Exclusive: जेपी से अन्ना तक... क्या रामलीला मैदान से 2029 की सत्ता का रास्ता निकलेगा? INDIA ब्लॉक की रैली पर JNU प्रोफेसर का बड़ा दावा
रामलीला मैदान में INDIA ब्लॉक की रैली के बीच जेपी और अन्ना आंदोलन की यादें ताजा हैं. क्या विपक्ष की एकजुटता 2029 में सत्ता परिवर्तन का रास्ता खोल सकती है?
दिल्ली का रामलीला मैदान भारतीय राजनीति के इतिहास में सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि आंदोलनों, सत्ता के विरोध और राजनीतिक बदलावों का गवाह रहा है. इसी मैदान से कभी जयप्रकाश नारायण ने तत्कालीन इंदिरा सरकार के खिलाफ हुंकार भरी थी, तो कभी अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी थी. अब 1 नवंबर 2026 को INDIA ब्लॉक की 'वोट बचाओ, देश बचाओ' महारैली के साथ एक बार फिर रामलीला मैदान चर्चा में है. विपक्षी दलों ने चुनावी व्यवस्था, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला है.
ऐसे में सवाल है कि क्या रामलीला मैदान का इतिहास एक बार फिर दोहराया जा सकता है? क्या यहां से उठने वाली आवाज 2029 की राजनीति को प्रभावित कर सकती है?
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के प्रोफेसर फूल बदन का मानना है कि विपक्षी दलों का आंदोलन भारतीय राजनीति में बदलाव के संकेत दे रहा है. हालांकि, इसका असर तत्काल दिखाई देने के बजाय धीरे-धीरे सामने आएगा. उन्होंने स्टेट मिरर से बातचीत में कहा कि अगर विपक्षी दल जनता के मुद्दों से जुड़े रहते हैं और अपनी एकजुटता बनाए रखते हैं तो 2029 में सत्ता परिवर्तन की संभावना भी बन सकती है. लेकिन इसके लिए आंदोलन को लगातार चलाना होगा. सिर्फ एक रैली या कुछ महीनों के विरोध से सरकार बदलने जैसी स्थिति नहीं बनेगी.
जेपी आंदोलन से अन्ना हजारे तक, रामलीला मैदान ने देखे बड़े बदलाव
रामलीला मैदान का राजनीतिक महत्व समझने के लिए 1970 के दशक में लौटना होगा. प्रोफेसर फूल बदन ने कहा कि 25 जून 1975 को इस मैदान ने एक बड़ा मोड़ देखा. जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ एक रैली को संबोधित किया. उन्होंने भाषण के दौरान राष्ट्रीय कवि दिनकर की यह पंक्तियां सुनाई "सिंहासन खाली करो कि जनता आती है." उनके इस हुंकार के कुछ ही घंटों के बाद पूरे देश में आपातकाल लागू कर दिया गया था.
जेएनयू के प्रोफेसर अनुसार उस समय महंगाई, भ्रष्टाचार और सरकार के खिलाफ बढ़ते असंतोष के बीच जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में आंदोलन ने उस समय राष्ट्रीय रूप लिया. 25 जून 1975 को रामलीला मैदान में जेपी की बड़ी रैली हुई. इसी दौर में उनका आह्वान सत्ता के खिलाफ व्यापक राजनीतिक प्रतिरोध का प्रतीक बना. इसके बाद देश में आपातकाल लागू हुआ और विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं.
आपातकाल के बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से बाहर होना पड़ा और जनता पार्टी की सरकार बनी. इस घटनाक्रम ने दिखाया कि सड़क पर शुरू हुआ राजनीतिक आंदोलन किस तरह चुनावी राजनीति को प्रभावित कर सकता है.
इसके बाद 2011 में अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने रामलीला मैदान को फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया. लोकपाल की मांग को लेकर हुए अनशन को व्यापक जनसमर्थन मिला. इस आंदोलन से निकली राजनीतिक ऊर्जा ने आगे चलकर आम आदमी पार्टी के गठन की जमीन तैयार की. हालांकि, जेपी आंदोलन और अन्ना आंदोलन की परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन दोनों ने यह दिखाया कि जनमुद्दों पर लगातार चलने वाला आंदोलन राजनीतिक व्यवस्था पर दबाव बना सकता है.
बदलाव की शुरुआत हो चुकी है, लेकिन नतीजे तुरंत नहीं मिलेंगे
प्रोफेसर फूल बदन का कहना है कि विपक्षी दलों का आंदोलन अगर लगातार चलता रहा तो इसके राजनीतिक प्रभाव दिखाई देंगे. उनके मुताबिक, 2 अक्टूबर 2026 से विपक्षी दलों की गतिविधियों और आंदोलन ने राजनीति में नए संकेत देने शुरू कर दिए हैं. उन्होंने कहा कि बदलाव की शुरुआत हो चुकी है, लेकिन इसका असर चरणबद्ध तरीके से सामने आएगा.
