभावित होकर वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े. 1906 के कलकत्ता अधिवेशन और 1907 के सूरत अधिवेशन में उन्होंने हिस्सा लिया. 1911 में 32 साल की आयु में वे सलेम नगर परिषद के सदस्य चुने गए. 1916 में एनी बेसेंट की होम रूल लीग से जुड़े और सलेम में इसकी यूनिट स्थापित की. 1917 में वे सलेम नगर परिषद के अध्यक्ष बने.
कब हुई चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की महात्मा गांधी से मुलाकात?
1919 में उन्होंने सलेम छोड़कर मद्रास का रुख किया ताकि राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा सकें. इसी दौरान महात्मा गांधी से उनकी मुलाकात हुई. वे गांधीजी से प्रभावित होकर असहयोग आंदोलन से जुड़े और तमिलनाडु में इसे व्यापक समर्थन दिलाया. उन्होंने अपनी वकालत छोड़ दी और गांधीजी के प्रोग्राम्स के लिए समर्पित हो गए. चुनाव, सरकारी नौकरियों, शैक्षणिक संस्थानों और आधिकारिक उपाधियों के बहिष्कार की मुहिम चलाई.
चक्रवर्ती राजगोपालाचारी क्या जेल गए थे?
1930 में उन्होंने दक्षिण भारत में ‘वेदारण्यम नमक सत्याग्रह’ का नेतृत्व किया, जो दांडी मार्च की तर्ज पर आयोजित हुआ था. त्रिची से वेदारण्यम तक पैदस सफर किया और बाद में गिरफ्तार किए गए. रिहाई के बाद शांतिपूर्ण व्यवहार का बॉन्ड भरने की शर्त ठुकराने पर दोबारा जेल भेजे गए. 1931 में रिहाई मिली, लेकिन 1932 में सत्याग्रह पर्चे बांटने के आरोप में फिर जेल गए.
1937 में प्रांतीय चुनावों के बाद मद्रास प्रांत में कांग्रेस की जीत हुई और राजाजी 'मद्रास के प्रधानमंत्री' बने. उनके कार्यकाल में क्लास 6, 7 और 8 के लिए हिंदी की पढ़ाई जरूरी की गई. हालांकि हिंदी में असफल होने पर कक्षा से निकाले जाने का प्रावधान नहीं था, फिर भी इसका खूब विरोध हुआ. इसे तमिलनाडु में हिंदी विरोधी भावना के उभार का शुरुआती चरण माना जाता है.
1942 के आंदोलन में कैसे थे गांधी जी से विचार अलग?
1942 के आंदोलन को लेकर उनके विचार गांधीजी से अलग थे. वे कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौते के पक्षधर थे. बाद में उन्होंने 'सी. आर. फॉर्मूला' पेश किया, जिसमें मुस्लिम लीग को अंतरिम सरकार में शामिल करने और मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में जनमत संग्रह का प्रस्ताव था. गांधीजी ने इस पर सहमति दी, लेकिन मुहम्मद अली जिन्ना ने इसे संतोषजनक नहीं माना.
आज़ादी के बाद राजाजी को पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाया गया और 1948 में लॉर्ड माउंटबेटेन के बाद वे भारत के पहले और अंतिम गवर्नर जनरल बने. 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के बाद यह पद समाप्त हो गया. बाद में वे नेहरू मंत्रिमंडल में शामिल हुए, कुछ समय बिना विभाग के मंत्री रहे और 1950 में सरदार पटेल के निधन के बाद गृह मंत्री बने. आर्थिक और नीतिगत मतभेदों के चलते उन्होंने 1951 के अंत तक इस्तीफा दे दिया.
मद्रास के सीएम बने लेकिन एक साल में ही क्यों दिया इस्तीफा?
1952 में वे मद्रास के मुख्यमंत्री बने. 1953 में उन्होंने स्कूली शिक्षा से जुड़ी एक योजना लागू की, जिसमें छात्रों को पारिवारिक व्यवसाय सीखने के लिए समय देना था. इस योजना का विरोध हुआ और आखिर में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. उनकी जगह के. कामराज मुख्यमंत्री बने और योजना वापस ले ली गई.
नेहरू की नीतियों से क्या था मतभेद?
नेहरू की समाजवादी नीतियों से असहमति बढ़ने पर उन्होंने 1959 में स्वतंत्र पार्टी की स्थापना की. वे राज्य नियंत्रण कम करने, मुक्त बाजार और निजी उद्यम के समर्थक थे. नेहरू ने उनकी पार्टी को सामंतों और जमींदारों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी बताया.
हिंदी का क्यों किया विरोध?
हिंदी के मुद्दे पर उनका रुख समय के साथ बदला. 1937 में वे हिंदी समर्थक थे, लेकिन 1965 में तमिलनाडु में हिंदी को एकमात्र आधिकारिक भाषा बनाए जाने के विरोध में खड़े हुए. उन्होंने कहा कि हिंदी अंग्रेजी का स्थान नहीं ले सकती. राजाजी दलितों के मंदिर प्रवेश के समर्थक थे, 1938 में सामाजिक प्रतिबंध हटाने के बिल का का समर्थन किया था. 1939 में मंदिर प्रवेश प्राधिकरण और क्षतिपूर्ति विधेयक लाकर दलितों को मंदिर प्रवेश का अधिकार दिया था.
1954 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया. 1972 में उनका निधन हुआ. गांधीजी उन्हें अपनी अंतरात्मा का रक्षक कहते थे. जीवन के आखिरी सालों में वे कांग्रेस और नेहरू की नीतियों के आलोचक बन गए थेत. राष्ट्रपति भवन में उनकी प्रतिमा स्थापित किए जाने को कई लोग प्रतीकात्मक राजनीतिक संदेश के रूप में भी देख रहे हैं.




