इस्लामिक ‘NATO' फिर चर्चा में क्यों? 1955 से अब तक का पूरा खेल, अब क्या बनने जा रहा नया गठबंधन?
Iran-Israel और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव ने इस्लामिक नाटो की बहस को फिर जिंदा कर दिया है. लेकिन क्या मुस्लिम देशों का NATO जैसा गठबंधन बन पाना संभव है?
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव खासकर Iran, Israel और अमेरिका के बीच टकराव ने एक बार फिर “इस्लामिक नाटो” की चर्चा तेज कर दी है. सवाल यह है कि क्या मुस्लिम देशों का कोई ऐसा सैन्य गठबंधन बन सकता है, जो पश्चिमी सैन्य संगठन NATO की तरह सामूहिक सुरक्षा दे?
पहली बार कब उठा ‘इस्लामिक नाटो’ का विचार?
आॅब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस्लामिक नाटो शब्द औपचारिक नहीं है, लेकिन इसकी अवधारणा पहली बार 1955 में भी सोवियत संघ का मुकाबला करने के लिए ब्रिटेन-अमेरिका के नेतृत्व में बगदाद पैक्ट बनाया गया था. इसमें इराक, तुर्किये, पाकिस्तान, ईरान शामिल थे. यह उसी वर्ष सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन (सेंटो) में तब्दील हो गया. लेकिन 1979 में यह व्यवस्था बिखर गई. 2015 में भी आईएसआईएस के खिलाफ युद्ध को आगे बढ़ाने के मकसद से सऊदी अरब ने इस्लामिक मिलिट्री काउंटर टेररिज्म कोएलिशन के गठन की घोषणा की थी. 2017 में पाकिस्तान के पूर्व फौज प्रमुख राहील शरीफ को इसका पहला सैन्य कमांडर भी नियुक्त किया गया था.
सऊदी-पाक समझौता उन घटनाओं की पृष्ठभूमि में सामने आया है, जिनमें अमेरिका-इजराइल का ईरान से युद्ध, इजराइल द्वारा कतर पर बमबारी, यमन को लेकर सऊदी-यूएई तनाव और भारत का ऑपरेशन सिंदूर शामिल हैं. इन सबके बाद सऊदी को यह महसूस हुआ कि मध्य-पूर्व में इजराइल के बढ़ते प्रभाव के मद्देनजर उसे एक भरोसेमंद गठजोड़ की आवश्यकता है.
फिर क्या हुआ?
घोषणा के बाद कई अहम घटनाक्रम हुईं. इनमें :
1. गठबंधन बना, लेकिन सक्रियता सीमित रही
IMCTC में 40 से ज्यादा देश शामिल हुए, लेकिन यह NATO की तरह एक “सक्रिय सैन्य ब्लॉक” नहीं बन पाया.
कोई संयुक्त सैन्य कमान पूरी तरह विकसित नहीं हुई. बड़े स्तर पर संयुक्त ऑपरेशन कभी नहीं दिखे.
2. Pakistan की अहम भूमिका
पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख Raheel Sharif को इस गठबंधन का कमांडर बनाया गया. इससे इसकी सैन्य विश्वसनीयता बढ़ी, लेकिन राजनीतिक मतभेद बने रहे.
3. ईरान का विरोध
Iran इस गठबंधन में शामिल नहीं हुआ और इसे अपने खिलाफ एक “सुन्नी ब्लॉक” के रूप में देखा. यही कारण रहा कि यह गठबंधन क्षेत्रीय विभाजन का शिकार हो गया.
4. सिंदूर ऑपरेशन के बाद भी उठी इस्लामिक नाटो की आवाज
“सिंदूर ऑपरेशन” के बाद बढ़े क्षेत्रीय तनाव और संभावित बड़े युद्ध के खतरे ने इस विचार को फिर से जीवित कर दिया कि क्या मुस्लिम देश NATO जैसी सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था बना सकते हैं.
क्यों नहीं बन पाया ‘असल’ इस्लामिक नाटो?
- सुन्नी-शिया के मसले पर सऊदी अरब और ईरान के बीच प्रतिद्वंद्विता बढ़ी.
- खाड़ी और मध्य पूर्व के अलग-अलग देशों ने अपनी प्राथमिकताएं अलग-अलग तय कर लीं.
- मुस्लिम देशों की सैन्य क्षमता एक जैसी नहीं.
- इस्लामिक नाटो के नामपर आतंकवाद के अलावा साझा एजेंडा हमेशा कमजोर ही रहा.
- इन कारणों से यह गठबंधन NATO जैसी मजबूत और बाध्यकारी व्यवस्था नहीं बन सका.
अब फिर चर्चा क्यों तेज हो गई?
जब मिडिल ईस्ट में तनाव अचानक बढ़ा और Iran, Israel और अमेरिका के बीच टकराव की स्थिति और गहरी हो गई. इसी दौर में रक्षा विशेषज्ञों और मीडिया में यह सवाल उठने लगा कि क्या मुस्लिम देश अपनी सामूहिक सुरक्षा के लिए किसी “इस्लामिक नाटो” जैसे सैन्य गठबंधन की ओर बढ़ सकते हैं.
क्या अब बन सकता है ‘इस्लामिक नाटो’?
इस्लामिक नाटो को लेकर संभावना पूरी तरह से खत्म नहीं है, लेकिन चुनौतियां अब भी बड़ी हैं. अगर सऊदी अरब और ईरान के रिश्तों में सुधार होता है, तो रास्ता आसान हो सकता है. साझा खतरे (जैसे आतंकवाद या बाहरी हस्तक्षेप) देशों को करीब ला सकते हैं. लेकिन राजनीतिक और धार्मिक मतभेद अब भी सबसे बड़ी बाधा हैं.
इस्लामिक नाटो फिलहाल एक अवधारणा ही है, न कि हकीकत. 2015 में शुरू हुई कोशिशें अब तक NATO जैसे मजबूत सैन्य गठबंधन में नहीं बदल पाई हैं. हालांकि, बदलते भू-राजनीतिक हालात, खासकर Iran-Israel तनाव ने इसे फिर चर्चा में ला दिया है.




