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Supreme Court के वो 8 बड़े जज, जिन्होंने केस से नहीं किया खुद को दूर, अकेली नहीं दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा

सुप्रीम कोर्ट के 8 जज जिन्होंने recusal से इनकार किया. जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के मामले के साथ जानें न्यायिक निष्पक्षता और विवादों का पूरा विश्लेषण.

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भारत की न्यायिक व्यवस्था में 'recusal' यानी किसी जज का किसी केस की सुनवाई से खुद को अलग कर लेना, निष्पक्षता और न्यायिक सिद्धांत से जुड़ा बेहद अहम पहलू है. लेकिन हर बार जब किसी जज पर पक्षपात (bias) का आरोप लगता है, तब यह जरूरी नहीं कि वह खुद को केस से अलग कर ले. कई ऐसे हाई-प्रोफाइल मामले सामने आए हैं, जहां सुप्रीम कोर्ट के जजों ने भी recusal की मांग के बावजूद सुनवाई जारी रखी और मामले से खुद को अलग नहीं किया.

हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट की जज स्वर्णकांता शर्मा (Swarnkanta Sharma) का मामला भी इसी बहस को फिर से चर्चा में ले आया है. ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि आखिर किन परिस्थितियों में जज खुद को अलग करते हैं और किनमें नहीं. अ​ब तक किन प्रमुख जजों ने खुद को ऐसे ही मामले सामने आने पर खुद को उससे अलग नहीं किया.

1. जज अरुण मिश्रा - लैंड एक्विजिशन केस

सुप्रीम कोर्ट के जज रहे अरुण मिश्रा ने भूमि अधिग्रहण कानून से जुड़े मामले में यह तर्क दिया गया कि उन्होंने पहले भी इसी मुद्दे पर फैसला दिया था, लेकिन जस्टिस मिश्रा ने recusal से इनकार किया और कहा कि पहले का निर्णय देना bias नहीं माना जा सकता. उन्होंने प्रशांत भूषण अवमानना केस में भी खुद को अलग किया? इस मामले में भी कहा कि आलोचना भेदभाव का प्रमाण नहीं.

2. पूर्व चीफ जस्टिस रंज गोगोई - अयोध्या केस

अयोध्या विवाद यानी राम मंदिर बाबरी मस्जिद मामले जैसे संवेदनशील मामले में भी recusal की मांग उठी, लेकिन पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने इसे खारिज कर दिया. उनका कहना था कि कोई व्यक्तिगत हित नहीं है, इसलिए सुनवाई जारी रहेगी.

3. पूर्व चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ - पेगासस केस

पेगासस जासूसी विवाद में पूर्व चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ पर भी recusal की मांग की गई, लेकिन जस्टिस चंद्रचूड़ ने इसे ठुकरा दिया. उन्होंने स्पष्ट किया कि सीधा व्यक्तिगत हित न होने पर हटने का सवाल नहीं उठता.

4. पूर्व चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा - मेडिकल कॉलेज घोटाला

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ भी आरोप जुड़े थे, फिर भी उन्होंने recusal नहीं किया. यह फैसला काफी विवादित रहा और न्यायिक पारदर्शिता पर बहस छिड़ी.

5. पूर्व चीफ जस्टि S A बोबडे - यौन उत्पीड़न

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस रहे एसए बोबडे ने भी यौन उत्पीड़न के आरोपों वाले मामले में उन्होंने खुद को अलग नहीं किया, बल्कि एक अलग प्रक्रिया अपनाई गई. यह भी काफी चर्चा में रहा.

6. जज एस अब्दुल नजीर - अयोध्या विवाद

जज एस अब्दुल नजीर ने भी एक संवेदनशील मामलों में recusal से इनकार किया. उन्होंने न्यायिक निष्पक्षता पर केवल आरोप से सवाल नहीं उठता.

7. जज एएम खांडविलकर - PMLA केस

जस्टिस एएम खांडविलकर ने मनी लॉन्ड्रिंग कानून (PMLA) की वैधता को चुनौती देने वाले केस में recusal की मांग उठी थी, लेकिन उन्होंने खुद को अलग नहीं किया. उन्होंने कहा था कि केवल आशंका या आरोप recusal का आधार नहीं है.

