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कुख्यात आतंकी कमांडर की बेगम, हाफिज सईद की ‘बहन’; कौन है कश्‍मीर की पहली महिला अलगाववादी नेता सजायाफ्ता Asiya Andrabi?

कश्मीर की पहली महिला अलगाववादी नेता आसिया अंद्राबी को दिल्ली की NIA अदालत ने UAPA केस में दोषी ठहराया है. 62 वर्षीय अंद्राबी Dukhtaran-e-Millat की संस्थापक हैं, जिसे 2018 में आतंकी संगठन घोषित किया गया. उन्हें और उनके सहयोगियों पर प्रतिबंधित संगठन की सदस्यता, देश के खिलाफ युद्ध, राजद्रोह, दंगे भड़काने और हिंसा को बढ़ावा देने जैसे आरोप लगे. उन्होंने कट्टर अलगाववादी विचारों के लिए पहचान बनाई और हाफिज सईद का समर्थन भी पाया.

कुख्यात आतंकी कमांडर की बेगम, हाफिज सईद की ‘बहन’; कौन है कश्‍मीर की पहली महिला अलगाववादी नेता सजायाफ्ता Asiya Andrabi?
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प्रवीण सिंह
Edited By: प्रवीण सिंह

Updated on: 15 Jan 2026 11:53 AM IST

कश्मीर की अलगाववादी राजनीति में एक दौर ऐसा भी रहा, जब सड़कों पर नारे लगाने, इस्लामी पहचान और ‘आजादी’ की बात करने वाली एक महिला चेहरा बनकर उभरी. वही चेहरा था आसिया अंद्राबी का. अब वही आसिया अंद्राबी दिल्ली की एक NIA अदालत द्वारा UAPA (गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून) के तहत दोषी करार दी जा चुकी हैं. 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद यासीन मलिक के बाद वह दूसरी बड़ी अलगाववादी नेता हैं, जिन्हें NIA कोर्ट से सजा की राह पर ले जाया गया है.

दिल्ली की NIA विशेष अदालत ने आसिया अंद्राबी के साथ उनकी दो सहयोगियों नाहिदा नसीरीन और फहमीदा सोफी को दोषी ठहराया है. तीनों पर आरोप था कि वे प्रतिबंधित संगठन का हिस्सा बनकर भारत की संप्रभुता, अखंडता और सुरक्षा के खिलाफ गतिविधियों में शामिल थीं. NIA के मुताबिक, आसिया अंद्राबी और उनकी टीम सोशल मीडिया, भाषणों और अन्य मंचों के जरिए हिंसक विद्रोह, नफरत और अलगाववाद को बढ़ावा दे रही थीं. अप्रैल 2018 में इस मामले में UAPA के तहत केस दर्ज किया गया था और जुलाई 2018 में उन्हें श्रीनगर जेल से गिरफ्तार कर लिया गया था.

कौन है आसिया अंद्राबी?

62 वर्षीय आसिया अंद्राबी को कश्मीर की पहली महिला अलगाववादी नेता माना जाता है. उनका जन्म 1963 में हुआ था. वे होम साइंस ग्रेजुएट हैं और शुरुआती जीवन में उनका झुकाव पढ़ाई और सामान्य पारिवारिक जीवन की ओर था. ग्रेजुएशन के बाद वे दार्जिलिंग से पोस्ट ग्रेजुएशन करना चाहती थीं, लेकिन परिवार की अनुमति न मिलने के बाद उनका रुझान इस्लामी साहित्य की ओर बढ़ा. यहीं से उनके विचारों में बदलाव आया और वे जमात-ए-इस्लामी के महिला विंग से जुड़ गईं.

