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SIR प्रक्रिया में रुकावट बर्दाश्त नहीं की जाएगी! बंगाल SIR पर SC की दो टूक, ममता सरकार से पूछे तीखे सवाल

पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर ममता बनर्जी और चुनाव आयोग आमने-सामने हैं. मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि SIR प्रक्रिया में कोई रुकावट नहीं आने दी जाएगी.

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SIR पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, बंगाल सरकार से देरी पर पूछे सवाल

( Image Source:  Sora_ AI )

पश्चिम बंगाल में चल रहे Special Intensive Revision (SIR) को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और चुनाव आयोग के बीच टकराव अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है. सोमवार को सर्वोच्च अदालत ने चुनाव आयोग के जवाब पर सुनवाई की, जिसमें पश्चिम बंगाल सरकार की आपत्तियों और आरोपों पर तीखी बहस देखने को मिली.

इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ कर रही है. ममता बनर्जी ने कोर्ट में दावा किया कि राज्य में करीब 1.36 करोड़ मतदाताओं के नाम एक 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी लिस्ट' में डाल दिए गए हैं, जिनके नाम मामूली गलतियों, जैसे सरनेम की स्पेलिंग, शादी के बाद बेटियों के पते में बदलाव, की वजह से हटाए जा सकते हैं.

ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर क्या आरोप लगाए?

ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि 8,300 माइक्रो ऑब्जर्वर केंद्र सरकार के अधिकारी हैं, जिन्हें बिना अधिकार के तैनात किया गया और ये मतदाता सूची से नाम हटाने का काम कर रहे हैं, जो असंवैधानिक है.

मुख्य न्यायाधीश ने क्या कहा?

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ संदेश दिया. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, “जो भी आदेश या स्पष्टीकरण जरूरी होगा, हम जारी करेंगे, लेकिन SIR प्रक्रिया में कोई रुकावट बर्दाश्त नहीं की जाएगी. यह सभी राज्यों को समझ लेना चाहिए.”

चुनाव आयोग ने कोर्ट को बताया कि उसने राज्य सरकार को पांच बार पत्र लिखकर अधिकारियों के नाम मांगे थे, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. आयोग के मुताबिक इसी वजह से माइक्रो ऑब्जर्वर्स की तैनाती करनी पड़ी. कोर्ट को यह भी बताया गया कि अब तक 8,500 अधिकारी तैनात किए जा चुके हैं.

बंगाल सरकार ने क्या कहा?

हालांकि, पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने आयोग के दावे को खारिज करते हुए कहा कि चुनाव आयोग ने कभी Group-B अधिकारियों की मांग ही नहीं की थी. वहीं, ममता बनर्जी की ओर से पेश वकील श्याम दीवान ने कहा कि अधिकारियों की सूची तैयार कर आयोग को भेज दी गई थी.

इस दौरान चीफ जस्टिस ने राज्य सरकार से सख्त सवाल पूछते हुए कहा, “जब 4 फरवरी को निर्देश दिए गए थे, तो फिर 7 फरवरी की रात 12 बजे ईमेल से नाम क्यों भेजे गए?” सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पूछा कि 8,000 से ज्यादा Group-B अधिकारियों के नाम भेजने में इतनी देरी क्यों हुई. फिलहाल मामला जारी है. कोर्ट की अगली सुनवाई पर सबकी नजरें टिकी हैं.

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