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Video: उद्धव की हार के बाद राज ठाकरे का जश्न! वायरल वीडियो ने खड़े किए सवाल, यूजर्स बोले - निर्लज्‍ज लोग कर रहे लुंगी डांस

महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर ठाकरे परिवार केंद्र में है. उद्धव ठाकरे की करारी हार के बाद राज ठाकरे के जश्न के वीडियो वायरल हैं। सवाल उठ रहा है. क्या ये सिर्फ राजनीतिक जीत का उत्सव है या भाई के सियासी अस्तित्व पर अंतिम चोट? सच यह है कि ये सिर्फ एक चुनावी हार नहीं. यह एक परिवार, एक विरासत और एक सियासी अध्याय के खत्म होने का संकेत भी हो सकता है, लेकिन जश्न जिस अंदाज़ में मनाया गया, उसने राजनीति को रिश्तों से ऊपर खड़ा कर दिया है.

Video: उद्धव की हार के बाद राज ठाकरे का जश्न! वायरल वीडियो ने खड़े किए सवाल, यूजर्स बोले - निर्लज्‍ज लोग कर रहे लुंगी डांस
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( Image Source:  Akshay Joshi @AkshayJoshi_11 / Voice Of Tribals 🏹 @VoiceOfTribals_ )

महाराष्ट्र की राजनीति में भावनाएं, परिवार और सत्ता हमेशा एक-दूसरे में उलझे रहे हैं, लेकिन इस बार तस्वीर कुछ ज्यादा ही तल्ख है. उद्धव ठाकरे की चुनावी हार के बाद, राज ठाकरे के जश्न के वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल रहे हैं. राज ठाकरे बीएमसी का चुनाव परिणाम आने के बाद ढोल-नगाड़े, ठहाके और मुस्कुराते चेहरे के साथ घर से बाहर निकल तो सोशल मीडिया पर लोगों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं. लोगों का सवाल है कि जब राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नव निर्माण सेना उद्धव की पार्टी की साथ मिलकर चुनाव लड़ा तो ये जश्न कैसा? यह सिर्फ सवाल नहीं, बल्कि उनकी नीयत पर शक भी है.

क्या ये जश्न राजनीतिक जीत का है या भाई की हार पर ताली बजाने का? इस बात को लेकर राज ठाकरे सुर्खियों में इसलिए हैं कि उद्धव की हार के बाद, जश्न के वीडियो वायरल हो रहे हैं!

बीएमसी चुनाव में हार उद्धव ठाकरे के लिए महज सीटों की गिनती भर नहीं है. यह उस विरासत की हार मानी जा रही है, जिसे कभी बालासाहेब ठाकरे ने हिंदुत्व, मराठी अस्मिता और सड़क की राजनीति से खड़ा किया था. बीएमसी से लेकर विधानसभा तक, शिवसेना (उद्धव गुट) लगातार बैकफुट पर दिखी.

हार के बाद जश्न, राजनीति या निजी बदला?

हार के तुरंत बाद राज ठाकरे के जश्न मनाते वीडियो सामने आए हैं. जहां न कोई संवेदना दिखी, न भाईचारे का भाव. यही वजह है कि सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं कि “क्या भाई की हार पर यूं जश्न मनाना मराठी मानुस की परंपरा है?”

‘भाई के ताबूत में आखिरी कील’ वाली राजनीति तो नहीं!

महाराष्ट्र के सियासी जानकारों का कहना है कि राजनीतिक विश्लेषक इसे यूं देख रहे हैं कि राज ठाकरे ने उद्धव की हार को अपने राजनीतिक पुनर्जन्म के तौर पर पेश करने की कोशिश की है. जिस उद्धव को कभी ‘कमजोर नेता’ कहा गया, अब उसकी हार को निर्णायक साबित करने की होड़ है. एक्स यूजर Saim-Xpert @TheDarkhope6 ने अपने पोस्ट में लिखा है कि भाई यह तो हार गए फिर किस चीज का सेलिब्रेशन कर रहे हैं?

बाला साहेब होते तो क्या ऐसा होता?

यही सवाल हर मराठी घर और चाय की टपरी पर चर्चा में है. लोग यह भी कह रहे है कि दोनों भाइयों यानी राज और उद्ध0 की नासमझी की वजह से ऐसा हो रहा है. एक यूजर ने कहा कि दोनों भाई ठीक वैसे ही हैं, जैसे राष्ट्रीय राजनीति में राहुल गांधी. अंतर केवल इतना है कि राहुल गांधी सेक्युलरवाद की तो राज और उद्धव मराठी वाद का नारा लगा रहे है. जबकि मुंबई समेत महाराष्ट्र के लोग बहुत आगे निकल चुके हैं.

आज अगर बाला साहेब ठाकरे होते तो वह परिवार को टूटने नहीं देते थे. मतभेद होते थे, लेकिन तमाशा नहीं बनता था. आज वही ठाकरे ब्रांड, जश्न और वायरल वीडियो में सिमटता दिख रहा है.

गड़बड़ हुआ तो चुने कॉर्पोरेटर शासकों को दफना देंगे - ठाकरे

वहीं, एक्स पर अपने पोस्ट में राज ठाकरे ने लिखा है कि महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और शिवसेना के सभी चुने हुए कॉर्पोरेटर को मेरी तरफ से दिल से बधाई. इस बार का चुनाव आसान नहीं था. यह शिवसेना के खिलाफ बहुत ज्यादा पैसे और पावर की लड़ाई थी. ऐसी लड़ाई में भी, दोनों पार्टियों के वर्कर्स ने अच्छा मुकाबला किया. इसके लिए उनकी जितनी तारीफ की जाए कम है.

यह दुख की बात है कि महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को इस बार उम्मीद के मुताबिक कामयाबी नहीं मिली, लेकिन हम हिम्मत हारने वालों में से नहीं हैं. हमारे चुने हुए कॉर्पोरेटर्स वहां के शासकों को वहीं दफना देंगे. और अगर उन्हें लगेगा कि मराठी लोगों के खिलाफ कुछ हो रहा है, तो वे उन शासकों को जरूर सजा दिलाएंगे. हमारी लड़ाई मराठी लोगों, मराठी भाषा, मराठी पहचान और एक खुशहाल महाराष्ट्र के लिए है. यह लड़ाई हमारे वजूद की है. आप सब जानते हैं कि ऐसी लड़ाइयां लंबे समय तक चलती हैं.

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