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राहुल के डियर वेणुगोपाल को पछाड़ कैसे सतीशन चुने गए केरल के सीएम? मुस्लिम लीग और वायनाड कनेक्शन पड़ा कांग्रेस पर भारी!

वेणुगोपाल को पीछे छोड़ VD सतीशन केरल CM बने. IUML समर्थन, वायनाड मुस्लिम वोट और कांग्रेस की चुनावी रणनीति फैसले में अहम रही.

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केरल में मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर 10 दिनों तक चली कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान के बाद आखिरकार 14 मई को प्रदेश के वरिष्ठ नेता VD सतीशन के नाम पर खत्म हुई. शुरुआत में पार्टी महासचिव KC वेणुगोपाल को सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा था, लेकिन आखिरी दौर में समीकरण तेजी से बदल गए. कांग्रेस को एहसास था कि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) का समर्थन गंवाना राजनीतिक रूप से भारी पड़ सकता है. खासकर वायनाड जैसी सीटों पर जहां मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं. इसी वजह से संगठन, सहयोगी दलों और चुनावी गणित के बीच संतुलन साधते हुए कांग्रेस ने सतीशन पर दांव लगाया.

सूत्रों के मुताबिक वायनाड से सांसद प्रियंका गांधी ने सतीशन को सीएम बनाने पूरी ताकत लगा दी थी. उसमें प्रियंका को इस बार सफलता भी मिली. उन्होंने केरल में मुस्लिम लीग की अहमियत को देखते हुए सतीशन के नाम पर अंतत: राहुल गांधी का राजी कर लिया. अब BJP इस फैसले को ‘मुस्लिम लीग के दबाव’ और ‘तुष्टीकरण की राजनीति’ से जोड़कर कांग्रेस पर हमलावर है.

10 दिन के सस्पेंस के बाद सतीशन के नाम पर मुहर

केरल में एलडीएफ की हार और कांग्रेस की जीत के बाद सबसे बड़ा सवाल मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर था. शुरुआती दौर में कांग्रेस महासचिव KC वेणुगोपाल को सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा था. पार्टी नेतृत्व के करीबी होने की वजह से उन्हें राहुल गांधी का भरोसेमंद चेहरा भी माना जाता है. लगभग यह मानकर चला जा रहा था कि वेणुगोपाल ही इस बार केरल के सीएम बनेंगे.

लेकिन अंतिम दौर में कांग्रेस ने VD सतीशन को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला कर सबको चौंका दिया. 61 वर्षीय सतीशन को जमीनी नेता माना जाता है और चुनावी जीत का बड़ा श्रेय भी उन्हें दिया गया. पार्टी के भीतर यह धारणा बनी कि राज्य की राजनीति और संगठन पर उनकी पकड़ वेणुगोपाल से ज्यादा मजबूत है. साथ ही मुस्लिग लीग के नेता भी उन्हीं के पक्ष में हैं.

IUML का समर्थन बना सबसे बड़ा फैक्टर

दरअसल, सतीशन के पक्ष में सबसे बड़ा माहौल इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) ने बनाया. कांग्रेस नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) में IUML दूसरी सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी है और उसके पास 22 विधायक हैं.

कांग्रेस को यह डर था कि अगर IUML नाराज होती है तो उसका असर सिर्फ सरकार पर नहीं, बल्कि भविष्य के चुनावों पर भी पड़ सकता है. वायनाड की सीट भी इससे अछूता नहीं रहेगा. राज्य की कई सीटों पर कांग्रेस की जीत मुस्लिम लीग के कैडर और वोट ट्रांसफर पर निर्भर मानी जाती है. यही वजह रही कि सतीशन के नाम को लेकर IUML खुलकर सकारात्मक दिखी. जबकि वेणुगोपाल को लेकर सहयोगी दलों में वैसी उत्सुकता नहीं दिखाई दी.

वायनाड कनेक्शन ने बदला पूरा गणित

वायनाड सीट कांग्रेस के लिए सिर्फ एक लोकसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति का अहम केंद्र बन चुकी है. यहां करीब 45 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं और यह प्रियंका गांधी वाड्रा की सीट भी मानी जाती है. कांग्रेस को लगा कि IUML के साथ टकराव का असर सीधे वायनाड समेत उत्तर केरल की कई सीटों पर पड़ सकता है. ऐसे में पार्टी नेतृत्व ने जोखिम लेने से बचते हुए ऐसा चेहरा चुना, जिस पर सहयोगी दल सहज हों. यही वह राजनीतिक समीकरण था जिसने सतीशन को अचानक मजबूत दावेदार बना दिया.