प्रोफेसर फूल बदन के मुताबिक, विपक्ष यह उम्मीद नहीं कर सकता कि आज आंदोलन होगा और अगले कुछ महीनों में सरकार बदल जाएगी. राजनीतिक बदलाव के लिए लंबी प्रक्रिया और लगातार जनसंपर्क जरूरी है. उन्होंने कहा कि अगर विपक्षी दल जनता के सवालों को लेकर एकजुट रहते हैं और आंदोलन को निरंतर बनाए रखते हैं तो 2029 में मोदी सरकार के सामने राजनीतिक चुनौती खड़ी हो सकती है.
12 साल की सत्ता के बाद सरकार के सामने कौन से सवाल?
प्रोफेसर फूल बदन ने बातचीत में केंद्र सरकार के कामकाज, महंगाई, बेरोजगारी और संस्थाओं की स्थिति को लेकर भी सवाल उठाए. उनका कहना है कि लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद किसी भी सरकार के सामने जवाबदेही की चुनौती बढ़ती है. उन्होंने मौजूदा सरकार के रवैये को लेकर कहा कि सत्ता में लंबे समय तक रहने के बाद अहंकार और आंतरिक कमजोरियां सामने आने लगती हैं.
उन्होंने इंदिरा गांधी के शासनकाल का उदाहरण देते हुए कहा कि इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, प्रिवी पर्स समाप्त किया और बांग्लादेश की स्वतंत्रता के दौर में अहम भूमिका निभाई. इसके बावजूद आपातकाल के बाद जनता ने उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया. प्रोफेसर का तर्क है कि किसी सरकार के पुराने फैसले या उपलब्धियां उसे हमेशा जनता की नाराजगी से नहीं बचा सकतीं.
उनके मुताबिक, आज भी महंगाई, बेरोजगारी और ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा की जरूरत है. उन्होंने सवाल उठाया कि अगर अर्थव्यवस्था मजबूत है तो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निजीकरण और एलआईसी में निजी भागीदारी बढ़ाने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है?
विश्वविद्यालयों में सवाल पूछने की आजादी पर भी चिंता
प्रोफेसर फूल बदन ने उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थिति को भी मौजूदा राजनीतिक बहस से जोड़ा. उनका कहना है कि विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक स्वतंत्रता और शिक्षकों-छात्रों के बीच खुला संवाद जरूरी है. छात्र अगर सरकार की नीतियों पर सवाल नहीं उठा सकते और शिक्षक अपनी समझ के आधार पर उनकी आलोचना नहीं कर सकते तो शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका सीमित हो जाएगी.
उन्होंने कहा कि सरकार की नीतियों की आलोचना करना देश के खिलाफ होना नहीं है. लोकतंत्र में असहमति और सवाल पूछने की जगह बनी रहनी चाहिए. उनके मुताबिक, यही वह मुद्दा है जिसे विपक्ष को अपने आंदोलन में शामिल करना चाहिए.
INDIA ब्लॉक की एकता और 2029 की चुनौती
1 नवंबर की रैली में राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, ममता बनर्जी और अखिलेश यादव समेत विपक्षी नेताओं की मौजूदगी ने एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की. विपक्ष ने चुनाव आयोग की भूमिका, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और एसआईआर को लेकर अपनी आपत्तियां उठाईं. मतपत्र से चुनाव कराने की मांग भी इस राजनीतिक अभियान का हिस्सा रही.
रामलीला मैदान का इतिहास बताता है कि आंदोलनों का असर कई बार तत्काल नहीं, बल्कि वर्षों बाद दिखाई देता है. जेपी आंदोलन के बाद सत्ता बदली और अन्ना आंदोलन के बाद एक नया राजनीतिक दल सामने आया. अब INDIA ब्लॉक की रैली के सामने भी यही सवाल है कि क्या वह चुनावी व्यवस्था से जुड़े विरोध को व्यापक जनआंदोलन में बदल पाएगा?
प्रोफेसर फूल बदन की बात का निष्कर्ष भी यही है कि बदलाव के लिए निरंतरता जरूरी है. अगर विपक्ष जनता के मुद्दों से जुड़ा रहा और एकजुटता बनाए रखी तो 2029 की राजनीति में इसका प्रभाव दिखाई दे सकता है. फिलहाल, रामलीला मैदान से उठी आवाज का अगला पड़ाव इस बात से तय होगा कि रैली के बाद विपक्ष अपने आंदोलन को कितनी दूर तक ले जाता है.




