आखिर पाताल में क्यों घुस गया रुपया! पहली बार 92.05 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर- कब और कैसे सुधरेंगे हालात?

भारतीय रुपया 4 मार्च को डॉलर के मुकाबले 92.05 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया. इस गिरावट की बड़ी वजह मिडिल ईस्ट में बढ़ा युद्ध तनाव है, जहां Iran पर Israel और United States की सैन्य कार्रवाई के बाद हालात क्षेत्रीय संघर्ष में बदल गए और रुपया दबाव में आ गया.

क्या 87 पर लौटेगा रुपया या 94 तक गिरेगा? जानिए एक्सपर्ट्स का अनुमान

(Image Source:  Sora_ AI )
By :  अच्‍युत कुमार द्विवेदी
Updated On : 4 March 2026 6:13 PM IST

Why Rupee Fell to 92.05: भारतीय रुपया 4 मार्च को पहली बार डॉलर के मुकाबले 92.05 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया. यह गिरावट मुख्य रूप से मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव से जुड़ी हुई है, जहां ईरान पर अमेरिका और इजरायल ने हमला कर दिया और उसके बाद ईरान भी जवाब कार्रवाई की, जिससे पूरे क्षेत्र में युद्ध फैल गया. इस संघर्ष की शुरुआत ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत से शुरू हुआ. अब यह जंग लेबनान, खाड़ी देशों और समुद्री मार्गों तक फैल चुका है. क्रूड ऑयल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं. इन सब घटनाओं ने निवेशकों को सुरक्षित निवेश (Safe Haven) की ओर धकेला है, जिससे डॉलर मजबूत हुआ और रुपया दबाव में आ गया.

यह पहली बार नहीं है, जब रुपये ने 92 का स्तर पार किया हो. इससे पहले, 2025 में भी यह 90 से नीचे गिरा था, लेकिन इस बार मिडिल ईस्ट क्राइसिस ने इसे रिकॉर्ड लो पर पहुंचाया. मौजूदा हालात में Iran–Israel War और उसमें United States की संभावित भूमिका ने वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ा दी है. इसके साथ ही अमेरिका में ब्याज दरों को लेकर सख्त रुख, विदेशी निवेशकों की बिकवाली (FPI Outflow) और आयात बिल बढ़ने से रुपया लगातार दबाव में है.

डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने की क्या वजहें हैं?

  • मिडिल ईस्ट युद्ध का गहराना: अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों ने वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता बढ़ा दी है, जिससे निवेशक सुरक्षित निवेश के रूप में डॉलर की ओर भाग रहे हैं।
  • कच्चे तेल में भारी उछाल: संघर्ष के कारण आपूर्ति बाधित होने के डर से ब्रेंट क्रूड $82 प्रति बैरल के पार निकल गया है. भारत अपनी जरूरत का 85% तेल आयात करता है, जिससे डॉलर की मांग बढ़ गई है.
  • विदेशी फंडों की निकासी: अनिश्चितता के माहौल में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय शेयर बाजार से बड़े पैमाने पर पैसा निकाला है, जिससे बाजार से 9.7 लाख करोड़ रुपये स्वाहा हो गए.
  • मजबूत डॉलर इंडेक्स: वैश्विक स्तर पर 'रिस्क-ऑफ' सेंटिमेंट के कारण डॉलर इंडेक्स 98-99 के स्तर को पार कर गया है, जिससे रुपया सहित अन्य उभरती हुई मुद्राएं कमजोर हुई हैं.

मिडिल ईस्ट संकट का भारत पर असर

इस संकट के कारण भारत को तिहरी मार झेलनी पड़ रही है: पहला, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से महंगाई (पेट्रोल-डीजल, माल ढुलाई) बढ़ेगी; दूसरा, व्यापार घाटा में इजाफा होगा क्योंकि तेल खरीदने के लिए अधिक विदेशी मुद्रा खर्च करनी होगी; और तीसरा, खाड़ी देशों में रहने वाले 1 करोड़ से अधिक भारतीयों की सुरक्षा और वहां से आने वाले रेमिटेंस (विदेशी पैसा) पर खतरा मंडरा रहा है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था का एक बड़ा सहारा है.

हालात कब और कैसे सुधरेंगे?

  • भू-राजनीतिक स्थिरता: जब तक ईरान-इजरायल तनाव कम नहीं होता और तेल की कीमतें स्थिर नहीं होतीं, तब तक रुपये पर दबाव बना रहेगा. रुपये की रिकवरी मुख्य रूप से मिडिल ईस्ट क्राइसिस की अवधि और गंभीरता पर निर्भर करेगी. अगर संघर्ष दो हफ्तों में खत्म हो जाता है, तो बाजारों में तेज रिकवरी हो सकती है, जैसे कि पिछले साल जून में देखा गया था. हालांकि, अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ब्लॉकेज होता है या युद्ध लंबा खिंचता है, तो रुपया 92 से आगे गिर सकता है, और रिकवरी में 6-12 महीने लग सकते हैं.
  • RBI का हस्तक्षेप: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अपने विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग कर डॉलर बेचकर रुपये की गिरावट को थामने की कोशिश कर सकता है.  अगर वैश्विक तेल सप्लाई सामान्य होती है, तो इन्फ्लेशन कम होने से रेट कट्स का फायदा मिलेगा.
  • अनुमान: कुछ विशेषज्ञ 2026 के अंत तक रुपये के 87-88 के स्तर पर लौटने की उम्मीद कर रहे हैं, बशर्ते वैश्विक तनाव कम हो और भारत का निर्यात बढ़े. हालांकि, कुछ अन्य रेटिंग एजेंसियां इसके 93-94 तक जाने का भी अंदेशा जता रही हैं. कई विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर ऑयल की कीमतें 80 डॉलर से नीचे आती हैं और FII outflows रुकते हैं, तो 2026 के अंत तक रुपया 92-95 के बीच स्टेबलाइज हो सकता है.
  • अमेरिका में ब्याज दरों में नरमी: अगर फेड दरें घटाता है तो डॉलर कमजोर हो सकता है।

IMF का कहना है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर संघर्ष की लंबाई पर निर्भर करेगा, और भारत के लिए ट्रेड डील्स (जैसे यूएस-ईयू) से कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन ऑयल शॉक से GDP ग्रोथ 0.5% तक घट सकती है. कुल मिलाकर, सुधार के लिए जरूरी है- तेल कीमतों में गिरावट, डिप्लोमैटिक समाधान, और RBI का मजबूत इंटरवेंशन.

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