राहुल की रैली से पहले बीजेपी की घेराबंदी! दिल्ली में सिख मार्च, केशव मौर्य से हिमंता सरमा तक विपक्ष की घेराबंदी क्यों?
राहुल गांधी की रैली से पहले बीजेपी ने दिल्ली में सिख मार्च निकाला. केशव मौर्य से हिमंता सरमा तक के नेताओं ने विपक्ष पर हमले किए. जानिए इस सियासी घेराबंदी के मायने.
देश की राजनीति में रविवार का दिन बहुत ही दिलचस्प है. दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली राहुल गांधी की, लेकिन सियासी मुकाबला दो मोर्चों पर! कांग्रेस के नेतृत्व में INDIA गठबंधन 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में 'वोट बचाओ, देश बचाओ' के नारे के साथ महारैली कर रहा है. मुद्दा है एसआईआर, मतदाता सूची से नाम काटे जाने के आरोप और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा. राहुल गांधी की अगुवाई में विपक्ष चुनाव आयोग को घेरने की तैयारी में है, लेकिन बीजेपी ने भी इस दिन दिल्ली में अलग-अलग राजनीतिक मोर्चा खोल दिया है.
ऐसा इसलिए कि एक तरफ रामलीला मैदान में विपक्ष की रैली है तो दूसरी तरफ पश्चिमी दिल्ली के हरि नगर से तिलक नगर तक बीजेपी का सिख समुदाय के साथ विरोध मार्च निकाला जा रहा है. केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता और बीजेपी के दूसरे नेता इसमें शामिल हुए.
बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस ने 1984 के सिख-विरोधी दंगों की बरसी के दिन रैली आयोजित करके सिख समुदाय की भावनाओं की अनदेखी की है. पार्टी ने इस मार्च को दंगा पीड़ित परिवारों के साथ एकजुटता और कांग्रेस से जवाबदेही की मांग से जोड़ा है.
बीजेपी का विरोध यहीं तक सीमित नहीं है, केशव प्रसाद मौर्य से लेकर हिमंत बिस्वा सरमा तक बीजेपी के नेता भी लगातार विपक्ष पर हमलावर हैं. सवाल है कि आखिर विपक्ष की रैली के दिन बीजेपी ने एक साथ इतने मोर्चे क्यों खोल दिए? क्या यह एसआईआर के मुद्दे पर जवाबी घेराबंदी है या कांग्रेस को उसके पुराने राजनीतिक इतिहास की याद दिलाने की कोशिश?
आजम खान पर क्यों बरसे केशव?
यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने इंडिया ब्लॉक के रैली के दिन समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान का मुद्दा उठाकर सीधे अखिलेश यादव को निशाने पर लिया. उन्होंने कहा कि आजम खान को मुसलमान होने या विश्वविद्यालय बनाने की सजा नहीं मिल रही है, बल्कि उनके कथित अपराधों और भ्रष्टाचार की सजा मिल रही है. मौर्य ने आगे कहा कि आजम खान अखिलेश यादव की सरकार में मंत्री थे. ऐसे में अगर उस सरकार के दौरान गड़बड़ी हुई है तो अखिलेश यादव को भी जांच के दायरे में शामिल किया जाना चाहिए.
इस बयान के जरिए मौर्य ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में सपा को घेरने का प्रयास किया. उनका हमला केवल आजम खान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने तत्कालीन सपा सरकार की जवाबदेही का सवाल भी उठाया.
INDIA पर क्यों बरसे दानिश?
उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री दानिश आजाद अंसारी ने INDIA गठबंधन को मानसिक दिवालियापन का शिकार बताया. उन्होंने कहा कि राजनीतिक हताशा विपक्ष पर इस कदर हावी है कि उसे सही और गलत का एहसास नहीं रह गया है. अंसारी के मुताबिक, गठबंधन समाज को परेशान और गुमराह करने का काम कर रहा है. उन्होंने दावा किया कि जनता को INDIA गठबंधन की बातों पर भरोसा नहीं है और वह उसे पूरी तरह नकार चुकी है.
अंसारी का बयान ऐसे समय आया है जब विपक्ष एसआईआर और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों को लेकर सरकार तथा चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहा है. अंसारी ने विपक्ष के विरोध को राजनीतिक हताशा बताकर उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं.
फिर राहुल पर क्यों बरसे हिमंत सरमा?
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एसआईआर के मुद्दे पर राहुल गांधी को सीधे निशाने पर लिया. शिमला में उन्होंने आरोप लगाया कि एसआईआर प्रक्रिया में घुसपैठियों के नाम हटाए जाने की वजह से राहुल गांधी विरोध कर रहे हैं. सरमा ने विपक्ष पर घुसपैठियों को बचाने के लिए राजनीतिक नाटक करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि देश की जनता घुसपैठियों को मतदाता सूची में शामिल नहीं होने देगी और उनकी सरकार चुनाव आयोग के साथ खड़ी है.
संसद से बाहर क्यों बोले राजभर?
उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने विपक्ष के प्रदर्शन के तरीके पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि विपक्ष लोकतंत्र में विश्वास नहीं करता. राजभर के मुताबिक, जब संसद चलती है तो नेताओं को सदन के भीतर बहस और चर्चा करनी चाहिए, लेकिन विपक्ष सदन के बाहर प्रदर्शन और बयानबाजी करता है. उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष चर्चा से भाग रहा है.
