'पत्नी को एक थप्पड़ जड़ना क्रूरता नहीं', क्या है 31 साल पुराना केस, जिस पर गुजरात हाई कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला?
गुजरात हाई कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुआ कहा है कि पत्नी को एक बार थप्पड़ मारना क्रूरता नहीं होता है. कोर्ट का ये फैसला 1995 के एक केस में आया है.
गुजरात हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि अगर पति ने पत्नी को सिर्फ इस बात पर एक बार थप्पड़ मारा कि वह बिना बताए मायके में रात भर रुकी थी, तो इसे क्रूरता नहीं माना जा सकता. अदालत ने इसी आधार पर कोर्ट ने एक शख्स को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A (क्रूरता) और धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाने) के मामले में बरी कर दिया.
हाईकोर्ट ने कहा कि महिला को लगातार पीटे जाने का कोई ठोस सबूत नहीं मिला है, जो यह साबित कर सके कि उसे आत्महत्या के लिए मजबूर किया गया. इसलिए सेशन कोर्ट का फैसला टिक नहीं सकता.
क्या है पूरा मामला?
मामले के मुताबिक, कपल की शादी 1995 में हुई थी और वे वलसाड जिले के सरीगाम पहाड़पाड़ा में रहते थे. मई 1995 में महिला ने एक पेड़ से नायलॉन की रस्सी के सहारे फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. इसके बाद महिला के पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और पति पर आरोप लगाया कि उसकी क्रूरता और उत्पीड़न की वजह से उनकी बेटी ने आत्महत्या की है.
शिकायत में कहा गया था कि पति शादी समारोहों में बैंजो बजाने के लिए देर रात तक बाहर रहता था और घर लौटने के बाद पत्नी से मारपीट करता था. एक बार वह अपनी पत्नी के मायके गया, और वहां पहुंचकर पत्नी के थप्पड़ जड़ दिया. उसका कहना था कि पत्नी बिना उसे जानकारी दिए अपने मायके चली गई. पुलिस ने इन आरोपों के आधार पर आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 498A और 306 के तहत मामला दर्ज किया था.
2003 में सेशन कोर्ट ने क्या सुनाया था फैसला?
मुकदमे की सुनवाई के बाद वलसाड सेशन कोर्ट ने वर्ष 2003 में आरोपी को दोषी ठहराया. अदालत ने धारा 498A के तहत एक साल की सजा और धारा 306 के तहत सात साल की जेल की सजा सुनाई थी. इसके बाद आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील की. हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया.
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि झगड़ा केवल इस बात को लेकर था कि पति रात में शादी समारोहों में बैंजो बजाने जाता था और देर से लौटने पर दोनों के बीच विवाद होता था. कोर्ट ने साफ कहा,"सिर्फ इस आधार पर कि पत्नी बिना बताए मायके में रात भर रुकी थी और इस पर पति ने एक बार थप्पड़ मारा, इसे क्रूरता नहीं माना जा सकता."
आत्महत्या पर उकसाने के आरोप पर कोर्ट ने क्या कहा?
आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप से बरी करते हुए कोर्ट ने कहा कि आत्महत्या की साफ वजह साबित नहीं हुई है. लगातार और असहनीय मारपीट के लिए ठोस सबूत जरूरी थे, ताकि यह माना जा सके कि क्रूरता के कारण महिला ने कोई और रास्ता न देखकर फांसी लगाई. गवाह क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप साबित करने में नाकामयाब रहे. ट्रायल कोर्ट का निष्कर्ष गलत था. ऐसे में कोर्ट ने कहा कि इसलिए दोषसिद्धि और सजा बरकरार नहीं रह सकती.




