'हिंदुत्व रणनीति नहीं, हमारी पहचान', बाला साहब की तरह उद्धव क्यों नहीं टटोल पाए महाराष्ट्र की 'नब्ज'
Balasaheb Thackeray Politics : अगर आज बाला साहब ठाकरे जिंदा होते, तो क्या 2026 में शिवसेना टूटती? क्या बीजेपी के साथ रिश्ते ऐसे बिगड़ते? या फिर बीएमसी चुनाव में शिवसेना यूबीटी बीजेपी से पिछड़ती. बाला साहब के बेटे उद्धव ठाकरे से कहां हुई चूक. जानिए बाला साहब की राजनीति, उद्धव की गलतियां और वो सबक, जो आज भी ठाकरे परिवार को सीखने की जरूरत है.
महाराष्ट्र की राजनीति में कुछ नाम विचारधारा नहीं, युग होते हैं. मराठाओं की राजनीति में हिंदू सम्राट बाला साहब ठाकरे ऐसे ही नाम थे. आज जब 2026 की सियासत नई करवट ले रही है, शिवसेना दो हिस्सों में बंटी है और ठाकरे परिवार संघर्ष के दौर से गुजर रहा है, तब सवाल उठता है, अगर बाला साहब आज होते तो क्या यह हालात पैदा होते? क्या एकनाथ शिंदे बगावत कर पाते? क्या बीजेपी से रिश्ता इस मोड़ तक आता? सबसे बड़ा सवाल-उद्धव ठाकरे से कहां चूक हुई, उन्हें अपने पिता से क्या सीखना चाहिए था?
बाला साहब होते तो क्या होता?
बीएमसी का चुनाव परिणाम के रुझान बहुत हद तक आ चुके है. बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है. शिवसेना शिंदे के शिवसेना से अलग होने की वजह से इस बार शिवसेना यूबीटी दूसरे नंबर पर है. लंबे अरसे बाद उसके हाथ से बीएमसी की सत्ता निकलती नजर आ रही है. ऐसे सवाी यह है कि महाराष्ट्र ही नहीं देश हिंदू सम्राट बाला साहब ठाकरे होते तो 2026 की राजनीति पूरी तरह अलग होती.
पहली बात, ऐसा होता तो शिवसेना कभी टूटती नहीं, क्योंकि बाला साहब में एक ऐसी कमांडिंग अथॉरिटी थी, जिसे चुनौती देने की हिम्मत किसी में नहीं थी. शिंदे जैसे नेता असंतुष्ट हो सकते थे, लेकिन बगावत नहीं कर पाते. दूसरी बात, बीजेपी से टकराव नहीं होता, होता भी तो दोनों अलग-अलग नहीं होत. दबाव की राजनीति होती पर अलगाव नहीं होता. बाला साहब गठबंधन में रहते हुए भी अपना वर्चस्व बनाए रखते थे. वे जानते थे कब दोस्ती निभानी है और कब ताकत दिखानी है.
उद्धव ठाकरे से कहां हुई बड़ी गलती?
शिवसेना यूबीटी प्रमुख और महाराष्ट्र के पूर्व सीएम उद्धव ठाकरे की सबसे बड़ी गलती थी यह हुई कि वह राजनीति को मैनेजमेंट की तरह चलाने की कोशिश की. जहां बाला साहब भावनाओं, सड़कों और कार्यकर्ताओं से राजनीति करते थे, वहीं उद्धव फाइल, मीटिंग और सिस्टम में उलझे रहे. उनका विधायकों से संवाद कमजोर रहा. असंतोष को समय रहते नहीं भांपा. पार्टी में डर की जगह दूरी पैदा हुई. यही दूरी बाद में टूट का कारण बनी. हिंदुत्व और गठबंधन को लेकर गलत आकलन किया. तीसरी बात ये कि उन्होंने बाला साहब की राजनीतिक विरासत को खुद को हमेशा के लिए वारिस समझ लिया.
हिंदुत्व रणनीति नहीं, पहचान थी
बाला साहब ठाकरे के लिए हिंदुत्व रणनीति नहीं, शिवसेना की पहचान थी. उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन तो किया, लेकिन शिवसेना के कोर वोटर को यह भरोसा नहीं दिला पाए कि विचारधारा सुरक्षित है. उन्होंने महाराष्ट्र के सीएम रहते हुए धर्मनिरपेक्षता की राजनीति की. मुसलमानों का गले लगाया. हिंदूवादी पार्टियों को सियासी गालियां दी. इसके बावजूद खुद को बाला साहब का असली उत्तराधिकारी बताया. इसी दौरान बीजेपी और शिवसेना शिंदे ने बाला साहब की सियासी लीगेसी को अपना लिया, जिसका लोकसभा चुनाव, विधानसभा चुनाव और अब बीएमसी चुनाव में महायुति को मिला है.
बाला साहब बनाम उद्धव की राजनीति
उद्धव ठाकरे की राजनीति का नतीजा यह हुआ कि हिंदुत्व वोटर भ्रमित हुआ. शिवसैनिकों में असमंजस का दायरा बहुत बढ़ा. शिंदे गुट को असल शिवसेना का दावा करने का मौका मिला. बाला साहब कभी मुख्यमंत्री नहीं बने, लेकिन मुख्यमंत्री तय करते थे. उद्धव मुख्यमंत्री बने, लेकिन सत्ता पर पकड़ ढीली रही. बाला साहब फैसले तुरंत लेते थे. उनके फैसले साफ और कठोर होते थे. उद्धव फैसले लेने में देर लगाते है. यही वजह है कि चुनाव परिणाम उनके पक्ष में नहीं आता. राजनीति में कई बार साहस, संवेदनशीलता से ज्यादा जरूरी होता है.
उद्धव को पिता से क्या सीखना चाहिए?
पूर्व सीएम उद्धव ठाकरे को अपने पिता बाला साहब से यह सीखने की जरूरत है कि कार्यकर्ता सर्वोपरि है. संगठन ऊपर से नहीं, नीचे से चलता है. कन्फ्यूजन की राजनीति घातक होती है. बहुत नरमी बगावत को जन्म देती है. राजनीति सिर्फ सत्ता नहीं, आंदोलन समझना चाहिए. 2026 के लिए संदेश है कि विरासत तभी बचेगी, जब संघर्ष होगा.
2026 में ठाकरे नाम तभी प्रासंगिक रहेगा, जब उद्धव आक्रामक राजनीति की राह पर आगे बढ़ेंगे. शिवसैनिकों के बीच लौटेंगे. बाला साहब की तरह सत्ता से ज्यादा सिद्धांतों पर जोर देंगें. वरना इतिहास यही कहेगा, विरासत मिली थी, संभाली नहीं जा सकी.





