BMC Polls: टारगेट से आगे डिलीवरी, यूं ही नहीं BJP का सबसे भरोसेमंद चेहरा हैं देवेंद्र फडणवीस, यही है उनकी USP

देवेंद्र फडणवीस सिर्फ महाराष्ट्र के नेता नहीं, बीजेपी के सबसे भरोसेमंद रणनीतिक ताकत भी हैं. लोकसभा से लेकर विधानसभा और बीएमसी तक, जानिए कैसे फडणवीस की राजनीति ऐसी है कि विरोधी उन्हें ‘सियासी मौत’ नहीं दे पाते. फडणवीस के सियासी मायाजाल का आप इसी से अंदाजा लगा सकते हैं कि पहले मेयर बने, प्रदेश की सीएम बने, फिर सियासी उठा पटक को समझते हुए डिप्टी सीएम भी बने- 2021 के चुनाव में सीएम पद की शपथ लेने के तत्काल बाद इस्तीफा देने का कड़वा घूंट भी पीया. इन सबके बीच उन्होंने साबित किया कि महाराष्ट्र में उनके सियासी मायाजाल को कोई जवाब नहीं है.;

( Image Source:  ani )
By :  धीरेंद्र कुमार मिश्रा
Updated On : 17 Jan 2026 3:07 PM IST

महाराष्ट्र की राजनीति में कई चेहरे आए और गए. एक से बढ़कर एक नेता हुए. कुछ जननेता बने, कुछ सत्ता के खिलाड़ी बने, लेकिन देवेंद्र फडणवीस वह नाम हैं, जिन पर बीजेपी सिर्फ भरोसा नहीं करती, बल्कि संकट के वक्त पूरा दांव लगा देती है. चाहे 2019 के बाद का सत्ता-संघर्ष हो, 2024 का लोकसभा चुनाव हो, विधानसभा चुनाव में एमवीए को पटखनी देनी हो या बीएमसी जैसे किले में सेंध लगाने जैसा टफ सियासी मोर्चा, उन्होंने बीजेपी में खुद को साबित किया, उन्हें जो भी जिम्मेदारी मिलेगी, उससे ज्यादा काम कर दिखाया. 

कहने का मतलब है कि राजनीति के हर मोर्चे पर फडणवीस रणनीतिकार बनकर उभरे. यही वजह है कि उन्हें महाराष्ट्र की राजनीति का अब ‘चाणक्य’ कहा जाने लगा. शरद पवार और नितिन गडकरी जैसे सूरमां भी उनके  सामने अब कमजोर पड़ गए हैं.

BJP आंख मूंदकर क्यों करती है भरोसा?

दरअसल, बीजेपी को ऐसे नेता पसंद हैं जो चुनाव जिताए. अमित शाह कई बार सार्वजनिक रूप से यह कह चुके हैं कि हमारी पार्टी जिताऊ उम्मीदवार को टिकट देती है. देवेंद्र फडणवीस पार्टी के इस पैमाने पर पूरी तरह से फिट बैठते हैं. बात महाराष्ट्र में सत्ता संभालने की हो या और हार को भी रणनीति में बदलने की फडणवीस के लिए कुछ भी असंभव नहीं है. फडणवीस हर कसौटियों पर खरे उतरते हैं. 2019 में सत्ता हाथ से जाने के बाद भी पार्टी का चेहरा वही रहे, यह भरोसे का सबसे बड़ा प्रमाण है.

अजीत को डिप्टी CM बनाया, फिर इस्तीफा क्यों देना पड़ा?

महाराष्ट्र की राजनीति में एक दौर ऐसा भी आया जब उन्होंने किसी गठबंधन को बहुमत न मिलने पर अजीत पवार से NCP विधायकों का समर्थन हासिल कर सीएम पद की शपथ ली. लेकिन शरद पवार ने जैसे मोर्चा संभाला, पूरा ऑपरेशन ढह गया. अजित पवार वापस चाचा के खेमे में लौट गए. उसे बाद देवेंद्र को तत्काल सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा. यह उतार चढ़ा अक्टूबर 2019 के संपन्न महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे के बाद की है. दरअसल, किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था. शिवसेना–NCP–कांग्रेस (MVA) सरकार बनाने की तैयारी में थी. इस बीच सुबह-सुबह राजभवन में देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री बने और अजीत पवार ने डिप्टी CM पद की शपथ ले ली. पूरा देश देश हैरान, राजनीति सन्न रह गया था.

 महाराष्ट्र के ‘चाणक्य’ ऐसे देते हैं विरोधियों को मात

भारतीय राजनीति के इतिहास में चाणक्य की पहचान थी शोर नहीं, शतरंज की चाल नेता को चलने चाहिए. फडणवीस की राजनीति भी वैसी ही है. वे भावनात्मक भाषण से ज्यादा संख्या बल, किसी विवाद का समाधान संवैधानिक रास्ते, सियासी टाइमिंग का ख्याल रखते हैं. उसी के अनुरूप एक्शन लेते हैं या रणनीति बनाते हैं.

देवेंद्र के विरोधी जहां सड़क पर लड़ते हैं, फडणवीस वहां फाइल, फ्लोर और फॉर्मूले से खेल पलट देते हैं. यानी वो चुनावी जीत से पहले इस रणनीति पर काम करते हैं कि विरोधियों को पटखनी कैसे दी जाए. उनके खिलाफ नैरेटिव लोगों कैसे बने, जैसे पहलुओं को लेकर विरोधी की घेराबंदी करते हैं.

