मानसून सत्र में बड़ा खेल करने की तैयारी में मोदी सरकार? यूं ही नहीं टूटी TMC, अब शिवसेना-UBT की है बारी
मानसून सत्र से पहले TMC में टूट के बाद अब शिवसेना-UBT में संभावित टूट की चर्चाएं चरम पर है. जानिए कैसे बदल सकता है महाराष्ट्र, INDIA गठबंधन और संसद का पूरा गणित.
पिछले साल मानसून सत्र की शुरुआत 21 जुलाई को हुई थी. इस बार सरकार की ओर से अभी तक आधिकारिक तौर पर इसकी घोषणा नहीं की गई है. इस बात की संभावना है कि मानसून सत्र जुलाई के तीसरे या चौथे सप्ताह में शुरू हो सकता है. इसके बावजूद देश की राजनीति में तापमान अभी से चरम पर पहुंच गया है. इसकी वजह महाराष्ट्र की राजनीति एक नए मोड़ की ओर बढ़ना है. इससे पहले 2022 में हुई शिवसेना की ऐतिहासिक बगावत ने राज्य की सत्ता और राजनीतिक समीकरण बदल दिए थे. उस समय एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायक उद्धव ठाकरे का साथ छोड़कर अलग हो गए थे. इसके बाद पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न भी शिंदे गुट के हिस्से में चला गया.
अब चर्चा इस बात की है कि क्या शिवसेना (UBT) को एक और बड़े झटके का सामना करना पड़ सकता है? राजनीतिक गलियारों में ऐसी अटकलें तेज हैं कि पार्टी के 6 से 7 सांसद शिंदे गुट का रुख कर सकते हैं. हालांकि, अभी तक किसी तरह की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यदि ऐसा होता है तो इसके प्रभाव केवल उद्धव ठाकरे तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि महाराष्ट्र और राष्ट्रीय राजनीति दोनों में दूरगामी असर दिखाई देगा. यही वजह है कि इस बार मानसून सत्र हंगामेदार होने की संभावना है.
ऐसा इसलिए कि मोदी सरकार महिला आरक्षण बिल और डिलिमिटेशन बिल को हर हाल में पास कराना चाहती है, जिसके लिए लोकसभा में जरूरी संख्या जुटाने की रणनीति के तहत दल बदल का खेल बंगाल चुना के बाद से जारी है. वहीं इंडिया गठबंधन भी सरकार की इस मुहिम को फ्लॉप करने की कोशिश में अभी से जुट गई है.
क्या उद्धव ठाकरे की राजनीतिक हैसियत को नुकसान होगा?
2022 में उद्धव ठाकरे के हाथ से विधायक चले गए, पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न भी हाथ से निकल गया. अगर अब सांसदों का भी एक बड़ा हिस्सा अलग हो जाता है, तो उद्धव ठाकरे की राजनीतिक ताकत ठाकरे ब्रांड और मुंबई-कोकण क्षेत्र तक सीमित होकर रह सकती है. इससे यह धारणा और मजबूत होगी कि शिवसेना का संगठनात्मक ढांचा अब शिंदे गुट के साथ खड़ा है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसी स्थिति में उद्धव ठाकरे की राज्यव्यापी पकड़ कमजोर पड़ सकती है.
क्या MVA का संतुलन बदल जाएगा?
महाविकास अघाड़ी (MVA) में कांग्रेस, शिवसेना (UBT) और शरद पवार की एनसीपी प्रमुख सहयोगी दल हैं. यदि UBT कमजोर होती है तो गठबंधन का मराठी अस्मिता और मराठी-हिंदुत्व वाला चेहरा भी कमजोर पड़ सकता है. इसका सीधा फायदा कांग्रेस को मिल सकता है, जो गठबंधन के भीतर सबसे बड़ी विपक्षी ताकत बनकर उभर सकती है. वहीं, शरद पवार गुट का महत्व भी बढ़ सकता है, क्योंकि सीट बंटवारे और राजनीतिक बातचीत में उद्धव ठाकरे की सौदेबाजी क्षमता पहले की तुलना में कम हो जाएगी.
क्या NDA को इसका फायदा मिलेगा?
