क्या है उत्तराखंड की डिश जखिया आलू? यूरोपीय मेहमानों को राष्ट्रपति भवन में परोसी गई हिमालयी स्वाद 'झंगोरा की खीर'
राष्ट्रपति भवन में मंगलवार शाम आयोजित विशेष डिनर में हिमालयी व्यंजनों के ज़रिये भारत की सांस्कृतिक विविधता दिखाई गई. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि यूरोपीय संघ के नेताओं एंटोनियो कोस्टा और उर्सुला वॉन डेर लेयेन की मेजबानी की. इस मौके पर उत्तराखंड का पारंपरिक जखिया आलू खास आकर्षण रहा.
मंगलवार की शाम को राष्ट्रपति भवन का डाइनिंग हॉल बहुत खास और खास हो गया था. वहां हिमालय के स्वादों से भरा एक खूबसूरत डिनर हुआ. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने यूरोपीय संघ के बड़े लीडर्स- एंटोनियो कोस्टा और उर्सुला वॉन डेर लेयेन की मेजबानी की. ये दोनों नेता भारत के 77वें गणतंत्र दिवस के चीफ गेस्ट के रूप में आए थे. इस खास डिनर का मुख्य उद्देश्य था उन्हें भारत के हिमालयी इलाकों के पारंपरिक और स्वादिष्ट खाने का मजा चखाना. इस खास मेन्यू को तैयार करने का काम दो कुशल शेफ - प्रतीक साधु और कमलेश नेगी ने किया.
उन्होंने कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और पूर्वोत्तर भारत के खाने की परंपराओं से प्रेरणा ली. हर डिश में स्थानीय और ताजी चीजों का इस्तेमाल किया गया, और पुरानी पारंपरिक तरीकों को थोड़ा आधुनिक टच देकर पेश किया गया. इस डिनर में सबसे ज्यादा ध्यान खींचा एक खास व्यंजन ने जखिया आलू. यह उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल इलाकों का बहुत पॉपुलर घरेलू खाना है. ज्यादातर पहाड़ी परिवारों में यह रोज बनता है, खासकर सर्दियों में. लोग इसे लंबी यात्रा या खेतों में काम के दौरान साथ ले जाते हैं क्योंकि यह आसानी से खराब नहीं होता और बहुत स्वादिष्ट होता है.
जखिया आलू क्या है और कैसे बनता है?
जखिया एक छोटा-सा काला बीज है, जिसे जंगली सरसों भी कहते हैं. यह हिमालयी क्षेत्रों में बहुत मिलता है. जब इसे गर्म सरसों के तेल में डालकर भूनते हैं, तो एक हल्की, अखरोट जैसी खुशबू निकलती है. यह बीज हल्के से चटकते हैं, लेकिन बहुत तेज या कड़वे नहीं होते. इसमें मुख्य रूप से छोटे आलू (या बेबी पोटैटो) इस्तेमाल होते हैं. इन्हें उबालकर या सीधे कच्चे टुकड़ों में डालकर पकाया जाता है. मसाले में हल्दी, लहसुन, सूखी या हरी मिर्च, थोड़ी-सी हींग डाली जाती है. कोई भारी ग्रेवी या गाढ़ी चटनी नहीं बनाई जाती, ताकि आलू और जखिया का असली स्वाद बना रहे. पकाने का तरीका सरल लेकिन सही करना जरूरी है. आलू नरम और मुलायम होने चाहिए, जबकि जखिया के बीज कुरकुरे रहें. आखिर में थोड़ा नींबू का रस और कटा हुआ धनिया डालकर खट्टा-ताजा स्वाद दिया जाता है. यह सूखी सब्जी (भुर्जी जैसी) बनती है.
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खाने में और क्या-क्या ख़ास
यह व्यंजन बहुत आसान लगता है, लेकिन इसमें सही आंच और समय का ध्यान रखना पड़ता है. अगर जखिया को ज्यादा भून दिया तो स्वाद खराब हो सकता है. यह चाय के साथ नाश्ते में, या दाल-चावल, मंडुआ रोटी के साथ मुख्य भोजन में बहुत अच्छा लगता है. स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद है- जखिया के बीज पाचन सुधारते हैं, सूजन कम करते हैं और बुखार में भी राहत देते हैं. यह हल्का और पौष्टिक खाना है, जो पेट पर भारी नहीं पड़ता. राष्ट्रपति भवन के इस डिनर में जखिया आलू के अलावा भी कई और खास हिमालयी डिश परोसी गईं. शुरुआत में मीठा व्यंजन था- झंगोरा की खीर (जो एक तरह का मिलेट है), जिसके साथ मेआ लून और सफेद चॉकलेट दिया गया. फिर एक खास सूप आया - सुंदरकला थिचोनी, जो उत्तराखंड का बकव्हीट नूडल्स है और तिब्बती स्टाइल से प्रभावित है.
भारत की विविधता का स्वाद
अन्य डिश में याक पनीर का कस्टर्ड भांग मठरी के साथ, लौकी के साथ सरसों में लिपटा बिच्छू बूटी का पत्ता, और मुख्य कोर्स में पहाड़ी मशरूम जैसे गुच्छी (मोरेल मशरूम) और सोलन मशरूम को खसखस और भुने टमाटर की चटनी के साथ पकाया गया. इन्हें हिमाचली स्वर्णू चावल के साथ सर्व किया गया. चटनी भी कई तरह की थी. राई के पत्ते की चटनी, कश्मीरी अखरोट की चटनी, भुने टमाटर की चटनी और अखुनी चटनी. मीठे में भी हिमालय का टच था. रागी और कश्मीरी सेब का केक तिमरू और सी बकथॉर्न क्रीम के साथ, खजूर और कच्चे कोको वाली कॉफी कस्टर्ड, और हिमालयी शहद से सने परसिमन. सब कुछ सरल, सुंदर और नेचुरल तरीके से बनाया गया था. यह पूरा भोजन सिर्फ खाना नहीं था, बल्कि हिमालय की संस्कृति, स्थानीय सामग्री और भारत की विविधता को दिखाने का एक खूबसूरत तरीका था. मेहमानों को भारत के पहाड़ों के असली स्वाद का अनुभव हुआ.





