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पाकिस्तान के खड़े हुए कान और विपक्ष ने बोला हमला; IND-PAK बॉर्डर पर पहुंचे अमेरिकी राजदूत, क्या हैं इसके मायने?

पाकिस्तान सीमा के पास भारतीय सेना की वेस्टर्न कमांड में अमेरिकी दूत पहुंचे थे. इस दौरे के कई मायने निकाले जा रहे हैं. उधर विपक्ष ने इस विज़िट के बाद सरकार पर हमला बोला है और इसे सरकार के जरिए अमेरिकी हितों के मुताबिक चलने वाला बताया है.

पाकिस्तान के खड़े हुए कान और विपक्ष ने बोला हमला; IND-PAK बॉर्डर पर पहुंचे अमेरिकी राजदूत, क्या हैं इसके मायने?
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( Image Source:  X- @westerncomd_IA )
समी सिद्दीकी
Edited By: समी सिद्दीकी

Published on: 17 Feb 2026 2:24 PM

American Ambassador on IND-PAK Boarder: पाकिस्तान सीमा के पास भारतीय सेना की वेस्टर्न कमांड में अमेरिकी दूत और अमेरिका के इंडो-पैसिफिक कमांडर की हालिया यात्रा ने राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है. विपक्ष ने इसे सरकार के जरिए अमेरिकी हितों को साधने की कोशिश बताया है. वहीं दूसरी ओर यह मुमकिन है कि इस मुलाकात के दौरान पाकिस्तान के कान खड़े होंगे, क्योंकि पाक ये बिल्कुल नहीं चाहता है कि अमेरिका और भारत की करीबियां बढ़ें.

हालांकि इस तरह की यात्राएं दुर्लभ जरूर हैं, लेकिन पहली बार नहीं हुई हैं. यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब व्यापार समझौते के बाद भारत और अमेरिका अपने रक्षा संबंधों को फिर से मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.

अमेरिकी दूत क्यों आए थे?

यह यात्रा पिछले साल भारत-पाकिस्तान के बीच तीन दिन चली झड़पों के बाद किसी विदेशी डेलिगेशन की पहली ऐसी यात्रा थी. बैठक की पूरी जानकारी पब्लिक नहीं की गई, लेकिन सेना ने बताया कि अमेरिकी डेलिगेशन को पश्चिमी मोर्चे की कंडीशन, ऑपरेशन सिंदूर और इलाके की स्थिरता में भारतीय सेना की भूमिका के बारे में जानकारी दी गई. दौरे से एक दिन पहले अमेरिकी कमांडर ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना की रणनीतिक कार्रवाई की सराहना भी की थी.

विपक्ष क्यों उठा रहा है सवाल?

हालांकि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की वेस्टर्न कमांड यात्रा और लेफ्टिनेंट जनरल मनोज कुमार कटियार से मुलाकात की तस्वीरों पर विपक्ष ने सवाल उठाए. राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि भारत के रणनीतिक हितों को अमेरिकी अपेक्षाओं से जोड़े जा रहा है.

उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पिछले साल भारत-पाकिस्तान सीजफायर का एलान अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले सोशल मीडिया पर किया था, जबकि भारत ने कहा था कि यह समझौता सीधे बातचीत से हुआ. कांग्रेस ने भी संवेदनशील सैन्य क्षेत्रों में अमेरिकी अधिकारियों को दी जा रही पहुंच पर सवाल खड़े किए हैं.

क्या पहले भी होती रही हैं ऐसी मुलाकातें?

हालांकि राजनीतिक बयानबाजी से अलग देखें तो भारत और अमेरिका के बीच सैन्य स्तर पर इस तरह की मुलाकातें पहले भी होती रही हैं और विदेशी राजनयिक पहले भी भारतीय सैन्य मुख्यालयों का दौरा कर चुके हैं, और भारतीय प्रतिनिधि भी अमेरिका के पेंटागन और सीआईए मुख्यालय जा चुके हैं. इसलिए इसे एक तय सैन्य आदान-प्रदान प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है.

क्या है इस मुलाकात का मतलब?

जानकारों की मानें तो इस दौरे के पीछे व्यापक संदेश छिपा है. अमेरिका भारत को एशिया और इंडो-पैसिफिक एरिया में चीन के संतुलन के तौर पर देखता है और रक्षा साझेदारी को मजबूत करना चाहता है. हाल के अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति दस्तावेज में पाकिस्तान का जिक्र नहीं किया गया था, जिससे भारत की अहमियत और साफ होती है. अमेरिकी अधिकारियों ने भी कहा है कि दोनों देशों के बीच रक्षा संबंध तेजी से आगे बढ़ रहे हैं.

इसके साथ ही यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब अमेरिका चाहता है कि भारत रक्षा खरीद के मामले में रूस पर अपनी निर्भरता कम करे. मौजूदा वक् में फ्रांस के बाद अमेरिका भारत का तीसरा सबसे बड़ा हथियार देने वाला देश है, कुल मिलाकर, अमेरिकी दूत और शीर्ष कमांडर का संवेदनशील सैन्य क्षेत्र का यह दौरा दोनों देशों के बीच बढ़ते विश्वास और गहराते सैन्य सहयोग का संकेत माना जा रहा है.

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