निपट गए भारत विरोधी मक्कार मो. यूनुस, मिलिट्री संभाल ले बिगड़े रिश्ते; बांग्लादेश के नए सत्ता संतुलन में भारत के लिए क्या संकेत?
बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन और सेना में आंतरिक बदलावों के बाद भारत-बांग्लादेश रिश्तों को लेकर नई उम्मीदें और आशंकाएं दोनों उभरी हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले छह महीने दोनों देशों के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं.
आज का बांग्लादेश मो. यूनुस वाला बांग्लादेश नहीं है. आज न ही दो पौने दो साल पहले वाला (साल 2024 के अंत वाला) बांग्लादेश है. आज का बांग्लादेश शेख हसीना और खालिदा जिया जैसी वहां की मजबूत पॉलिटिकल विल पावर जैसी पूर्व प्रधानमंत्रियों के बलबूते भारत के साथ कंधे से कंधा मिलकर पला-बढ़ा बांग्लादेश है. जिसे महज डेढ़ साल के भीतर मो. यूनुस ने ‘चरमपंथी-कट्टरपंथी’ ताकतों के हवाले करके आग में स्वाहा करवा के कहीं का नहीं छोड़ा.
आज का बांग्लादेश पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया जिनके पिता का इस बांग्लादेश को जन्म दिलाने में अहम योगदान रहा था, उनके बेटे और नव-नियुक्त बांग्लादेशी प्रधानमंत्री तारिक रहमान का बांग्लादेश है. हालांकि अभी चुनाव के बाद जिस बंपर जीत को हासिल करके तारिक रहमान को बांग्लादेश की अवाम ने एकतरफा प्रचंड बहुमत से प्रधानमंत्री बनाया है, इस सबने तो बांग्लादेश की हाल-फिलहाल मो. यूनुस वाले बांग्लादेश से तस्वीर ही एकदम बदल डाली है.
संबंधों को लेकर नाजुक समय क्यों?
यह तमाम बेबाक बातें बयान की हैं भारतीय सेना के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी ने. सोढ़ी स्टेट मिरर हिंदी एक एडिटर इनवेस्टीगेशन से नई दिल्ली में एक्सक्लूसिव बात कर रहे थे. जसिंदर सिंह सोढ़ी से पूछा गया कि क्या अब तारिक रहमान ने जिस तरह से पद संभालने के तत्काल बाद सबसे पहले बांग्लादेशी फौज में आमूल-चूल परिवर्तन किए हैं, उनका भारत के साथ संबंधों पर कोई सकारात्मक-नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा? सवाल के जवाब में भारतीय फौज के पूर्व अधिकारी सोढ़ी ने कहा यह सब समझने के लिए हमें दो साल पहले के बांग्लादेश में झांकना होगा. 5 अगस्त 2024 को जब बांग्लादेश में तख्ता-पलट अंजाम दिया गया था. वहां की तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को भारत ने चंद मिनट के अंदर सुरक्षित निकाल कर अपने यहां निर्वासित के रूप में ‘राजनीतिक शरण’ दी थी. तभी से बांग्लादेश के कट्टरपंथी-चरमपंथी, भारत विरोधी ताकतों का खून खौल रहा है. इन संबंधों में पड़ी खटास को बढ़ाने में मो. यूनुस के कुकर्मों ने आग में घी डालने जैसा काम किया. इस उम्मीद में कि वह देश में हिंदू विरोधी हवा को तेज करके, बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं का कत्ल-ए-आम करवा के शायद खुद देश के राष्ट्रपति बन जाएंगे.
तारिक रहमान से उम्मीदें क्यों?