8. जज अशोक भूषण - अयोध्या विवाद

जज अशोक भूषण ने अयोध्या मामले में शामिल होने पर भी उन्होंने खुद को अलग नहीं किया. उन्होंने कहा था कि कोई व्यक्तिगत हित नहीं था.

पूर्व चीफ जस्टिस यूयू ललित अयोध्या विवाद से अलग क्यों किया?

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस उदय उमेश ललित ने अयोध्या केस में खुद को अलग किया? उन्होंने recusal किया क्योंकि वह पहले इस केस में एक पक्ष के वकील रह चुके थे. इसे एक आदर्श उदाहरण माना जाता है. लेकिन हाई कोर्ट की जज स्वर्णकांता शर्मा को लेकर Arvind Kejriwal ने एक्साइज पॉलिस घोटाला मामले में यह कहा गया कि उनके परिवार के एक सदस्य का पैनल से कनेक्शन है, लेकिन उन्होंने कहा कि सिर्फ संबंध relationship) को bias नहीं माना जा सकता. जस्टिस L Nageswara Rao ने आंध्र प्रदेश केस में खुद को अलग किया, क्योंकि वह पहले राज्य सरकार के वकील रह चुके थे, जिससे संभावित टकराव (conflict) बनता था.

Recusal के पीछे क्या पैटर्न दिखता है?

इन सभी मामलों को देखने पर एक साफ पैटर्न सामने आता है कि Recusal तब होता है जब जज पहले उसी केस में वकील रह चुका हो. केस से सीधा व्यक्तिगत या आर्थिक हित जुड़ा हो. परिवार का सीधा और सक्रिय संबंध हो. Recusal तब नहीं होता, जब केवल आरोप या आलोचना हो. जज ने पहले समान मुद्दे पर फैसला दिया हो. संबंध केवल अप्रत्यक्ष (indirect) हो.

न्यायिक सिद्धांत क्या कहता है?

न्यायपालिका में एक प्रसिद्ध सिद्धांत है: “Justice must not only be done, but must also be seen to be done”. लेकिन इसके साथ एक और व्यावहारिक सिद्धांत भी चलता है. “Frivolous आरोपों के आधार पर जज को हटाया नहीं जा सकता”.

हर शक नहीं, केवल ठोस कारण ही आधार

इन सभी उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि भारत में recusal एक गंभीर और सीमित प्रक्रिया है. हर आरोप या शक के आधार पर जज खुद को अलग नहीं करते. केवल तब recusal होता है जब वास्तविक, प्रत्यक्ष और साबित होने वाला हितों का टकराव (real conflict of interest) मौजूद हो. यही कारण है कि Swarnkanta Sharma का मामला कोई अपवाद नहीं, बल्कि उसी स्थापित न्यायिक परंपरा का हिस्सा है, जहां निष्पक्षता और न्यायिक प्रक्रिया की स्थिरता के बीच संतुलन बनाया जाता है.

Recusal क्या है और कब होता है?

Recusal का सीधा मतलब है कि जज किसी केस की सुनवाई से खुद को अलग कर लें, ताकि निष्पक्षता पर कोई सवाल न उठे. आमतौर पर यह तब होता है जब जज का उस केस से कोई सीधा व्यक्तिगत, पेशेवर या आर्थिक हित (conflict of interest) जुड़ा हो. लेकिन केवल आरोप, आलोचना या पुराना फैसला देना recusal का आधार नहीं माना जाता.

क्या हर आरोप पर जज हट जाते हैं?

नहीं. भारतीय न्यायपालिका में यह स्पष्ट सिद्धांत है कि केवल “शक” या “आरोप” के आधार पर जज को केस से अलग नहीं किया जा सकता. अगर ऐसा होने लगे, तो कोई भी पक्ष मनचाहे जज को हटाने के लिए आरोप लगाकर न्याय प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है. इसलिए कोर्ट इस मामले में संतुलन बनाए रखती है.जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस एमआर शाह व अन्य ने भी खुद को केस से अलग नहीं किया.

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