अगर सांसदों की संभावित टूट होती है तो इसका लाभ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को मिल सकता है. लोकसभा में NDA की संख्या बढ़ेगी और महाराष्ट्र में बीजेपी-शिंदे गठबंधन यह दावा और अधिक मजबूती से करेगा कि बालासाहेब ठाकरे की असली राजनीतिक विरासत उनके साथ है. इसके अलावा, आगामी स्थानीय निकाय चुनावों और विशेष रूप से मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनावों में शिंदे गुट को मनोवैज्ञानिक बढ़त मिलने की संभावना भी बढ़ जाएगी.
क्या INDIA गठबंधन के लिए यह बड़ा झटका साबित होगा?
राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से सीटों का गणित बहुत अधिक नहीं बदलेगा, लेकिन विपक्षी एकता की छवि पर असर पड़ सकता है. पहले एनसीपी में विभाजन हुआ, फिर शिवसेना टूटी और यदि UBT में भी एक और बड़ी टूट होती है, तो बीजेपी को INDIA गठबंधन की स्थिरता और एकजुटता पर सवाल उठाने का नया राजनीतिक मुद्दा मिल जाएगा. इसलिए, यह केवल संख्या का नहीं बल्कि संदेश और धारणा का भी मामला माना जा रहा है.
क्या महाराष्ट्र की राजनीति दो खेमों में बंट जाएगी?
ऐसी स्थिति में राज्य की राजनीति और स्पष्ट रूप से दो धड़ों में दिखाई दे सकती है. एक तरफ बीजेपी, शिंदे शिवसेना और अजित पवार गुट होगा, जबकि दूसरी तरफ कांग्रेस, शरद पवार गुट और कमजोर हुई शिवसेना (UBT) खड़ी नजर आ सकती है. यदि यह समीकरण बनता है तो 2029 की राजनीतिक तैयारी से पहले कांग्रेस विपक्ष का केंद्रीय चेहरा बन सकती है. वहीं उद्धव ठाकरे, जो कभी विपक्षी राजनीति के प्रमुख स्तंभ माने जाते थे, अपेक्षाकृत जूनियर सहयोगी की भूमिका में पहुंच सकते हैं.
क्या महाराष्ट्र में लोकसभा की तस्वीर बदल सकती है?
2024 के लोकसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र की 48 सीटों का गणित एमवीए के पक्ष में था. कांग्रेस के पास 13 सांसद, शिवसेना (UBT) के पास 9, बीजेपी के पास 9, शरद पवार की एनसीपी के पास 8, शिंदे शिवसेना के पास 7, अजित पवार की एनसीपी के पास 1 और एक निर्दलीय सांसद था.
गठबंधन स्तर पर देखें तो INDIA/MVA के पास कुल 30 सांसद थे, जिनमें कांग्रेस के 13, UBT के 9 और शरद पवार गुट के 8 सांसद शामिल थे. दूसरी ओर NDA के पास बीजेपी के 9, शिंदे शिवसेना के 7 और अजित पवार गुट के 1 सांसद सहित कुल 17 सांसद थे.
अब UBT के 9 सांसदों में से 6 सांसद शिंदे गुट में चले जाते हैं, तो UBT की संख्या घटकर 3 और शिंदे शिवसेना की संख्या बढ़कर 13 हो जाएगी. तब महाराष्ट्र में INDIA/MVA के पास कांग्रेस के 13, UBT के 3 और शरद पवार गुट के 8 सांसद मिलाकर कुल 24 सांसद रह जाएंगे.
वहीं, NDA के पास बीजेपी के 9, शिंदे के 13 और अजित पवार गुट के 1 सांसद मिलाकर कुल 23 सांसद हो जाएंगे. यानी आज जो अंतर लगभग 30 बनाम 17 का है, वह घटकर 24 बनाम 23 तक पहुंच सकता है.
क्या सबसे ज्यादा फायदा BJP को मिलेगा?
