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Bengal Politics: सियासी विवादों के बीच TMC प्रमुख पर मुसलमानों का भरोसा अब भी कायम है?

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव अब नजदीक है. अहम सवाल यह है कि क्या ममता दीदी इस बार चुनाव हारेंगी या जीतेंगी. बंगाल के पॉलिटिक्स में सियासी विवादों और आरोपों के बावजूद क्या TMC प्रमुख ममता बनर्जी पर मुसलमानों का भरोसा अब भी कायम है? मुस्लिम वोट बैंक की ताकत, बदलते रुझान और आने वाले चुनावों पर इसका क्या होगा असर, जानें सब कुछ.

Bengal Politics: सियासी विवादों के बीच TMC प्रमुख पर मुसलमानों का भरोसा अब भी कायम है?
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पश्चिम बंगाल की राजनीति में मुस्लिम वोट बैंक हमेशा से सत्ता की दिशा तय करने वाला अहम फैक्टर रहा है. बीते एक दशक में यह वोट बैंक जिस तरह से तृणमूल कांग्रेस (TMC) और उसकी प्रमुख ममता बनर्जी के साथ मजबूती से खड़ा दिखा, उसने राज्य की सियासत की तस्वीर ही बदल दी. हालांकि हाल के वर्षों में TMC सरकार पर भ्रष्टाचार, तुष्टिकरण, कानून-व्यवस्था और अंदरूनी कलह जैसे कई सियासी विवाद खड़े हुए हैं. इसके बावजूद सबसे बड़ा सवाल यही है - क्या मुसलमानों का भरोसा अब भी ममता बनर्जी पर कायम है?

BJP के लगातार बढ़ते दबाव, AIMIM जैसे नए खिलाड़ियों की एंट्री और विपक्ष के तीखे हमलों के बीच मुस्लिम मतदाता किस दिशा में जा रहा है, यह आने वाले चुनावों के लिए निर्णायक साबित हो सकता है। क्या TMC अब भी मुस्लिम समुदाय के लिए “सबसे सुरक्षित राजनीतिक विकल्प” बनी हुई है, या फिर इस भरोसे में धीरे-धीरे दरार आ रही है?

TMC के पक्ष में मुस्लिम अब भी लामबंद

पश्चिम बंगाल के राजनीति विश्लेषक निर्भय देव्यांश का इस मसले पर कहना है कि पंश्चिम बंगाल में 27 से 30 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं. लोकतंत्र में चुनाव के लिहाज से यह एक बहुत बड़ा फैक्टर है. यह फैक्टर टीएमसी के पक्ष में आज भी पहले की तरह काम कर रहा है. हिंदू मतदाता की बात करें तो ओबीसी और सवर्ण मतदाता बीजेपी के साथ हैं. बाहरी लोग भी बीजेपी को ही वोट करते हैं, इसके उलट, 25 प्रतिशत स्थानीय मतदाता टीएमसी को वोट करते हैं. मुस्लिम वोट और मूल बाशिंदे मतदाता मिलाकर 50 प्रतिशत से ज्यादा हो जाते हैं. आप ये समझिए, सीपीएम वोट बैंक ममता बनर्जी के साथ है. हर चुनाव में 40 से 52 प्रतिशत वोट टीएमसी के पक्ष में जाता है.

पंचायत से कोलकाता तक का कॉन्टैक्ट नंबर

निर्भय देव्यांस का कहना है कि आप ममता बनर्जी को बिहार के नीतीश कुमार के रूप में देख सकते है. नीतीश कुमार के समर्थक हर समुदाय में हैं. वह जमीन पर अपनी पकड़ बनाए हुए हैं. उनका बिहार में खुद का बनाया कैडर है. यह बात अलग है कि 2020 में उन्हें सिर्फ 43 सीटें मिलीं, लेकिन 2025 में वो अपनी पकड़ के बल फिर बिहार के दूसरी बड़ी पार्टी के रूप में उभरे और सीएम बने. जिस तरह से बिहार में बीजेपी के पास कोई ऐसा नेता नहीं है, जिसकी पकड़ कम या ज्यादा पूरे बिहार में हो, उसी तरह से पश्चिम बंगाल में भी बीजेपी के पास प्रभावी और जमीनी नेता नहीं है. दिलीप घोष व अन्य नेता उभरे तो बीजेपी ने उन्हें पीछे कर दिया. शुभेंदु अधिकारी को बीजेपी ने आगे बढाया है.