Dukhtaran-e-Millat की स्थापना

1985 में आसिया अंद्राबी ने जमात-ए-इस्लामी से अलग होकर Dukhtaran-e-Millat (DeM) नाम से संगठन बनाया. शुरुआत में इसे एक सामाजिक सुधार आंदोलन बताया गया, लेकिन 1990 के दशक में यह संगठन कट्टर अलगाववादी विचारधारा का प्रतीक बन गया. 1991 में संगठन तब सुर्खियों में आया, जब उसने कश्मीर घाटी में जबरन पर्दा (हिजाब) अभियान चलाया. इसके बाद आसिया अंद्राबी को कट्टर इस्लामी और हार्डलाइन अलगाववादी नेता के तौर पर पहचाना जाने लगा.

आतंकी कनेक्शन और हाफिज सईद से रिश्ता

आसिया अंद्राबी का नाम केवल अलगाववादी राजनीति तक सीमित नहीं रहा. 1990 में उन्होंने आशिक हुसैन फकतू उर्फ मोहम्मद कासिम से शादी की, जो घाटी का एक कुख्यात आतंकी कमांडर था. फकतू फिलहाल आजीवन कारावास की सजा काट रहा है. आसिया अंद्राबी को पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के सरगना हाफिज सईद का समर्थन भी मिलता रहा है. हाफिज सईद सार्वजनिक मंचों से आयशा को अपनी “बहन” कह चुका है, जिससे उनके आतंकी नेटवर्क से जुड़े होने के आरोप और मजबूत हुए.

बार-बार गिरफ्तारी और PSA

आसिया अंद्राबी को पहली बार 1993 में गिरफ्तार किया गया था. तब उनके साथ उनका पति और नवजात बच्चा भी था. इसके बाद उन्हें कई बार पब्लिक सेफ्टी एक्ट (PSA) के तहत जेल भेजा गया. वे वैलेंटाइन डे जैसे आयोजनों के खिलाफ अभियान चलाने के लिए भी जानी जाती थीं, जिन्हें वे “गैर-इस्लामी” बताती थीं. वे इतने कट्टर रुख के लिए मशहूर थीं कि कई बार उन्होंने अलगाववादी खेमे के सबसे बड़े चेहरे सैयद अली शाह गिलानी की भी खुली आलोचना की.

2018 के बाद केंद्र सरकार की सख्ती

2018 में केंद्र सरकार ने Dukhtaran-e-Millat को आतंकी संगठन घोषित कर प्रतिबंधित कर दिया. आसिया अंद्राबी की गिरफ्तारी के बाद NIA ने जुलाई 2019 में उनका श्रीनगर स्थित मकान जब्त कर लिया. यह पहली बार था, जब किसी महिला अलगाववादी नेता की संपत्ति पर ऐसी कार्रवाई हुई. अनुच्छेद 370 हटने के बाद केंद्र सरकार की सख्त नीति के चलते घाटी में अलगाववादी संगठनों की जमीन लगभग खत्म हो गई. Dukhtaran-e-Millat भी अब नाम मात्र का संगठन बनकर रह गया है.

NIA के गंभीर आरोप

NIA की FIR में आसिया अंद्राबी और उनकी सहयोगियों पर प्रतिबंधित संगठन की सदस्यता, देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने, राजद्रोह, आपराधिक साजिश, दंगे भड़काने, समुदायों के बीच नफरत फैलाने, सरकार के खिलाफ विद्रोह के लिए उकसाने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे. NIA के पूर्व IG आलोक मित्तल के अनुसार, आरोपियों ने ऐसे भाषण और प्रचार किए, जो भारत से जम्मू-कश्मीर को अलग करने और हिंसा को जायज ठहराने की कोशिश थे.

सियासी असर कितना?

विशेषज्ञों का मानना है कि आसिया अंद्राबी की सजा से जमीन पर कोई बड़ा राजनीतिक असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि घाटी में अलगाववादी ढांचा पहले ही कमजोर हो चुका है. लेकिन यह फैसला केंद्र सरकार के उस संदेश को जरूर मजबूत करता है कि अलगाववाद और आतंक के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति जारी रहेगी. यासीन मलिक के बाद आयशा अंद्राबी को सजा होना यह दिखाता है कि कश्मीर में दशकों तक चलने वाला अलगाववादी तंत्र अब कानूनी और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर निर्णायक दौर में पहुंच चुका है.

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