क्या है भारत का चिनाब-ब्यास प्रोजेक्ट, जिससे बदलेगी 4 राज्यों की किस्मत, पाकिस्तान क्यों है बेचैन?
केंद्र सरकार 2,352 करोड़ रुपये की लागत वाले चिनाब-ब्यास लिंक टनल प्रोजेक्ट पर काम शुरू करने जा रही है. इससे कई राज्यों को फायदा मिलेगा. हालांकि इस प्रोजेक्ट से पाकिस्तान काफी बेचैन नजर आ रहा है.
देश के कई हिस्सों में हर साल गर्मियों के दौरान पानी की कमी एक बड़ी चुनौती बन जाती है. खासकर दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के कई क्षेत्रों में जल संकट की समस्या लगातार सामने आती रहती है. इसी बीच केंद्र सरकार एक ऐसी महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम शुरू करने जा रही है, जिससे आने वाले वर्षों में इन राज्यों की जल उपलब्धता पर सकारात्मक असर पड़ सकता है.
सरकार चिनाब-ब्यास लिंक टनल प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने की तैयारी में है. इस परियोजना के तहत हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति क्षेत्र में एक लंबी सुरंग का निर्माण किया जाएगा, जिसके जरिए चिनाब नदी बेसिन के अतिरिक्त जल को ब्यास नदी प्रणाली तक पहुंचाया जाएगा.
कब शुरू होगा प्रोजेक्ट?
करीब 2,352 करोड़ रुपये की लागत वाले इस प्रोजेक्ट का निर्माण कार्य इसी वर्ष अगस्त महीने से शुरू होने की उम्मीद जताई जा रही है. यह परियोजना जल शक्ति मंत्रालय के अंतर्गत विकसित की जाएगी.
कब होगा टारगेट पूरा?
जल शक्ति मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के अनुसार, इस परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार हो चुकी है. सरकार ने इस महत्वपूर्ण परियोजना को जल्द से जल्द पूरा करने का लक्ष्य रखा है. सूत्रों का कहना है कि निर्माण कार्य शुरू होने के बाद इसे लगभग दो वर्षों में पूरा करने की योजना है. हालांकि परियोजना के पूर्ण रूप से पूरा होने की अधिकतम समयसीमा वर्ष 2029 तक मानी जा रही है.
कहां बनेगा बैराज?
परियोजना के पहले चरण में हिमाचल प्रदेश के लाहौल घाटी स्थित कोकसर क्षेत्र में चंद्रा नदी पर एक बैराज बनाने का प्लान है. चंद्रा नदी चिनाब नदी बेसिन की प्रमुख सहायक नदियों में शामिल है.
गर्मियों के मौसम में जब हिमालयी ग्लेशियर पिघलते हैं, तब चंद्रा नदी में जल प्रवाह काफी बढ़ जाता है. इस दौरान बड़ी मात्रा में पानी आगे बह जाता है. सरकार की योजना इसी अतिरिक्त पानी को एक अंडरग्राउंड सुरंग के जरिए ब्यास नदी प्रणाली की ओर मोड़ने की है.
सरल शब्दों में कहें तो जो अतिरिक्त पानी अभी बिना उपयोग के आगे निकल जाता है, उसे उन क्षेत्रों तक पहुंचाने की कोशिश की जाएगी जहां पानी की मांग अधिक है और जल संकट की समस्या बार-बार सामने आती है.
कितनी लंबी सुरंग होगी तैयार?
परियोजना के तहत लगभग 8.7 किलोमीटर लंबी सुरंग बनाई जाएगी, जिसके माध्यम से चिनाब बेसिन के अतिरिक्त पानी को ब्यास नदी प्रणाली में शिफ्ट किया जाएगा. यह पूरी परियोजना सिंधु नदी प्रणाली से जुड़ी हुई है. सिंधु नदी प्रणाली में चिनाब, झेलम, रावी, ब्यास और सतलुज जैसी प्रमुख नदियां शामिल हैं.
परियोजना के पहले चरण में कोकसर गांव के पास चंद्रा नदी पर लगभग 19 मीटर ऊंचा बैराज बनाने का प्रस्ताव रखा गया है. यह क्षेत्र पश्चिमी हिमालय में स्थित ऊपरी चिनाब बेसिन का हिस्सा माना जाता है.
किन राज्यो को होगा फायदा?
- दिल्ली
- हरियाणा
- पंजाब
- राजस्थान
- हिमाचल
किसे सौंपी गई जिम्मेदारी?
इस परियोजना के निर्माण और संचालन की जिम्मेदारी नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन (NHPC) को सौंपी गई है. सूत्रों के अनुसार, इस परियोजना से केवल जल प्रबंधन में ही मदद नहीं मिलेगी, बल्कि हिमाचल प्रदेश में जलविद्युत उत्पादन क्षमता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा. अनुमान है कि परियोजना के पूरा होने के बाद राज्य में लगभग 4,000 मेगावाट अतिरिक्त जलविद्युत उत्पादन की संभावनाएं विकसित हो सकती हैं.
पाकिस्तान की क्यों हालत खराब?
चिनाब नदी सिंधु नदी प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसका पानी आगे पाकिस्तान में भी पहुंचता है. पाकिस्तान लंबे समय से इस नदी के जल प्रवाह पर निर्भर रहा है. सूत्रों के अनुसार, भारत का उद्देश्य अपने हिस्से के उपलब्ध जल संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना है. सरकार का कहना है कि अतिरिक्त पानी को देश के भीतर उपयोग में लाना इस परियोजना का प्रमुख लक्ष्य है.
चिनाब-ब्यास लिंक प्रोजेक्ट के जरिए उस पानी के एक हिस्से का इस्तेमाल भारत में किया जा सकेगा, जो वर्तमान में बिना उपयोग के पाकिस्तान की ओर बह जाता है. हालांकि अधिकारियों का कहना है कि यह परियोजना पूरी तरह सिंधु जल संधि के प्रावधानों के तहत विकसित की जा रही है. इसके बावजूद पाकिस्तान इसे रणनीतिक दृष्टिकोण से देख रहा है, क्योंकि परियोजना के पूरा होने के बाद भारत अपनी जल प्रबंधन क्षमता को पहले की तुलना में अधिक मजबूत बना सकेगा.
सरकार का मानना है कि यह परियोजना न केवल जल संरक्षण और जल प्रबंधन को मजबूती देगी, बल्कि भविष्य में बढ़ती पानी की मांग को पूरा करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. साथ ही इससे देश के उत्तरी और पश्चिमी हिस्सों में जल उपलब्धता और ऊर्जा उत्पादन दोनों क्षेत्रों में लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है.