जहां कि देवेंद्र फडणवीस के सियासी सफर की बात है तो वह सबसे पहले नागपुर से पार्षद बने. उसके बाद वह महाराष्ट्र में सबसे युवा मेयर बने. फिर 2014 में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने. 2019 के बाद महाराष्ट्र में नेता प्रतिपक्ष बने. साल 2022 में सत्ता की वापसी के सूत्रधार बने और फिर सरकार के सबसे ताकतवर स्तंभ बनें.

देवेंद्र फडणवीस के राजनीतिक करियर पर गौर फरमाने पर साफ पता चलता है कि उनका ग्राफ कभी अचानक नहीं बढ़ा. आज वो महाराष्ट्र और देश की राजनीति में जिस मुकाम पर हैं, वह लगातार बनाई गई सियासी पूंजी का नतीजा है.

देवेंद्र फडणवीस की राजनीतिक USP क्या?

वह बीजेपी संगठन से लेकर जमीन पर गहराई से काम करने वाले राजनेता है. स्थानीय चुनाव हो या विधानसभा व लोकसभा हर सीट, हर नेता, हर समीकरण का ख्याल रखकर फैसला लेते हैं. इस काम के लिए वह संस्थागत समझ जैसे संविधान, कानून और प्रक्रियाओं की गहरी पकड़ भी बना रखा है. हमेशा लो-प्रोफाइल रहते हुए सियासी स्ट्राइक पर जोर देते हैं. यही वजह है कि जब तक विरोधी उन्हें समझते हैं, तब तक वह अपनी रणनीति चाल चल चुके होते हैं. यही वजह है कि वह न केवल संगठन के पकड़ रखते हैं, बल्कि कांग्रेस, एनसीपी, शिवसेना और अन्य दलों की कमजोरियों पर सही समय का इंतजार करते हैं, फिर चोट मारते हैं. जहां तक कैडर कनेक्ट की बात है कि उनके तार RSS और बीजेपी संगठन से मजबूती से जुड़े हैं. यही USP उन्हें बाकी नेताओं से अलग करती है.

विरोधी क्यों नहीं दे पाते ‘सियासी मौत’?

महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस को उनके विरोधी इसलिए गच्चा नहीं दे पाते हैं कि वो कोई भी सियासी काम अकेले नहीं खेलते है. किसी भावनात्मक जाल में नहीं फंसते और हार को भी सीख में बदलने की कोशिश करते रहते हैं. एमवीए ने उन्हें खत्म मान लिया था, लेकिन वही फडणवीस सत्ता के री-इंजीनियर बनकर लौटे.

लोकसभा चुनाव 2024: ऐसे बचाई बचाई पार्टी की लाज?

लोकसभा चुनाव 2024 में महाराष्ट्र बीजेपी के लिए आसान राज्य नहीं था, लेकिन फडणवीस ने सीट-शेयरिंग, उम्मीदवारों का चयन और ग्राउंड मैनेजमेंट से पार्टी को डैमेज कंट्रोल मोड से बाहर निकाला. जहां नुकसान होना था, उसे सीमित रखा. जहां मौका था, वहां बढ़त दिलाई.

 2024 में MVA का कैसे हुआ सूपड़ा साफ?

विधानसभा चुनाव में फडणवीस की रणनीति साफ थी, विरोधियों को साथ लड़ने दो, हम उन्हें अलग-अलग हराएंगे. सीट मैनेजमेंट, स्थानीय समीकरण और सत्ता का नैरेटिव जैसे मोर्चों पर एमवीए बिखरता चला गया. ऐसा होने में पर्दे के पीछे से उन्होंने अपना योगदान दिया. इस बात को विरोधी समय रहते नहीं समझ पाए.

निकाय और BMC विरोधियों को किया चारों खाने चित?

बीएमसी सिर्फ चुनाव नहीं, महाराष्ट्र की राजनीति के लिहाज से पावर सेंटर है. फडणवीस ने यहां कानूनी, प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर ऐसा जाल बुना कि विरोधी एक भी चाल फेल नहीं कर पाए. यहां भी विरोधियों के अंतिम समय तक एक नहीं होने दिया. शिवसेना शिंदे के एकनाथ शिंदे की नाराजगी को जैसे-तैसे थामे रखा. एनसीपी के अजित पवार को करीब बनाया. वजह है कि शिवसेना का गढ़ माने जाने वाला बीएमसीअब अजेय नहीं दिखता. तीन दशक बाद शिवसेना यूबीटी के उद्धव ठाकरे और मनसे के राज ठाकरे को उन्होंने एक ही झटक में सूपड़ा साफ कर दिया .

सियासी जानकारों की मानें तो देवेंद्र फडणवीस महाराष्ट्र में सिर्फ नेता नहीं, या मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि बीजेपी की रणनीतिक रीढ़ हैं. उनकी राजनीति शोर नहीं मचाती, लेकिन नतीजे बदल देती है. शायद इसी वजह से कहा जाता है महाराष्ट्र की राजनीति में अगर कोई चाणक्य है, तो उसका नाम देवेंद्र फडणवीस है.

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