टीचर का बेटा संभालेगा ईरान की कमान! कौन हैं सईद जलीली? अली लारीजानी की मौत के बाद उठा सवाल
अली लारीजानी की मौत के बाद बड़ा सवाल ये उठ रहा है कि अब ईरान में उनकी जगह कौन संभालेगा? हालांकि इसको लेकर एक नाम सबसे ज्यादा सुर्खियों में है. सईद जलीली अब लारीजानी की जगह ले सकते हैं.
Saeed Jalili-Ali Larijani
(Image Source: X/ @VoiceForIndian )ईरान की राजनीति में मंगलवार को बड़ा झटका लगा जब वरिष्ठ नेता अली लारीजानी की एक हवाई हमले में मौत की पुष्टि हुई. इस घटना ने न सिर्फ देश के सत्ता ढांचे को हिला दिया है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि अब इस महत्वपूर्ण भूमिका को कौन संभालेगा? तेहरान में हुए इस हमले में लारीजानी के साथ उनके बेटे और एक सहयोगी की भी जान चली गई.
ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद द्वारा जारी बयान, जिसे मेहर समाचार एजेंसी ने प्रकाशित किया उसमें लारीजानी की मौत को शहादत बताया गया. इस घटनाक्रम के बाद अब देश के राजनीतिक और सुरक्षा गलियारों में उनके संभावित उत्तराधिकारी को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं, जिसमें सईद जलीली का नाम प्रमुखता से सामने आ रहा है.
कैसे हुई मौत की पुष्टि?
सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के बयान में कहा गया "ईरान और इस्लामी क्रांति के उत्थान के लिए जीवन भर संघर्ष करने के बाद, अंततः उन्होंने अपनी लंबे समय से पोषित इच्छा को पूरा किया, सत्य की पुकार का जवाब दिया और सेवा के मोर्चे पर शहादत का गौरवशाली दर्जा प्राप्त किया." यह बयान लारीजानी की भूमिका और उनके प्रभाव को रेखांकित करता है, जो सालों से ईरान के राजनीतिक तंत्र में एक केंद्रीय चेहरा रहे थे.
कौन लेगा लारीजानी की जगह?
लारीजानी की मौत के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि उनकी जगह कौन लेगा. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस पद के लिए सबसे मजबूत दावेदार सईद जलीली माने जा रहे हैं. जलीली लंबे समय से ईरान के राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे में सक्रिय रहे हैं और उन्हें एक कट्टरपंथी तथा सख्त रुख अपनाने वाले नेता के तौर पर जाना जाता है.
कौन हैं सईद जलीली?
करीब 60 वर्षीय सईद जलीली अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तब चर्चा में आए जब उन्होंने महमूद अहमदीनेजाद के कार्यकाल में 2007 से 2013 तक ईरान के मुख्य परमाणु वार्ताकार के रूप में काम किया. इस दौरान उन्होंने पश्चिमी देशों के साथ परमाणु वार्ताओं का नेतृत्व किया. उनकी बातचीत की शैली को अक्सर कठोर और जटिल बताया गया. उस समय उनका एक बयान काफी चर्चित हुआ था. जिसमें उन्होंने कहा था कि "जिस प्रकार ईरानी कालीनों की बुनाई मिलीमीटर की सटीकता, बारीकी, कोमलता और स्थायित्व के साथ आगे बढ़ रही है, ईश्वर की कृपा से, यह राजनयिक प्रक्रिया भी उसी तरह आगे बढ़ेगी."
1965 में मशहद में जन्मे जलीली एक साधारण परिवार से आते हैं. उनके पिता स्कूल प्रिंसिपल और फ्रेंच शिक्षक थे, जबकि उनकी माता अज़ेरी मूल की हैं. ईरान-इराक युद्ध के दौरान उन्होंने अपना दाहिना पैर खो दिया, जिसके कारण उनके समर्थक उन्हें जीवित शहीद कहते हैं. राजनीति में आने से पहले उन्होंने अकादमिक क्षेत्र में काम किया और बाद में विदेश मंत्रालय के जरिए सत्ता के उच्च स्तर तक पहुंचे.
क्यों किया था परमाणु समझौते का विरोध?
जलीली ने 2015 में हुए परमाणु समझौते का विरोध किया, जिसे हसन रूहानी के नेतृत्व में अंतिम रूप दिया गया था. उनका मानना था कि इस समझौते में ईरान को बहुत अधिक रियायतें देनी पड़ीं. उन्होंने रूहानी सरकार के दौरान अपनी राजनीतिक सक्रियता को छाया सरकार का नाम दिया.
कैसा है राजनीतिक करियर?
जलीली ने साल 2013 में राष्ट्रपति चुनाव भी लड़ा, जिसमें उन्हें मोहम्मद ताघी मेस्बाह यजदी का समर्थन प्राप्त था, लेकिन वे तीसरे स्थान पर रहे थे. इसके बावजूद, ईरान के रूढ़िवादी वर्ग में उनका प्रभाव लगातार बना हुआ है और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसलों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है.