वेणुगोपाल के सामने उपचुनाव की चुनौती

KC वेणुगोपाल लोकसभा सांसद हैं. अगर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाता तो छह महीने के भीतर विधानसभा का चुनाव लड़ना पड़ता. कांग्रेस के भीतर यह सवाल भी उठा कि क्या पार्टी लगातार चुनावी मोड में जाने के लिए तैयार है? हालिया, चुनावी थकान और संगठनात्मक दबाव को देखते हुए पार्टी अतिरिक्त जोखिम नहीं लेना चाहती थी. इसी वजह से ऐसा नेता चुनने की कोशिश हुई जो पहले से विधानसभा राजनीति में सक्रिय हो और जिसे तुरंत किसी उपचुनाव की जरूरत न पड़े. इस मामले में सतीशन स्वाभाविक विकल्प बनकर उभरे.

क्या सिर्फ मुस्लिम लीग के दबाव में हुआ फैसला?

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जरूर है कि IUML ने सतीशन के पक्ष में माहौल बनाया, लेकिन केवल सहयोगी दल के दबाव में कांग्रेस ने फैसला लिया हो, ऐसा मानना पूरी तरह सही नहीं होगा. असल में यह फैसला कई राजनीतिक कारणों का नतीजा है. इनमें संगठनात्मक स्वीकार्यता, चुनावी समीकरण, उपचुनाव का जोखिम और सहयोगी दलों की सहमति. हालांकि, इतना जरूर माना जा रहा है कि IUML की राय को कांग्रेस ने इस बार गंभीरता से लिया और अंतिम फैसले में उसका असर साफ दिखाई दिया.

BJP ने शुरू किया ‘मुस्लिम लीग’ हमला

वीडी सतीशन का केरल का मुख्यमंत्री बनते ही BJP ने कांग्रेस पर तीखे हमले शुरू कर दिए. भगवा पार्टी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने IUML के दबाव में झुककर फैसला लिया है और वह केरल में भी ‘तुष्टीकरण की राजनीति’ कर रही है. BJP नेताओं ने इसे कांग्रेस की अल्पसंख्यक वोट बैंक राजनीति से जोड़ते हुए कहा कि अब कांग्रेस और मुस्लिम लीग में फर्क करना मुश्किल हो गया है. बीजेपी की ओर से यह हमला इसलिए भी अहम है क्योंकि दक्षिण भारत में BJP लगातार कांग्रेस को ‘मुस्लिम appeasement’ के मुद्दे पर घेरने की कोशिश कर रही है.

असम से लेकर दिल्ली तक गूंजा ‘मुस्लिम लीग’ तंज

कांग्रेस पर ‘मुस्लिम लीग’ होने का आरोप नया नहीं है. हाल ही में असम में AIUDF प्रमुख बदरुद्दीन अजमल ने भी कांग्रेस को ‘मुस्लिम लीग जैसी पार्टी’ बताया था. अजमल ने आरोप लगाया था कि कांग्रेस अब सिर्फ अल्पसंख्यक वोटों पर निर्भर होती जा रही है. यह बयान उस समय आया था, जब कांग्रेस के कई विजयी विधायक मुस्लिम समुदाय से थे. इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कांग्रेस को ‘MMC यानी मुस्लिम लीग माओवादी कांग्रेस’ कहकर निशाना बना चुके हैं. बिहार और असम की राजनीति में BJP लगातार इस नैरेटिव को आगे बढ़ाती रही है.

कांग्रेस के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती क्या?

सतीशन को मुख्यमंत्री बनाकर कांग्रेस ने फिलहाल अंदरूनी विवाद खत्म कर दिया है, लेकिन अब असली चुनौती राजनीतिक संदेश की है. एक तरफ उसे अपने सहयोगी दलों को साथ रखना है, दूसरी तरफ BJP के ‘तुष्टीकरण’ वाले हमलों का जवाब भी देना है. अगर सतीशन सरकार प्रशासन और विकास पर फोकस करती है तो कांग्रेस इस विवाद से बाहर निकल सकती है, लेकिन अगर पहचान की राजनीति हावी रही तो BJP आने वाले समय में इसी मुद्दे को बड़ा चुनावी हथियार बना सकती है.

राहुल गांधी
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