अगर आप जमीन पर काम नहीं करेंगे तो पार्टी का चेहरा जमीन पर नहीं उभरेगा. अलीमुद्दीन, बीमान बोस, बुद्धदेव भट्टाचार्य काम करते थे. वहीं काम ​सुब्रत बख्शी अब कर रहे हैं. टीएमसी के हर मामले का समाधान करने में प्रभावी साबित होते हैं. खुद ममता बनर्जी हर स्तर के लोगों का संपर्क नंबर रहता है. यह बहुत बड़ी बात है. पश्चिम बंगाल में ऐसा नेता अभी बीजेपी के पास नहीं है.

BJP का संगठन कमजोर, गुटबाजी हावी

पश्चिम बंगाल में बीजेपी का संगठन कमजोर है. पार्टी नेताओं के बीच गुटबाजी है. दिलीप घोष के नेतृत्व में 2019 के चुनाव में बीजेपी पश्चिम बंगाल में 18 सांसद जीते. 2021 विधानसभा चुनाव में हार के बाद उन्हें साइड कर दिया. हाल ही में अमित शाह ने प्रदेश का दौरान किया. उन्होंने दिलीप घोष को बुलाकर एक्टिव होने को कहा. इस तरह से कोई एक्टिव होता है क्या? आप पांच साल इन एक्टिव रखेंगे और चुनाव के समय एक्टिव होने को कहेंगे. ऐसे में चुनावी जीत कैसे मिलेगी? उनकी जगह शुभेंदु अधिकारी को आगे बढ़ाया. सुकांतो मजूमदार प्रदेश अध्यक्ष बनाया. संगठन की मजबूती और फाइटर लीडर होने से ग्राउंड पर करिश्मा होता है. बीजेपी मेहनत कर रही है, लेकिन पार्टी के हिसाब से परिणाम आना मुश्किल है.

'मिडिल क्लास' गेम चेंजर

उनहोंने कहा कि एक फैक्टर है मिडिल क्लास. ​पश्चिम बंगाल के मिडिल क्लास में बड़े पैमाने पर नाराजगी है. मिडिल क्लास में आने वाले वोटर्स 'दीदी' (ममता बनर्जी) से असंतुष्ट है. इस वर्ग का वोट बैंक 15 से 20 प्रतिशत है. इस क्लास का कहना है कि हर बार दीदी ही क्यों? अगर ये फैक्टर बीजेपी के पक्ष में काम कर गया तो ममता का समीकरण बिगड़ सकता है.

वाम और कांग्रेस निष्क्रिय

उन्होंने कहा कि बिहार चुनाव में प्रशांत किशोर का असर क्यों नहीं दिखा, क्योंकि उन्होंने बूथ स्तर पर काम नहीं किया था. आप चुनाव जीतना चाहते हैं तो अपना कैडर पंचायत और बूथ स्तर पर न केवल बनाना होगा बल्कि उसे एक्टिव भी करना होगा. इस मामले में कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां कुछ नहीं कर रही है. दोनों पार्टी पश्चिम बंगाल में पूरी तरह से बैठ गई है. जहां तक हुमायूं कबीर की बात है तो उनका कद असदुद्दीन ओवैसी जैसा नहीं है. बंगाल में वो भी मुश्किल से एक प्रतिशत ही बटोर पाएंगे. मुस्लिम वोट बंगाल में पूरी तरह से टीएमसी के पक्ष में कंसोलोलिडेट हैं.

बंगाल में 'पीके' साबित होंगे कबीर

बंगाल में हुमायूं कबीर, ओवैसी और धार्मिक मौलवी इरशाद व मतुआ समुदाय के नेता मुस्लिम वोट को बांटने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वो अपने मुहिम में कामयाब नहीं होंगे. कबीव बंगाल का ओवैसी बनना चाहते हैं, पर उनमें वो दम नहीं है. हुमायूं कबीर बड़ा फैक्टर नहीं होगा.