दिलचस्प बात यह है कि संख्यात्मक रूप से सबसे बड़ा फायदा बीजेपी से ज्यादा एकनाथ शिंदे को मिलेगा. वर्तमान में बीजेपी के पास महाराष्ट्र से 9 सांसद और शिंदे गुट के पास 7 सांसद हैं. संभावित टूट के बाद भाजपा 9 पर ही रहेगी. जबकि शिंदे गुट 13 सांसदों तक पहुंच सकता है. यानी पहली बार शिंदे शिवसेना महाराष्ट्र में बीजेपी से बड़ा लोकसभा दल बनकर उभर सकती है. हालांकि, बीजेपी को अप्रत्यक्ष रूप से फायदा मिलेगा, क्योंकि NDA मजबूत होगा, उद्धव ठाकरे कमजोर होंगे, MVA की राजनीति बदलेगी और 2029 से पहले विपक्ष का एक प्रमुख चेहरा कमजोर पड़ जाएगा.
क्या राष्ट्रीय स्तर पर भी इसका असर दिखाई देगा?
18वीं लोकसभा में बीजेपी के 240 सांसद हैं. कांग्रेस के 99, समाजवादी पार्टी के 37, तृणमूल कांग्रेस के 29, डीएमके के 22, टीडीपी के 16, जेडीयू के 12, शिवसेना (UBT) के 9, शरद पवार एनसीपी के 8 और शिंदे शिवसेना के 7 सांसद हैं. गठबंधन स्तर पर NDA के पास 293 सांसद, INDIA गठबंधन के पास 234 सांसद और अन्य दलों के पास 16 सांसद हैं.
यदि UBT के 6 सांसद शिंदे गुट में चले जाते हैं, तो NDA की संख्या 293 से बढ़कर 299 और INDIA गठबंधन की संख्या 234 से घटकर 228 हो जाएगी. हालांकि, इससे केंद्र सरकार की स्थिरता पर कोई सीधा असर नहीं पड़ेगा, लेकिन राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव काफी बड़ा होगा.
सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि यदि सांसदों की संभावित टूट के बाद स्थानीय निकायों और विशेष रूप से BMC में भी संगठनात्मक ताकत शिंदे गुट के पक्ष में जाती है, तो महाराष्ट्र में कांग्रेस सबसे बड़ी विपक्षी शक्ति बन सकती है और उद्धव ठाकरे तीसरे नंबर के सहयोगी दल तक सीमित हो सकते हैं. इस संभावित घटनाक्रम को 2022 की बगावत के बाद महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे बड़ा मोड़ माना जा रहा है.
क्या 362 के जादुई आंकड़े से सिर्फ कुछ कदम दूर है NDA?
सिर्फ गणित के आधार पर देखें तो तस्वीर दिलचस्प बनती है. 18वीं लोकसभा में NDA के पास लगभग 293 सांसद हैं. दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा 543 सदस्यीय सदन में 362 के आसपास माना जाता है.
यदि Trinamool Congress के 29 में से 20 सांसद, Dravida Munnetra Kazhagam के 22 सांसद, Shiv Sena (Uddhav Balasaheb Thackeray) के 6 सांसद,आम आदमी पार्अी के 3 सांसद, शिरोमणि अकाली दल के 1 सांसद और 16 अन्य सांसद NDA के पक्ष में आ जाएँ, तो कुल अतिरिक्त संख्या 68 होगी. यानी 293 + 68 = 361 सांसद.
यानी NDA दो-तिहाई बहुमत के लिए आवश्यक 362 के आंकड़े से केवल 1 सीट पीछे रह जाएगा. यदि एक और सांसद का समर्थन मिल जाए तो गठबंधन 362 तक पहुंच सकता है.
हालांकि, यह समीकरण एक अनुमान भर है. बीजेपी ऐसा करने के प्रयास में भी जुटी है. लेकिन जमीनी हकीकत अलग है. वास्तविक राजनीति में अलग-अलग राज्यों, दलों और दल-बदल कानून की बाधाओं के कारण इतने बड़े पैमाने पर सांसदों का एक साथ पाला बदलना बेहद कठिन माना जाता है.
यह समीकरण, फिलहाल राजनीतिक संभावना से अधिक एक सैद्धांतिक संख्या है. इसके बावजूद टीएमसी और शिव सेना यूबीटी ब्रेक होने भर से भी राष्ट्रीय स्तर पर सियासी नैरेटिव पूरी तरह से एनडीए के पक्ष में होगा. यही वजह है कि विपक्षी दल यह कह रहे है कि बीजेपी हर हाल में डिलिमिटेशन और महिला आरक्षण बिल पास कराना चाहती है.