अब तक ऐसा कुछ नहीं हुआ जिसकी चाहत या तमन्ना संजोए मो. यूनुस बैठे थे. अपितु मो. यूनुस के कई हवा-हवाई आदेशों को मौजूदा नव-नियुक्त प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने अपनी ताकत की ‘पिन’ चुभोकर पंचर कर दिया है. अब चंद दिन कुर्सी संभालने के दौरान जिस तरह से तारिक रहमान भारत को लेकर आगे बढ़ रहे हैं. उससे काफी कुछ उम्मीदें इस बात की जाग रही हैं कि वे भारत को लेकर शायद लचीला रुख अपनायें. ले. कर्नल जे एस सोढ़ी के मुताबिक अगर बांग्लादेश के नव-निर्वाचित प्रधानमंत्री चरमपंथियों और कट्टरपंथियों के शिकंजे में फंसने से बच गए तो अपनी फौज के साथ मिलकर भारत के संग तल्ख हो चुके रिश्तों को बेहतर बना सकते हैं.
बांग्लादेशी सेना में बदलाव के मायने क्या?
भारतीय फौज के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी का कहना कि अब आगे के 6 महीने दोनों देशों के बिगड़े हुए संबंधों में मिठास घोलने की नजर से बेहद नाजुक होने के साथ-साथ बहुत आवश्यक भी हैं. अभी बांग्लादेशी प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने अपनी फौज में जो आंतरिक तब्दिलीयां की हैं, वे कोई बहुत अहम या बड़े पदों में उलट-फेर नहीं है. हां, किसी भी देश की हुकूमत अपने देश की सेना प्रमुख, खुफिया एजेंसी प्रमुख या फिर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बदले, तो इसे बड़ी-अहम तब्दीली माना जाता है.
किन प्रमुखों को बदलना अहम होगा?
लेफ्टिनेंट कर्नल जे एस सोढ़ी कहते हैं, “हां, देश की बागडोर बहैसियत प्रधानमंत्री अपने हाथ में संभालते ही अगर तारिक रहमान ने देश के सेना प्रमुख, वायुसेना प्रमुख, जलसेना प्रमुख, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार या फिर बांग्लादेश इंटेलीजेंस प्रमुख को बदलते. तो यह सब बदलाव दुनिया के साथ साथ भारत के लिए सबसे ज्यादा अहम होते. क्योंकि दुनिया में इन बदलावों का संदेश यह जाता कि पूर्व सरकार (शेख हसीना) में तैनात फौज और देश की बाकी तमाम प्रमुख एजेंसियों के टॉप लीडर के क्रिया-कलाप कहीं संदेह के घेरे में या फिर देश-विरोधी रहे होंगे.”
क्यों दोनों देश आगे बढ़ना है जरूरी?
स्टेट मिरर हिंदी के एक सवाल के उत्तर में भारतीय फौज के पूर्व अनुभवी अधिकारी जसिंदर सिंह सोढ़ी ने कहा, “जिस तरह से बांग्लादेश के नव-नियुक्त प्रधानमंत्री तारिक रहमान हाल-फिलहाल के वक्त में फूंक फूंक कर कदम आगे बढ़ा रहे हैं. यह बांग्लादेश और भारत दोनों के लिए बेहद अहम और नाजुक वक्त है. भारत को बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के हर कदम पर पैनी नजर रखनी होगी. अगर सब कुछ ऐसे ही धीरे धीरे ही सही आगे बढ़ता रहा.
यह समय क्यों भारत के काम का है?
तो कोई बड़ी बात नहीं कि भारत के बीते दो साल से बांग्लादेश के साथ तल्ख हो चुके रिश्तों को कहीं मिठास की कुछ बयार हासिल हो जाए. मेरे हिसाब से यह वह वक्त है भारत को गरम लोहे पर चोट कर देनी चाहिए. इस वक्त भारत विरोधी मानसिकता वाले और चरमपंथी-कट्टरपंथी मानसिकता के पुतला रहे मो. यूनुस चूंकि बांग्लादेश में कहीं किसी बड़े पद पर नहीं है. कह सकता हूं कि वह फिलहाल दूध से निकाल फेंकी गई मक्खी की मानिंद एक कोने में पड़े हैं. ऐसे में भारत और बांग्लादेश की फौजों को आगे बढ़कर संबंध सुधारने की दिशा में कोई ऐसा कदम बेहद सधे हुए अंदाज में आगे बढ़ाना चाहिए, जो धूर्त अमेरिका, चतुर चीन और मक्कार पाकिस्तान के लिए सबक बन जाए.”




