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Gen Z vs Millennials: नौकरी, पैसा और लाइफस्टाइल पर क्यों बदल रही है नई पीढ़ी की सोच?

Gen Z और Millennials के बीच नौकरी, पैसा और लाइफस्टाइल को लेकर बड़ा फर्क दिख रहा है. जानें क्यों नई पीढ़ी वर्क-लाइफ बैलेंस और माइक्रोरिटायरमेंट को ज्यादा महत्व दे रही है.

Gen Z vs Millennials work culture lifestyle
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( Image Source:  Sora AI )

करियर, पैसा और लाइफस्टाइल को लेकर नई पीढ़ी की सोच तेजी से बदल रही है. जहां पहले स्थिर नौकरी और लंबी अवधि तक एक ही करियर में टिके रहना सफलता की पहचान माना जाता था, वहीं अब Gen Z के लिए अनुभव, आज़ादी और वर्क-लाइफ बैलेंस ज्यादा मायने रखने लगे हैं. यही वजह है कि आज कई युवा अपने 20s के आखिर में ही करियर ब्रेक, ट्रैवल या नई स्किल सीखने जैसे फैसले लेने से नहीं हिचकते, जबकि Millennials के लिए ऐसा करना अक्सर जिम्मेदारियों और आर्थिक दबावों के कारण आसान नहीं होता.

क्यों बदल रही है नई पीढ़ी की काम और जिंदगी को लेकर सोच?

पिछले कुछ वर्षों में वर्क कल्चर और करियर को लेकर नई पीढ़ी की सोच में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. खासकर Gen Z यानी 1997 के बाद जन्मी पीढ़ी नौकरी, पैसा और लाइफस्टाइल को पहले की पीढ़ियों से बिल्कुल अलग नजरिए से देख रही है. जहां Millennials अक्सर स्थिर करियर और आर्थिक सुरक्षा को प्राथमिकता देते रहे, वहीं Gen Z के लिए अनुभव, स्वतंत्रता और वर्क-लाइफ बैलेंस अधिक अहम बनते जा रहे हैं. यही वजह है कि आज कई युवा अपने करियर के शुरुआती दौर में ही जॉब से ब्रेक लेने या अलग रास्ते चुनने से नहीं हिचकते.

27 साल की उम्र में करियर ब्रेक लेना क्यों आसान?

आज के कई युवा अपने 20s के आखिर में ही काम से ब्रेक लेकर यात्रा करने, नई स्किल सीखने या खुद को रिचार्ज करने का फैसला कर रहे हैं. 27 वर्षीय आयशा कपूर जैसी युवा पेशेवर मानती हैं कि जीवन को केवल रिटायरमेंट के बाद जीने के लिए टालना सही नहीं है. उनके अनुसार अगर अभी सेविंग और प्लानिंग करके कुछ समय का ब्रेक लिया जा सकता है, तो जीवन के अनुभवों को टालने की जरूरत नहीं है. यह सोच दर्शाती है कि नई पीढ़ी करियर को एक सीधी रेखा की तरह नहीं बल्कि अलग-अलग चरणों में जीने वाली प्रक्रिया के रूप में देख रही है.

क्या सर्वे भी दिखाते हैं जेनरेशन के बीच यह अंतर?

इंडिया टुडे ने एक अंतरराष्ट्रीय सर्वे के हवाले से बताया है कि Gen Z के लगभग 63% लोग अपने जीवन में कम से कम एक बार ‘मिनी रिटायरमेंट’ या करियर ब्रेक लेने की योजना बना रहे हैं. इसके विपरीत Millennials में ऐसी इच्छा तो दिखाई देती है, लेकिन वास्तविकता में बहुत कम लोग ऐसा कर पाते हैं. भारत में भी किए गए एक सर्वे के अनुसार Gen Z के 64% और Millennials के 58% लोग करियर ब्रेक को सकारात्मक मानते हैं, लेकिन Millennials के लिए इसे लागू करना अधिक कठिन होता है.

Millennials के लिए करियर ब्रेक लेना क्यों मुश्किल होता है?

Millennials की उम्र आमतौर पर 30 से 40 वर्ष के बीच होती है और इस समय तक अधिकांश लोग जीवन की बड़ी जिम्मेदारियों से जुड़े होते हैं. घर का लोन, बच्चों की पढ़ाई, परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी और बढ़ते खर्च उन्हें करियर में स्थिर बने रहने के लिए मजबूर करते हैं. ऐसे में लंबे समय का ब्रेक लेना उनके लिए आर्थिक जोखिम बन सकता है. कई पेशेवर मानते हैं कि वे ब्रेक लेना चाहते तो हैं, लेकिन जीवन की परिस्थितियां उन्हें ऐसा करने की अनुमति नहीं देतीं.

क्या फाइनेंशियल टाइमिंग बड़ा कारण है?

जेनरेशन के बीच यह अंतर काफी हद तक फाइनेंशियल टाइमिंग से भी जुड़ा है. Gen Z आमतौर पर अपने करियर की शुरुआत में होती है, इसलिए उन पर आर्थिक जिम्मेदारियां कम होती हैं. वहीं Millennials तक पहुंचते-पहुंचते लोगों के ऊपर लोन, घर का खर्च और पारिवारिक जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं. इसी कारण जोखिम लेने की क्षमता कम हो जाती है और करियर में बड़ा बदलाव करना कठिन हो जाता है.

क्या Gen Z के लिए वर्क-लाइफ बैलेंस ज्यादा अहम है?

हालिया आंकड़ों से पता चलता है कि लगभग 76% युवा वर्कर सैलरी से ज्यादा वर्क-लाइफ बैलेंस को महत्व देते हैं. Gen Z के लिए नौकरी सिर्फ आय का स्रोत नहीं बल्कि जीवन का एक हिस्सा है. वे लचीले काम के घंटे, रिमोट वर्क और मानसिक स्वास्थ्य को महत्व देने वाली कार्य संस्कृति चाहते हैं. यही कारण है कि माइक्रोरिटायरमेंट या छोटे-छोटे करियर ब्रेक उनके लिए आकर्षक विकल्प बनते जा रहे हैं.

क्या वर्कप्लेस भी इस बदलाव के साथ ढल रहा है?

युवा कर्मचारियों की बदलती अपेक्षाओं को देखते हुए कई कंपनियां भी अपनी नीतियों में बदलाव कर रही हैं. आज कई संस्थाएं फ्लेक्सिबल सब्बाटिकल, रिमोट वर्क विकल्प, मेंटल हेल्थ लीव और करियर ब्रेक के बाद दोबारा एंट्री जैसे मॉडल अपनाने लगी हैं. हालांकि यह बदलाव अभी शुरुआती दौर में है और सभी उम्र के कर्मचारियों के लिए समान अवसर उपलब्ध कराने की चुनौती अभी भी बनी हुई है.

क्या माइक्रोरिटायरमेंट सिर्फ ट्रेंड है या नई सोच?

विशेषज्ञ मानते हैं कि माइक्रोरिटायरमेंट केवल एक फैशन नहीं बल्कि काम और जिंदगी को लेकर बदलती सोच का संकेत है. नई पीढ़ी करियर और जीवन को अलग-अलग चरणों में बांटने के बजाय उन्हें साथ-साथ जीना चाहती है. यही कारण है कि आज 27 साल का युवा पूछ रहा है कि जीवन को जीने के लिए 60 साल तक इंतजार क्यों किया जाए, जबकि 37 साल का व्यक्ति अक्सर जिम्मेदारियों के कारण ऐसा कदम उठाने से पहले कई बार सोचता है.

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