कहीं हिमंत बिस्वा सरमा के हमले गौरव गोगोई के लिए न बन जाएं मौका-मौका!
हिमंत बिस्वा सरमा और गौरव गोगोई के बीच अटैक-काउंटर अटैक जारी है. लेकिन, माना जा रहा है कि सरमा के आरोपों से कहीं न कहीं कांग्रेस और गोगोई को फायदा पहुंच सकता है.;
Himanta Biswa Sarma vs Gaurav Gogoi: असम में चुनावी माहौल तेज होते ही राजनीति का केंद्र अब मुद्दों से ज्यादा चेहरों पर सिमटता नजर आ रहा है. बीते कुछ दिनों में हुई दो बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस ने इस सियासी टकराव को खुलकर सामने ला दिया है. एक ओर मुख्यमंत्री सचिवालय में सीएम हिमंत बिस्वा सरमा पांच सीनियर कैबिनेट मंत्रियों के साथ मंच पर मौजूद थे, तो दूसरी ओर अगले ही दिन गुवाहाटी के राजीव भवन में कांग्रेस नेता गौरव गोगोई अपने सहयोगी सांसदों के साथ जवाबी हमला करते दिखे.
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में उस स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) की रिपोर्ट साझा की, जिसे उन्होंने असम कांग्रेस अध्यक्ष और सांसद गौरव गोगोई को पाकिस्तान एजेंट बताने के अपने आरोपों की जांच के लिए गठित किया था. यह प्रेस कॉन्फ्रेंस लगभग एक साल से चल रहे आरोप-प्रत्यारोप अभियान का चरम बिंदु मानी गई.
हिमंता सरमा ने गोगोई के परिवार पर क्या कहा?
इस दौरान न केवल गौरव गोगोई बल्कि उनकी पत्नी एलिज़ाबेथ कोलबर्न गोगोई और उनके दो बच्चों तक को सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनाया गया. उनके धर्म और नागरिकता पर सवाल उठे और कपल के निजी दस्तावेज- जैसे रोजगार रिकॉर्ड, पासपोर्ट और आधार कार्ड भी पब्लिक किए गए.
गोगोई ने दिया कड़ा जवाब?
इसके ठीक एक दिन बाद कांग्रेस ने जवाबी रणनीति अपनाई. गुवाहाटी के राजीव भवन में गौरव गोगोई, सांसद प्रद्युत बोरदोलोई और रकीबुल हुसैन के साथ मीडिया के सामने आए. उन्होंने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि वे नैतिक स्तर बनाए रखना चाहते हैं. उन्होंने यह भी कहा,"हमें आपके बच्चों के बारे में भी जानकारी है, लेकिन हम उस पर बात नहीं करना चाहते." साथ ही उन्होंने अपने पिता और पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई की राजनीतिक विरासत का हवाला दिया.
माना जा रहा है कि सरमा के जरिए किए जा रहे हमले गोगोई के लिए फायदमेंद भी हो सकते हैं. राजनीतिक जानकारों की माने तो सरेआम परिवार की निजी जानकारी को सामने लाना भी लोगों को अखर सकता है.
गोगोई ने सरमा पर लगाया गंभीर इल्जाम
यहीं से राजनीतिक हमला और तीखा हो गया. गौरव गोगोई ने कांग्रेस के नए अभियान के तहत मुख्यमंत्री सरमा और उनकी उद्यमी पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा को निशाने पर लिया. उन्होंने आरोप लगाया कि सरमा राजनीति में अपने परिवार को लाभ पहुंचाने के लिए आए और राज्यभर में परिवार के नाम पर जमीन कब्जाने का काम किया.
क्या नया है गोगोई और सरमा के बीच विवाद?
यह टकराव अचानक नहीं है राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2024 लोकसभा चुनाव के बाद जब यह साफ हो गया कि गौरव गोगोई राज्य की राजनीति में बड़ी भूमिका निभाने जा रहे हैं, तभी से यह सीधी भिड़ंत तय मानी जा रही थी. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट हिमंत बिस्वा सरमा कभी तरुण गोगोई के करीबी माने जाते थे, लेकिन बाद में मतभेद बढ़े और वे बीजेपी में शामिल हो गए. सालों से दोनों खेमों के बीच बयानबाजी होती रही है, लेकिन इस बार का हमला सबसे लंबा और तीखा माना जा रहा है.
क्या कांग्रेस को मिल गया असम में एक चेहरा?
राजनीतिक तौर पर देखा जाए तो इस व्यक्तिगत अटैक-काउंटर अटैक ने कांग्रेस को एक स्पष्ट चेहरा दिया है, जो उसे 2020 में तरुण गोगोई के निधन के बाद नहीं मिला था. 2021 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस और बीजेपी, दोनों ने बिना मुख्यमंत्री चेहरे के लड़ा था. उस समय गौरव गोगोई, प्रद्युत बोरदोलोई, तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष रिपुन बोरा और विधायक देबव्रत सैकिया जैसे नेता आगे थे. लेकिन अब पार्टी के भीतर और बाहर यह स्पष्ट संदेश गया है कि गौरव गोगोई ही कांग्रेस का चेहरा हैं.
क्या इस भिड़ंत से कांग्रेस को कोई फायदा होगा?
रिपोर्ट के मुताबिक, कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि मुख्यमंत्री के आरोपों से पार्टी को नुकसान हो सकता है, लेकिन जिस तरह यह मुकाबला हिमंत बिस्वा सरमा बनाम गौरव गोगोई के रूप में पेश किया जा रहा है, उससे गोगोई की सार्वजनिक छवि मजबूत हो रही है. पार्टी के भीतर समन्वय जैसी चुनौतियां हो सकती हैं, लेकिन यह तय है कि वे ही अभियान का चेहरा हैं.
हालांकि यह चुनाव राज्य की राजनीति में गौरव गोगोई की नेतृत्व क्षमता की पहली बड़ी परीक्षा माना जा रहा है. वे 2014 से सांसद हैं, लेकिन जून 2024 में उन्हें राज्य कांग्रेस की कमान सौंपी गई, उस वक्त पार्टी लगातार हार का सामना कर रही थी.
क्या गौरव गोगोई संभालेंगे कांग्रेस की डूबती नैया?
गौरव गोगोई को शहरी छवि वाला नेता माना जाता है. वे दिल्ली में पले-बढ़े और लंबे समय तक राज्य की जमीनी राजनीति से दूरी पर रहे. एक युवा कांग्रेस नेता के मुताबिक, उनके प्रदेश अध्यक्ष बनने से कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा है. वे ऐसे नेता हैं जो हिमंत बिस्वा सरमा को सीधी चुनौती दे सकते हैं. लेकिन संसाधन सीमित हैं और संगठन को मजबूत करने के लिए समय कम है. 2024 में जोरहाट लोकसभा सीट से उनकी जीत को बड़ी राजनीतिक उपलब्धि माना गया, खासकर तब जब बीजेपी का अभियान खुद मुख्यमंत्री सरमा ने संभाला था. इससे पहले वे कालीआबोर सीट से दो बार सांसद रह चुके थे, जिसे परिसीमन के बाद नए सिरे से निर्धारित किया गया.
असम में कांग्रेस के लिए क्या हैं चुनौतियां?
फिर भी कांग्रेस के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं. वर्षों से संगठन कमजोर हुआ है, कई नेता और कार्यकर्ता बीजेपी में शामिल हो चुके हैं. अन्य दलों के साथ गठबंधन बनाने और बीजेपी के मजबूत नैरेटिव का मुकाबला करने में भी पार्टी को कठिनाई हुई है.