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EXCLUSIVE: लाखों करोड़ का रक्षा-बजट भी चीन-पाक-बांग्लादेश से भारत को नहीं जिता सकता! पूर्व ले. कर्नल सोढ़ी के खुलासे से हिल जाएंगे

भारत के बढ़ते रक्षा बजट पर सवाल उठाते हुए रिटायर्ड ले. कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी ने कहा कि बजट का सही इस्तेमाल न हो तो सेना कभी मजबूत नहीं हो सकती. उन्होंने वायुसेना से लेकर हथियार खरीद तक की गंभीर कमियां गिनाईं.

EXCLUSIVE: लाखों करोड़ का रक्षा-बजट भी चीन-पाक-बांग्लादेश से भारत को नहीं जिता सकता! पूर्व ले. कर्नल सोढ़ी के खुलासे से हिल जाएंगे
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संजीव चौहान
By: संजीव चौहान

Updated on: 2 Feb 2026 8:23 PM IST

जैसी उम्मीद थी भारत की हुकूमत ने देश की सेना को मजबूत बनाने और सीमाओं को अभेद्य (सुरक्षित) करने के लिए फिर से वित्तीय वर्ष 2026-2027 के बजट में भारी बढ़ोत्तरी कर दी है. क्या हर साल भारी भरकम रक्षा बजट से ही भारत की सीमाएं सुरक्षित और सेना मजबूत हो जाएगी? इसी सवाल के जवाब के लिए स्टेट मिरर हिंदी के एडिटर इनवेस्टीगेशन एक्लूसिव बात की रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी (ले.कर्नल जे एस सोढ़ी) से.

लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी जीओ पॉलिटिक्स, सैन्य रक्षा, विदेश नीति, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों के भारतीय विशेषज्ञ हैं. ले. कर्नल जे एस सोढ़ी ने जो कुछ और जिस बेबाकी से बयान किया उसने तो, हिंदुस्तानी हुकूमत के सालाना भारी-भरकम सैन्य-रक्षा बजट की धज्जियां ही उधेड़ डालीं. जो सच उन्होंने बयान किया है उसे सुनकर किसी भी भारतवासी की रूह कांप उठेगी और भारत के दुश्मनों की बांछें खिल उठेंगीं.

रक्षा बजट बढ़ाने का क्‍या फायदा?

बकौल सोढ़ी, “पूरा भारत 2026-2027 के वित्तीय वर्ष में सैन्य रक्षा बजट में इजाफे को लोकर खुश हो रहा है. मैं लेकिन इस बजट के बढ़ाये जाने से भी कतई संतुष्ट नहीं हूं. क्योंकि जब यह बजट साल के साल ही रक्षा सैन्य उपकरण गोला-बारूद लड़ाकू विमान की खरीद पर इस्तेमाल ही नहीं होगा, तब फिर ऐसे बढ़े हुए लाखों करोड़ के सैन्य बजट का क्या मतलब? देश की हुकूमत अगर सही मायने में देश की सेना को मजबूत और सीमाओं को अभेद्य बनाने के लिए ईमानदार है, तो मंजूर बजट को हर साल उसका तत्काल इस्तेमाल किए जाने पर भी उतनी ही गंभीर हो जाए, जितनी माथापच्ची हर साल हमारी सरकार सेना के बजट को बढ़ाने पर करती है.”

बिना इस्तेमाल वाले बजट की कीमत ही क्‍या?

खुलकर बताने की गुजारिश पर भारतीय थलसेना के पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी कहते हैं, “दरअसल भारतीय फौज में इस बजट को इस्तेमाल करने की मंजूरी मिलने का जो घटिया और बेहद पेचीदा सिस्टम मौजूद है, उसे खत्म करके भारतीय हुकूमत को यह तय करना चाहिए कि इस बजट को सेना कैसे जल्दी से जल्दी अपने इस्तेमाल में ला सके. हो इसके एकदम उल्टा रहा है कि बजट तो मिल गया भारतीय सेना को मगर इस भारी भरकम बजट का अधिकांश हिस्सा इस्तेमाल ही नहीं हो पाता है.”

