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पाकिस्तान में लगता है पीरियड टैक्स, ये 2 वकील आए आगे तो झुकने लगी सरकार, सिर्फ 12% महिलाएं ही कर पाती हैं पैड्स का इस्तेमाल: Detail

पाकिस्तान सरकार ने महिलाओं के स्वास्थ्य और मासिक धर्म से जुड़े मामले में अहम फैसला लिया है. सरकार का ये फैसला 2 वकीलों की हिम्मत के कारण मुमकिन हो पाया है.

पाकिस्तान में लगता है पीरियड टैक्स, ये 2 वकील आए आगे तो झुकने लगी सरकार, सिर्फ 12% महिलाएं ही कर पाती हैं पैड्स का इस्तेमाल: Detail
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( Image Source:  AI GENERATED IMAGE-ChatGPT )

पाकिस्तान सरकार ने महिलाओं के स्वास्थ्य और पीरियड्स से जुड़े सामाजिक कलंक को कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाने का ऐलान किया है. सरकार ने सैनिटरी उत्पादों और गर्भनिरोधक साधनों (Contraceptives) पर लगने वाला 18 प्रतिशत सेल्स टैक्स खत्म करने का प्रस्ताव रखा है. यह घोषणा पिछले सप्ताह पेश किए गए देश के नए बजट का हिस्सा है. पाकिस्तान में काफी वक्त से पीरियड्स पैड्स पर टैक्स हटाने की मांग की जा रही थी.

पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगज़ेब ने कहा कि सैनिटरी उत्पाद महिलाओं के स्वास्थ्य, सम्मान और सामाजिक जीवन में उनकी भागीदारी के लिए बेहद जरूरी हैं. उन्होंने यह भी घोषणा की कि गर्भनिरोधक साधनों पर भी टैक्स खत्म किया जाएगा. वित्त मंत्री ने कहा कि पाकिस्तान दुनिया का पांचवां सबसे अधिक आबादी वाला देश है और तेजी से बढ़ती जनसंख्या सरकार के लिए चिंता का विषय है. ऐसे में परिवार नियोजन सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है.

पाकिस्तान में कैसे शुरू हुई पीरियड्स टैक्स हटाने की मुहिम?

इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाने का श्रेय दो युवा वकीलों एहसान जहांगीर खान और महनूर उमर को दिया जा रहा है. दोनों ने सरकार के खिलाफ एक ऐतिहासिक कानूनी याचिका दायर कर मांग की थी कि सैनिटरी उत्पादों को लग्जरी वस्तुओं की बजाय आवश्यक वस्तुओं की श्रेणी में रखा जाए और उन पर लगाया जाने वाला तथाकथित "पीरियड टैक्स" समाप्त किया जाए.

अक्टूबर में दायर याचिका में कहा गया था कि स्थानीय स्तर पर बनने वाले सैनिटरी उत्पादों पर 18 प्रतिशत सेल्स टैक्स लगाया जाता है, जबकि आयातित उत्पादों पर 25 प्रतिशत कस्टम ड्यूटी भी देनी पड़ती है. अन्य स्थानीय करों को मिलाकर महिलाओं को पीरियड प्रोडक्ट्स पर कुल लगभग 40 प्रतिशत अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ता है.

पाकिस्तान में कितनी महिलाएं इस्तेमाल करती हैं सैनिटरी पैड?

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) के अनुसार, पाकिस्तान में केवल लगभग 12 प्रतिशत महिलाएं और लड़कियां व्यावसायिक रूप से उपलब्ध सैनिटरी उत्पादों का इस्तेमाल करती हैं. अधिकांश महिलाएं कपड़े या अन्य घरेलू विकल्पों का सहारा लेती हैं. सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि महंगे दाम इसके पीछे प्रमुख कारणों में से एक हैं. UNICEF के अनुसार, भारी टैक्स के कारण सैनिटरी उत्पाद गरीब और कमजोर वर्ग की महिलाओं की पहुंच से बाहर हो जाते हैं. इसी वजह से लंबे समय से इन उत्पादों को सस्ता बनाने की मांग उठती रही है.

पाकिस्तान में सेनेटरी पैड के कितने दाम?

  • रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान में कई मुख्य ब्रांड हैं, जिनके दाम कुछ इस तरह हैं.
  • DiDi Maxi Plus XL (10 पैड): लगभग ₹130 (पीकेआर)
  • Freedom Ultra Thin (16 पैड): लगभग ₹480 (पीकेआर)
  • Butterfly Breathables (8 से 16 पैड): लगभग ₹300 से ₹650 (पीकेआर)
  • Always Thicks (26 पैड): लगभग ₹816 (पीकेआर)

याचिकाकर्ता महनूर उमर और उनके वकील एहसान खान ने सरकार के फैसले का स्वागत किया है, लेकिन उनका कहना है कि केवल सेल्स टैक्स हटाना पर्याप्त नहीं है. वे सैनिटरी उत्पादों और उनके निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल पर लगने वाले सभी प्रकार के करों को समाप्त करने की मांग कर रहे हैं.

उनका तर्क है कि टैक्स व्यवस्था महिलाओं और लड़कियों के स्वास्थ्य, शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी के अधिकारों को प्रभावित करती है. साथ ही यह पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन है, जो लिंग के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है. एहसान खान ने कहा कि यदि यह संवैधानिक याचिका दायर नहीं की गई होती, तो सरकार शायद यह स्वीकार नहीं करती कि सैनिटरी उत्पादों पर लगाया गया सेल्स टैक्स भी गलत है.

पहले कितने देश उठा चुके हैं ये कदम?

पिछले कुछ वर्षों में भारत, नेपाल, स्कॉटलैंड और अमेरिका के एक दर्जन से अधिक राज्यों सहित कई देशों ने पीरियड उत्पादों पर टैक्स कम करने या पूरी तरह समाप्त करने जैसे कदम उठाए हैं. संयुक्त राष्ट्र महिला संगठन (UN Women) ने भी पाकिस्तान सरकार के इस प्रस्ताव का स्वागत किया है. संगठन का कहना है कि इससे सैनिटरी उत्पाद अधिक सुलभ होंगे और महिलाएं तथा लड़कियां स्कूलों और कार्यस्थलों पर अधिक सक्रिय रूप से भाग ले सकेंगी.

क्या और कम होगी पाकिस्तान में सैनेटरी पैड की कीमत?

नवंबर में हुई सुनवाई के बाद रावलपिंडी की एक अदालत ने सरकार को याचिका में उठाए गए मुद्दों पर समयबद्ध जवाब देने का निर्देश दिया था. सरकार ने अपने जवाब में कहा कि टैक्स दरें न तो अत्यधिक हैं और न ही भेदभावपूर्ण, क्योंकि इनसे प्राप्त राजस्व का उपयोग सार्वजनिक सेवाओं पर किया जाता है, जिनका लाभ महिलाओं को भी मिलता है. अब सरकार अपना जवाब अदालत में दाखिल कर चुकी है और मामले में अंतिम बहस होनी बाकी है. यदि अदालत याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाती है, तो सैनिटरी उत्पादों और उनसे जुड़े कच्चे माल पर लगने वाले अन्य करों को भी समाप्त किया जा सकता है.

एहसान खान का कहना है कि उनकी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है, लेकिन उन्हें खुशी है कि सरकार ने कम से कम यह स्वीकार कर लिया है कि सैनिटरी उत्पाद कोई लग्जरी सामान नहीं, बल्कि महिलाओं की बुनियादी जरूरत हैं.

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