पाक पत्रकार मोईद पीरजादा कौन, जिन्‍होंने अपनी ही सेना के खिलाफ दिया बागी बयान? 1971 को बताया भारत की ‘पीठ में छुरा’

पाकिस्तानी पत्रकार मोईद पीरजादा ने 1971 को लेकर बड़ा बयान दिया. बांग्लादेश लिबरेशन वार का जिक्र करते हुए पाकिस्तान की सेना और सरकार को बताया ‘दगाबाज’. जानें पूरा मामला.

( Image Source:  Sora AI )

पाकिस्तान के जाने-माने पत्रकार मोईद पीरजादा (Moeed Pirzada) एक बार फिर अपने बेबाक बयानों को लेकर चर्चा में हैं. इस बार उन्होंने अपने ही देश की सेना और सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए 1971 के घटनाक्रम को “भारत की पीठ में छुरा घोंपने” जैसा बताया है. बांग्लादेश लिबरेशन वार का जिक्र करते हुए उन्होंने पाकिस्तान की नीतियों और नेतृत्व को कठघरे में खड़ा किया, जिससे देश के भीतर ही एक नई बहस छिड़ गई है.

कौन हैं Moeed Pirzada?

मोईद पीरजादा पाकिस्तान के चर्चित पत्रकार, टीवी एंकर और राजनीतिक विश्लेषक हैं, जो अपनी बेबाक और सत्ता-विरोधी टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने London School of Economics (LSE) से पढ़ाई की और पाकिस्तान के कई बड़े न्यूज चैनलों पर काम किया. उनका शो “Tonight with Moeed Pirzada” काफी लोकप्रिय रहा. फिलहाल वे YouTube और सोशल मीडिया के जरिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति, पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति और सैन्य-सियासी समीकरणों पर खुलकर राय रखते हैं.

क्यों चर्चा में हैं पीरजादा?

हाल के दिनों में Moeed Pirzada ने पाकिस्तान की सेना और सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए 1971 को लेकर ऐसा बयान दिया, जिसने बहस छेड़ दी. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने 1971 में “भारत की पीठ में छुरा घोंपा” और यह सब गलत नीतियों और नेतृत्व की वजह से हुआ. उनका यह बयान बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के संदर्भ में आया, जहां उन्होंने इशारा किया कि उस दौर की राजनीतिक और सैन्य रणनीतियां ही देश के टूटने का कारण बनीं.

1971 को लेकर उनका तर्क क्या है?

पीरजादा का कहना है कि 1971 में हार के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच एक समझ बनी थी कि विवाद द्विपक्षीय तरीके से सुलझाए जाएंगे, लेकिन बाद में पाकिस्तान ने कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाकर उस समझ से पीछे हटने की कोशिश की, जिसे उन्होंने “विश्वासघात” बताया. उन्होंने यह भी कहा कि युद्ध के बाद भारत ने लगभग 90,000 पाकिस्तानी युद्धबंदियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया, जबकि पाकिस्तान ने उसी भरोसे को कायम नहीं रखा.

सेना और सत्ता पर क्यों भड़के?

मोईद पीरजादा ने अपने बयान में पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था पर सीधा निशाना साधा. उन्होंने 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में हुई सैन्य कार्रवाई, जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी दिए जाने और इमरान खान की मौजूदा स्थिति को एक “पैटर्न” के रूप में जोड़ा. उनका आरोप है कि पाकिस्तान में सत्ता संरचना बार-बार अपने ही नेताओं और नागरिकों के खिलाफ खड़ी होती रही है.

इमरान खान के मुद्दे पर क्या कहा?

पीरजादा ने इमरान खान की जेल में बिगड़ती सेहत को लेकर भी चिंता जताई. उन्होंने उनके परिवार से अपील की कि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवाज उठाएं और एक स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड से जांच की मांग करें. उन्होंने इसे सिर्फ एक व्यक्ति का मामला नहीं, बल्कि पाकिस्तान में मानवाधिकार और राजनीतिक व्यवहार का बड़ा मुद्दा बताया.

क्या यह बयान पाकिस्तान में नैरेटिव बदल रहा है?

पाकिस्तान में 1971 की घटनाओं को आमतौर पर अलग दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया जाता है, जहां बाहरी कारकों को ज्यादा जिम्मेदार ठहराया जाता है. ऐसे में मोईद पीरजादा की स्वीकारोक्ति की एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करता है. उन्होंने साफ कहा कि भारत को दोष देने के बजाय पाकिस्तान को अपनी गलतियों पर ईमानदारी से विचार करना चाहिए.

क्यों अहम है यह पूरा विवाद?

पीरजादा का बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह पाकिस्तान के अंदर से उठी उस आवाज को दर्शाता है, जो इतिहास और सत्ता, दोनों पर सवाल उठाती है. इससे न सिर्फ 1971 की बहस फिर से तेज हो सकती है, बल्कि भारत-पाक रिश्तों को लेकर बने नैरेटिव पर भी असर पड़ सकता है.

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