25 साल की उम्र में शहादत, आज भी इजराइल करता है सलाम, कौन थे दलपत सिंह, जिनका PM Modi ने Knesset में किया जिक्र?
मेजर दलपत सिंह को हाइफा के नायक के रूप में जाना जाता है, जिनकी शहादत आज भी भारत और इजराइल के साझा इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय मानी जाती है. हाइफा पहले तुर्की में था और आज वह हाइफा का एक शहर है.
Who is Major Thakur Dalpat Singh: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इजराइल की संसद कनेसैट में अपने संबोधन के दौरान फर्स्ट वर्ल्ड वॉर के वक्त हाइफा की लड़ाई में बहादुरी दिखाने वाले ब्रिटिश भारतीय सेना के अधिकारी मेजर ठाकुर दलपत सिंह को याद किया.
उन्होंने कहा कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हजारों भारतीय सैनिकों ने इस इलाके में अपने प्राण न्यौछावर किए थे. उन वीरों में मेजर ठाकुर दलपत सिंह भी शामिल थे, जिन्हें हाइफा के नायक के तौर पर भी जाना जाता है. प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि विश्व युद्ध के दौरान इस क्षेत्र में भारतीय सैनिकों का योगदान महत्वपूर्ण रहा था. उन्होंने विशेष रूप से मेजर ठाकुर दलपत सिंह का उल्लेख करते हुए कहा कि वे हाइफा के हीरो थे.
कौन थे ठाकुर दलपत सिंह?
मेजर दलपत सिंह शेखावत, जिन्हें हाइफा के नायक के रूप में जाना जाता है, भारतीय इतिहास में वीरता और साहस के प्रतीक माने जाते हैं. उनकी बहादुरी और शहादत ने न केवल भारतीय सेना के पराक्रम को उजागर किया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की प्रतिष्ठा को मजबूत किया. उन्हें प्रथम विश्व युद्ध के दौरान इजराइल के हाइफा नगर को आजाद कराने का श्रेय दिया जाता है.
मेजर दलपत सिंह का जन्म 26 जनवरी 1892 को राजस्थान के जोधपुर जिले के देवली गांव में हुआ था. वे रावणा राजपूत शेखावत परिवार से संबंधित माने जाते हैं. हाइफा की लड़ाई में उनके साहसिक नेतृत्व और वीरता के कारण उन्हें हाइफा के नायक के रूप में याद किया जाता है. उनके योगदान को आज भी भारत और इजराइल के साझा इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में देखा जाता है.
दलपत सिंह को क्या इजराइली भी करते हैं पसंद?
23 सितंबर 1918 को आधुनिक सैन्य इतिहास की आखिरी बड़ी घुड़सवार लड़ाई लड़ी गई थी.यह हमला जोधपुर लांसर्स के मेजर ठाकुर दलपत सिंह ने हाइफा में तुर्की सेना के खिलाफ किया था. हाइफा अब इजराइल में है. मेजर दलपत सिंह को इजराइल में हाइफा के नायक के रूप में याद किया जाता है. इजराइली मानते हैं कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान फिलिस्तीन पर कब्जा करने में भारतीय सैनिकों का योगदान महत्वपूर्ण था और वे इसके लिए भारत के प्रति आभारी हैं.
तुर्की के खिलाफ जंग में उनके कुछ गोलियां रीढ़ की हड्डी में लगी थी. इसके बाद उन्हें तुरंत इलाज के लिए ले जाया गया, कुछ घंटों बाद ही उनकी ऑपरेशन टेबल पर ही मौत हो गई. उस वक्त उनकी उम्र केवल 25 साल थी. सर एडमंड एलेनबी ने अपने आधिकारिक संदेश में उनके साहस और नेतृत्व का भी जिक्र किया था.
इजराइल के बनने में उनकी कुर्बानी कितनी अहम?
लेफ्टिनेंट जनरल प्रताप सिंह ने पत्र लिखकर कहा कि उन्होंने सबसे आगे रहकर वीरगति पाई और उनका नेतृत्व राठौड़ों की परंपरा के मुताबिक था. इजराइल में उन्हें हाइफा के नायक के रूप में याद किया जाता है. उनके नेतृत्व में मिली इस जीत ने फिलिस्तीन को तुर्कों से मुक्त कराने में अहम भूमिका निभाई, जिससे आगे चलकर इजराइल राज्य के गठन की राह भी आसान हुई.




