पूर्व सेना प्रमुख नरवणे की आत्मकथा ही नहीं, सीनियर आर्मी ऑफिसर का 19 साल पुराना R&AW केस भी बना ‘डर की मिसाल’
पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की आत्मकथा Four Stars of Destiny अभी तक प्रकाशित नहीं हुई, लेकिन इसने संसद से लेकर मीडिया तक बड़ी बहस छेड़ दी है. इससे पहले मेजर जनरल वी.के. सिंह भी अपनी किताब के कारण कानूनी विवाद में फंस चुके हैं. क्या रिटायर्ड सैन्य अधिकारी अपने अनुभव साझा नहीं कर सकते?
पूर्व आर्मी चीफ जनरल एम.एम. नरवणे की आत्मकथा Four Stars of Destiny भले अभी तक बाजार में न आई हो, लेकिन इस किताब ने देश की राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था में बड़ा तूफान खड़ा कर दिया है. संसद से लेकर मीडिया तक बहस छिड़ गई है कि क्या एक रिटायर्ड सैन्य अधिकारी अपनी आत्मकथा में अपने अनुभव साझा नहीं कर सकता.
सरकार ने संसद में यह कहकर विवाद और बढ़ा दिया कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी जनरल नरवणे की किताब के अंश नहीं पढ़ सकते, क्योंकि यह पुस्तक अभी प्रकाशित नहीं हुई है. लेकिन सरकार यह नहीं बता रही कि यह किताब खुद उसके रक्षा मंत्रालय द्वारा पिछले एक साल से “रिव्यू” के नाम पर रोकी गई है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, जनरल नरवणे अकेले ऐसे अधिकारी नहीं हैं जिनकी किताबों को लेकर सरकार ने आपत्ति जताई हो. उनसे पहले भी कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी अपनी किताबों के कारण भारी कानूनी परेशानियों में फंस चुके हैं. इनमें सबसे चर्चित नाम है मेजर जनरल वी.के. सिंह का.
19 साल पुराना मामला, आज भी जारी है ट्रायल
मेजर जनरल वी.के. सिंह, जो 2002 में रिटायर हुए थे, ने 2007 में एक किताब लिखी - India’s External Intelligence - Secrets of Research and Analysis Wing (प्रकाशक: Manas Publications). इस किताब में उन्होंने भारत की खुफिया एजेंसी R&AW (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) की काम करने के तौर तरीकों और संभावित भ्रष्टाचार के कुछ पहलुओं का जिक्र किया.
किताब प्रकाशित होते ही सरकार हरकत में आई. CBI ने उनके खिलाफ ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट (OSA) के तहत मामला दर्ज कर लिया. उनके गुरुग्राम स्थित घर पर छापा पड़ा. कंप्यूटर, पासपोर्ट और निजी डायरियां जब्त कर ली गईं. आज 19 साल बाद भी, 81 साल के हो चुके मेजर जनरल वी.के. सिंह जमानत पर हैं और उनके खिलाफ ट्रायल “असल में शुरू भी नहीं हुआ” है.
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में मेजर जनरल सिंह ने बताया कि हाल ही में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है, क्योंकि उन्हें आज तक उन दस्तावेजों की पूरी कॉपी नहीं दी गई जिनके आधार पर उनके खिलाफ केस चल रहा है. उनका कहना है कि, “मैंने सार्वजनिक हित में यह किताब लिखी थी. अब लगभग दो दशक से मुकदमा झेल रहा हूं. यह मानसिक, शारीरिक और आर्थिक उत्पीड़न है.” सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका पर CBI को नोटिस जारी कर दिया है.
‘रिटायर्ड अफसरों पर कोई गैग ऑर्डर नहीं’
मेजर जनरल सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि उन्हें कभी कोई लिखित आदेश नहीं मिला कि रिटायर होने के बाद उन्हें अपनी किताब रक्षा मंत्रालय से मंजूर करानी होगी. उनके मुताबिक, “आर्मी रूल्स 1954 का सेक्शन 21 केवल सेवारत सैन्य कर्मियों पर लागू होता है. रिटायर्ड अफसरों पर नहीं.” उन्होंने यह भी कहा कि 1972 के पेंशन नियम इंटेलिजेंस ब्यूरो और BSF जैसे संगठनों पर लागू होते हैं, लेकिन सेना के रिटायर्ड अफसरों पर नहीं. 2021 में नियमों में जो संशोधन हुआ, वह भी सिर्फ संवेदनशील सिविल संगठनों के अधिकारियों पर लागू होता है, सेना के रिटायर्ड अफसरों पर नहीं.
