कोई एक्स आर्मी चीफ देश-सेना विरोधी किताब क्यों लिखेगा? 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' में कुछ दमदार तो है जिसने LS स्थगित करा दी!
पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की किताब Four Stars of Destiny को लेकर संसद तक ठप हो गई. रिटायर्ड अफसरों का सवाल- क्या कोई पूर्व सेनाध्यक्ष देश-विरोधी लिख सकता है?
भारत में अब तक मनोज मुकुंद नरवणे पहले ऐसे थलसेनाध्यक्ष सिद्ध या साबित हुए हैं जिनसे जुड़े मुद्दे को लेकर देश की लोकसभा (संसद) सोमवार (2 फरवरी 2026) स्थगित करनी पड़ गई. लोकसभा स्थगित कराने के प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार माने जा रहे हैं विपक्षी दल के नेता (नेता प्रतिपक्ष) और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी. हालांकि इस तमाम बवाल की जड़ में भारत के पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल एम एम नरवणे की किताब “फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी” (Four Stats of Destiny) ही है जो अब तक प्रकाशित तक नहीं हुई है.
जो किताब छपी ही नहीं है आखिर उसमें देश की हुकूमत ने ऐसा क्या लिखा देख और पढ़ लिया कि, जिसके चलते देश की हुकूमत ने संसद को तो स्थगित कराना मंजूर किया. हुकूमत ने मगर इस सब बवाल के बाद भी पूर्व थलसेनाध्यक्ष की अप्रकाशित किताब को न तो प्रकाशित करने की ही अनुमति दी. न ही केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने यही पत्ता खोला कि, आखिर इस किताब में ऐसा क्या डराने वाला है जिस डर से हुकूमत किताब को बीते करीब 2 साल से प्रकाशित करने की अनुमति भी लेखक को नहीं दे रही है.
यहां तो सब उल्टा ही देख रहा हूं
इन्हीं तमाम सवालों के जवाब के लिए स्टेट मिरर हिंदी के एडिटर क्राइम इनवेस्टीगेशन ने मंगलवार को एक्सक्लूसिव बात की भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) जसिंदर सिंह सोढ़ी से. जे एस सोढ़ी ने कहा, “दरअसल किताब में क्या लिखा है, इसकी जिम्मेदारी किताब को पढ़ने और देखने वाले से ज्यादा होती है लेखक की कि, उसने अपनी किताब में क्या लिखा है? इस घटना में तो मैं सबकुछ एकदम उल्टा ही देख रहा हूं.
अब पूर्व थलसेनाध्यक्ष अविश्वनीय क्यों?
किताब के लेखक और भारतीय थलसेना के पूर्व प्रमुख मनोज मुकुंद नरवणे जिनके कंधों पर कभी हिंदुस्तान की हुकूमत ने सेना और देश की हदों की सुरक्षा की जिम्मेदारी विश्वास करके सौंपी थी, आज अपनी किताब को लेकर कल के वही इतने काबिल और सरकार के विश्वासपात्र रहे एम एम नरवणे साहब, सरकार को संदिग्ध क्यों लगने लगे? यह ऐसा सवाल है जो न केवल एक फौजी होने के नाते मेरे जेहन में कौंध रहा है? अपितु यह सवाल हर फौजी और हर भारतवासी के दिमाग में कौंध रहा होगा. और यह सवाल कौंधना लाजिमी भी है.
क्यों हुकुमत की आंखों की किरकिरी बने मनोज मुकुंद नरवणे?
यहां बताना जरूरी है कि भारत और भारत की थलसेना के वही पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल नरवणे हैं जिन्होंने, 15 दिसंबर 2021 से 30 अप्रैल 2022 तक 28वें सेनाध्यक्ष के साथ-साथ अस्थायी अध्यक्ष चीफ ऑफ स्टाफ समिति के रूप में भारत सेवाएं दीं. जनरल नरवणे ने 31 दिसंबर 2019 को जनरल बिपिन रावत से सीओएएस का पदभार संभाला था. पीवीएसएम एवीएसएम एसएम वीएसएम एडीसी जैसे तमगो से बीते कल में इसी भारत द्वारा सुशोभित-सम्मानित किए जा चुके मनोज मुकुंद नरवणे महज एक किताब “Four Stars of Destiny” लिखते ही क्यों और कैसे किस वजह से आज की मौजूदा हुकूमत की आंखों में करकने लगे हैं.