राजभर का निशाना सीधे INDIA गठबंधन की उस रणनीति पर था, जिसके तहत संसद के बाहर रैली और प्रदर्शन के जरिए चुनाव आयोग पर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है.
मॉक पार्लियामेंट पर क्यों भड़के जगदंबिका?
बीजेपी सांसद जगदंबिका पाल ने INDIA गठबंधन की रैली और उसके पहले हुए मॉक पार्लियामेंट पर कड़ी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने विपक्ष की इस कवायद को लोकतंत्र का मजाक बताया. पाल ने आरोप लगाया कि कांग्रेस को लोकतांत्रिक प्रक्रिया, संवैधानिक संस्थाओं और संसद पर भरोसा नहीं रह गया है. उन्होंने कहा कि मॉक पार्लियामेंट जनता का अपमान है और विपक्ष देश को गुमराह कर रहा है.
जगदंबिका पाल ने विपक्ष के इस कदम को उसकी बौखलाहट और हताशा से भी जोड़ा. उनका बयान विपक्ष के प्रतीकात्मक सार्वजनिक महाभियोग कार्यक्रम के संदर्भ में आया, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया गया था.
एसआईआर पर क्यों भिड़े सरावगी?
बिहार बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने दिल्ली में INDIA गठबंधन की महारैली को चुनावी पराजय की बौखलाहट बताया. उन्होंने कहा कि एसआईआर में फर्जी, मृत और एक से अधिक जगह दर्ज मतदाताओं के साथ स्थायी रूप से दूसरी जगह जा चुके लोगों के नाम हटाए गए हैं. सरावगी के मुताबिक, यह कोई मुद्दा नहीं है, लेकिन विपक्ष त्योहारों के समय झूठा नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रहा है.
सरावगी ने विपक्ष के अभियान को राजनीतिक स्वांग करार दिया और कहा कि देश के लोग इस तरह के प्रयासों को स्वीकार नहीं करेंगे. उनका बयान एसआईआर को मतदाता सूची की सफाई की प्रक्रिया बताने वाले बीजेपी के तर्क को सामने रखता है, जबकि विपक्ष इसे वास्तविक मतदाताओं के नाम काटे जाने का मुद्दा बता रहा है.
रामलीला मैदान में अब तक क्या-क्या हुआ?
दूसरी तरफ रैली से पहले ही 31 अक्टूबर को INDIA गठबंधन के नेताओं ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रतीकात्मक सार्वजनिक महाभियोग कार्यक्रम आयोजित किया. यह संवैधानिक प्रक्रिया के तहत वास्तविक महाभियोग नहीं, बल्कि विरोध का प्रतीकात्मक कार्यक्रम था.
रविवार को मिंटो रोड और कनॉट प्लेस जंक्शन से विपक्षी नेताओं का मार्च शुरू हुआ. राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव और अन्य विपक्षी नेता इसमें शामिल हुए. नेता खुली बसों से पहुंचे और फिर मार्च करते हुए रामलीला मैदान की ओर बढ़े.
कांग्रेस ने 'वोट चोर, गद्दी छोड़ो' और 'वोट बचाओ, देश बचाओ' जैसे नारों के जरिए अपना विरोध दर्ज कराया. मैदान में कांग्रेस के साथ दूसरे विपक्षी दलों के झंडे भी दिखाई दिए.
रामलीला मैदान पहुंचने से पहले अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची से कथित तौर पर 1.27 करोड़ हिंदू मतदाताओं के नाम कम होने के मुख्यमंत्री के दावे पर सवाल उठाए. उन्होंने पूछा कि यह आंकड़ा कहां से आया और चुनावी हार के बाद ही इसका मुद्दा क्यों उठाया गया.
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी कहा कि चुनावी सूची पूरी तरह साफ होनी चाहिए और किसी वास्तविक मतदाता का नाम नहीं कटना चाहिए. उन्होंने बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाए जाने की आशंका जताई.
मार्च में वामपंथी छात्र संगठनों और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन के कार्यकर्ता भी शामिल हुए. आदिवासी समुदायों के लोगों ने सांस्कृतिक नृत्य के जरिए अपनी भागीदारी दिखाई. राहुल गांधी ने रास्ते में दुकानों को बंद कराए जाने का आरोप भी लगाया और स्थानीय कारोबारियों से त्योहारों की खरीदारी करने की अपील की.
विपक्ष की रैली के बीच बीजेपी ने भी अलग-अलग जगहों पर जवाबी मार्च आयोजित किए. हिमंत बिस्वा सरमा ने शिमला में, जबकि बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने हरियाणा के रोहतक में 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' मार्च का नेतृत्व किया. दिल्ली में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और बीजेपी नेताओं ने भी मार्च निकाला.
रामलीला मैदान की रैली केवल एसआईआर और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तक सीमित नहीं रही. एक तरफ विपक्ष चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहा है तो दूसरी तरफ बीजेपी के नेता विपक्ष के विरोध को राजनीतिक हताशा और गलत नैरेटिव करार दे रहे हैं. यही वजह है कि रैली के मंच से ज्यादा उसके आसपास की राजनीतिक बयानबाजी भी चर्चा में है.