नरवणे की किताब में पब्लिशर ने ही मांगी मंजूरी!
मेजर जनरल सिंह ने जनरल नरवणे की किताब पर हैरानी जताई. उन्होंने कहा, “यह पहली बार सुन रहा हूं कि किसी किताब के लिए पब्लिशर ने रक्षा मंत्रालय से क्लीयरेंस मांगी हो. आमतौर पर अगर कोई एहतियात बरतता है तो वह लेखक करता है, न कि पब्लिशर.” जनरल नरवणे की आत्मकथा के कुछ अंश 18 दिसंबर 2023 को PTI ने प्रकाशित किए थे. पेंगुइन रैंडम हाउस ने इसे जनवरी 2024 में लॉन्च करने की योजना बनाई थी. लेकिन रक्षा मंत्रालय ने किताब को “रिव्यू” में डाल दिया और तब से यह फंसी हुई है.
‘मेरे केस ने दूसरों को डरा दिया’
मेजर जनरल सिंह का कहना है कि उनके केस ने रिटायर्ड सैन्य अधिकारियों के बीच डर पैदा कर दिया है. उन्होंने कहा, “मेरे जैसे मामले की वजह से बहुत से रिटायर्ड अफसर अब किताब लिखने से बचते हैं. खासकर वे अधिकारी जो R&AW, NTRO या DRDO जैसे संगठनों में डेपुटेशन पर काम कर चुके होते हैं.” उनका मानना है कि लोग अब अपने अनुभव साझा करने से इसलिए डरते हैं क्योंकि कहीं उन्हें भी ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत फंसा न दिया जाए.
‘मैं व्हिसलब्लोअर की तरह काम कर रहा था’
मेजर जनरल सिंह का दावा है कि उनकी किताब में उन्होंने उन क्षेत्रों की ओर इशारा किया था जहां भ्रष्टाचार की आशंका थी, न कि गोपनीय जानकारियां लीक की थीं. CBI ने उनके खिलाफ जिन बातों को “सीक्रेट डिस्क्लोजर” बताया, उनमें शामिल हैं, R&AW के चार्टर और जिम्मेदारियों का विवरण, एजेंसी की तकनीकी क्षमताओं के अपग्रेड की जानकारी और कुछ R&AW स्टेशनों की लोकेशन. 2009 में चीफ मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ने आदेश दिया था कि जिन दस्तावेजों के आधार पर चार्जशीट दाखिल की गई है, उनकी कॉपी आरोपी को दी जाए. लेकिन CBI ने इस आदेश को चुनौती दे दी, और तभी से केस लटका हुआ है.
हाईकोर्ट का आदेश और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
सितंबर 2025 में दिल्ली हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि जो दस्तावेज “भारत की संप्रभुता और अखंडता” को प्रभावित कर सकते हैं, उन्हें ब्लैक आउट कर दिया जाएगा. और आरोपी को केवल सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक निरीक्षण की अनुमति दी जाएगी. मेजर जनरल सिंह ने इस आदेश को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. उनकी याचिका में कहा गया है कि, “18 साल से मुकदमा झेलना न्याय की अवधारणा के खिलाफ है. यह मेरी जिंदगी को मानसिक और आर्थिक रूप से बर्बाद कर रहा है.”
नरवणे ने छोड़ दी आत्मकथा लिखने की उम्मीद
इस पूरे विवाद के बीच जनरल नरवणे ने अपनी आत्मकथा को प्रकाशित कराने की उम्मीद छोड़ दी. बाद में उन्होंने सैन्य फिक्शन लिखना शुरू किया. उनकी फिक्शन किताब The Cantonment Conspiracy पिछले साल प्रकाशित हुई. इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में उन्होंने कहा था, “मैं आगे बढ़ चुका हूं.”
बड़ा सवाल: क्या रिटायर्ड अफसर सच नहीं लिख सकते?
इस पूरे मामले ने बड़ा संवैधानिक और लोकतांत्रिक सवाल खड़ा कर दिया है. क्या रिटायर्ड सैन्य अधिकारी अपने अनुभवों को किताब के रूप में साझा नहीं कर सकते? क्या हर ऐसी किताब को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के नाम पर रोका जा सकता है? और क्या ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट का इस्तेमाल आलोचनात्मक आवाजों को दबाने के लिए किया जा रहा है?
जनरल नरवणे की रुकी हुई आत्मकथा और मेजर जनरल वी.के. सिंह का 19 साल पुराना केस अब सिर्फ कानूनी मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा की बहस का प्रतीक बन चुका है.