'दीदी का नुतुन जन्म होय गेलौ'

एक खास बात यह है कि हाल ही में जो ईडी के आई-पैक के दफ्तर पर छापेमारी की. उसके खिलाफ सीएम ममता बनर्जी ने खुद मोर्चा संभाल लियास. आपको क्या लग रहा है इससे ममता के खिलाफ लोगों में असंतोष फैलेगा. ऐसा नहीं है. टीएमसी के कैडर के लोग यही सोचते हैं कि जब जब टीएमसी पर अत्याचार होता है, तब-तब दीदी का पुनर्जन्म होता है. टीएमसी के समर्थक कहते हैं, ईडी के रेड से 'दीदी का नुतुन जनम होय गेलौ' यानी ईडी की कार्रवाई से ममता के साथ एक बार फिर उनके समर्थक उठ खड़े हुए है.

27 से 30 प्रतिशत मतदाता मुसलमान

मुसलमान पश्चिम बंगाल की आबादी का लगभग 27 से 30 प्रतिशत हैं. इस समुदाय का प्रभाव लगभग 100 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर निर्णायक माना जाता है. खासकर कोलकाता, मुर्शिदाबाद, मालदा, 24-परगना आदि जिले में. पश्चिम बंगाल विधानसभा में कुल 294 सीटें हैं.

2011 और 2016 में विधानसभा में मुसलमानों की संख्या लगभग समान थी. 59 मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे. 59 में से काफी संख्या TMC के टिकट पर मुस्लिम प्रत्याशियों ने जीत हासिल की थी. 2021 में 44 ​मुस्लिम विधायक चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे.

मुस्लिम मतदाताओं ने TMC को कितनी वोट दीं?

एक अनुमान के मुताबिक 2016 विधानसभा में लगभग 50% मुस्लिम मतदाताओं ने TMC को सपोर्ट किया था. 2019 लोकसभा में यह आंकड़ा 70% तक पहुंच गया था. सीडीएस सर्वे के मुताबिक 2021 विधानसभा में Muslim वोट में फिर से TMC का लगभग 75% वोटशेयर रहा.

2011 से पहले मुसलमान किसे वोट करते थे?

1950-1970 के दशक में मुस्लिम मतदाता कांग्रेस के साथ अधिक जुड़े रहे. 1977–2011 तक मुसलमानों का समर्थन Left Front की तरफ रहा. यह दल हिन्दुत्व-विरोधी, सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर काम करता था. 2011 के बाद से मुसलमानों का अधिकांश वोट TMC के पक्ष में केंद्रित रहा क्योंकि यह पार्टी खुद को सेक्युलर और अल्पसंख्यक हितैषी के रूप में पेश करती है.

ममता बनर्जी से मुसलमानों का लगाव क्यों?

  • TMC सरकार ने अल्पसंख्यकों के लिए नीतियां दीं जैसे मदरसों को समर्थन, स्कॉलरशिप, इमाम-भत्ता तथा उर्दू को सरकारी स्‍थानिक भाषा का दर्जा देना आदि.
  • ममता बनर्जी ने BJP-के CAA/NRC जैसे प्रस्तावों का विरोध किया, जिससे मुसलमानों को सुरक्षा-भावना मिली.
  • ममता बनर्जी ने खुद को हिन्दू-मुसलमान मतदाताओं के बीच एक धर्मनिरपेक्ष नेता के रूप में पेश किया.

क्या मुस्लिम टूट रहा है?

हाल के राजनीतिक बदलाव से संकेत मिलते हैं कि AIMIM और कुछ अन्य छोटे दल मुस्लिम मतदाताओं को विभाजित करने की कोशिश कर रहे हैं. CSDS जैसे सर्वे में मुस्लिम समर्थन TMC के लिए 2024 में 2021 के मुकाबले घटा दिखता है. इसलिए, वोट पूरा टूटेगा कहना मुश्किल हैं, पर थोड़ा विभाजन संभावित है.

India Newsममता बनर्जी
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