सरकार क्यों घबरा रही है?
एक सवाल के जवाब में भारतीय सेना के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जे एस सोढ़ी कहते हैं, “किताब पढ़ने वाले से ज्यादा किताब में लिखे हुए गलत मजमून की जिम्मेदारी लेखक की कहीं ज्यादा होती है. उसके बाद कुछ हद तक प्रकाशक भी किताब में कुछ अनाप-शनाप लिखे हुए को छापने के लिए जिम्मेदार होता है. इस बवाल में तो लेखक भी कोई हल्की-फुल्की और संदिग्ध शख्शियत नहीं है. जनरल मनोज मुकुंद नरवणे भारत के पूर्व थलसेनाध्यक्ष रहे हैं. वह भला सेना या देश के बारे में ऐसा क्या और क्यों लिखेंगे, जो भारतीय फौज और देश के खिलाफ हो. किसी देश के थलसेनाध्यक्ष का पद खैरात में या किसी के रहम-ओ-करम पर नहीं काबिलियत पर मिलता है.
कल के विश्वासपात्र फौजी पर आज शक क्यों?
जिस भारत की हुकूमत ने बीते कल में देश का सबसे काबिल और विश्वासपात्र फौजी अफसर मानकर मनोज मुकुंद नरवणे को देश की सेना की बागडोर और सरहदों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी थी. आज अगर वे ही नरवणे अपने निजी अनुभवों को किताब के रूप में कुछ साझा करना चाहते हैं, तो उनकी किताब के पब्लिकेशन पर ही रोक लगा दी गई है. मैं इससे असहमत हूं. यह तो अपने ही देश के कल के काबिल पूर्व सेनाध्यक्ष की मंशा पर शक करने जैसा है.”
सरकार ने किताब छापने पर क्यों लगाई है पाबंदी?
एक सवाल के जवाब में भारतीय सेना के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल ने कहा, “सरकार ने किताब छापने पर क्यों पाबंदी लगाई है? इस सवाल का जवाब तो हिंदुस्तान की हुकूमत ही ईमानदारी से दे सकती है और इसका जवाब हुकूमत को देना भी चाहिए. हां, इतना जरूर है कि अक्सर जो कुछ आंखों को दिखाई और कानों को सुनाई देता है. वह सच ही नहीं होता है. यह बात मैं पूर्व सेनाध्यक्ष की किताब के पब्लिकेशन पर लगाई गई पाबंदी के परिप्रेक्ष्य में कह रहा हूं. संभव है कि किताब में जनरल नरवणे ने कुछ ऐसी खामियां उजागर की हों जो सेना की कमान संभालने के दौरान उन्होंने फेस की थीं. यह वे कमियां भी हो सकती हैं किताब में जिन्हें पढ़कर भारतीय हुकूमत और भारतीय सेना की आने वाली पीढ़ियां कमियों को दूर या उनमें सुधार भी कर सकती हैं.
किताब के प्रकाशन पर पाबंदी गलत है
यहां तो किताब के पब्लिकेशन पर ही सीधे सीधे पाबंदी लगाकर, किताब में मौजूद अनुभवों को सामने आने से पहले ही उन्हें ताले में जबरदस्ती बंद कर डाला गया है. मुझे विश्वास है कि मनोज नरवणे जैसे भारत के जिम्मेदार पूर्व थलसेनाध्यक्ष किताब में ऐसी किसी बात का तो कम से कम उल्लेख नहीं ही करेंगे जो वह अपनों और अपने ही देश की नजरों में गिर जाएं. जहां तक सवाल किताब के भीतर अगर कुछ ऐसा मौजूद है जो सेना के कानूनों का उल्लंघन है तो उस हिस्से को हटाकर भी तो बाकी किताब प्रकाशित करने की परमीशन दी जा सकती है.”