क्‍या ऐसे बढ़ेगी सेना की ताकत?

जब बजट इस्तेमाल ही नहीं होगा तब सेना की ताकत कैसे बढ़ेगी? गोला-बारूद, सैन्य साज-ओ-सामान हवाई जहाजों की जब खरीद पर यह बजट इस्तेमाल ही वक्त रहते नहीं होगा तो फिर ऐसे मोटे बजट का होना न होना सब “जीरो” ही तो है. इसका उदाहरण मैं सिर्फ इतने से देना चाहता हूं कि भारत की वायुसेना के पास इस वक्त अरबों रुपये का बजट मौजूद है. हाल में 1 फरवरी 2026 को भी इस बजट में भारी इजाफा कर दिया गया है. इस सबके बावजूद हालत यह है कि भारत को चाहिए 54 लड़ाकू विमान और भारतीय वायुसेना के पास हैं सिर्फ 29 लड़ाकू विमान. अब बताइए कि भारतीय सेना के पास लाखों करोड़ का बजट होने के बाद भी जब लड़ाकू विमान तक पूरे नहीं हैं. तो ऐसे बजट का क्या मतलब जो हर साल कागज पर मंजूर होता है और कागज पर ही वापिस लौटा दिया जाता है. या आगे अगले वित्तीय वर्ष के लिए सरका दिया जाता है. इस तरह से भला कहीं किसी देश की सेना या वायुसेना कभी मजबूत हो सकी है.

क्‍या केवल रक्षा बजट बढ़ाने से सुरक्षित होंगी सीमाएं?

भले ही भारत की हुकूमत साल दर साल क्यों न रक्षा बजट में आंख मूंदकर बढ़ोत्तरी कर रही हो मगर यह सब बढ़ोत्तरी बेकार है. भारतीय वायुसेना को पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की तत्काल जरूरत है. जबकि भारत के स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एअरक्राफ्ट यानी एएमसीए बनने में भी और आगे कितने साल लगेंगे, यह सरकार को खुद भी नहीं पता है. तो फिर सोचो ऐसे में लाखों करोड़ का रक्षा बजट किस काम का है? ऐसे में भारत की मजबूरी है कि वह विदेशी निर्माता कंपनियों से यह जरूरत पूरी करें. विदेशी कंपनियां भी सबसे पहले भारत को ही लड़ाकू विमानों की आपूर्ति करने भर के लिए खाली नहीं बैठी हैं. उन्हें और भी देशों की सेनाओं के लिए रक्षा उपकरणों की डिलिवरी करनी है. मतलब साफ है कि लाखों करोड़ के बजट के बावजूद मजबूत और सीधी-सीधी कोई सरल हथियार-लड़ाकू हवाई जहाज निर्माण या आपूर्ति की सुविधा न होने से भी, यह लाखों करोड़ का रक्षा बजट बेकार और हमारी सेना व देश की हदें असुरक्षित हैं.

लाखों करोड़ों का भारी भरकम सैन्य बजट किस काम का?

लेट-लतीफी का अंदाजा इसी बात से लग सकता है कि हमारे रक्षा राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने कुछ समय पहले संसद में अधिकृत बयान दिया था, जिसके मुताबिक एफ-35 पर अभी तक कोई औपचारिक चर्चा ही नहीं हो सकी है. तो अब सोचो कि ऐसे में लाखों करोड़ों का भारी भरकम सैन्य बजट किस काम का जिससे समय रहते सेना को साज-ओ-सामान ही मुहैया न हो पा रहा हो. भारत के रक्षा राज्य मंत्री ने फरवरी 2025 में यानी करीब एक साल पहले भारत-अमेरिका संयुक्त बयान का हवाला देते हुए भारत आकर बताया था कि, पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान (एफ-35 जैसे) और भारत को पनडुब्बी प्रणालियों को जारी करने की नीति की समीक्षा करने के लिए अमेरिका सहमत हुआ था. लेकिन वह सिर्फ एक नीतिगत समीक्षा भर थी. न कि जमीनी हकीकत.

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