टूटते दल, बदलती वफादारियां और नए समीकरण: क्या 1969-1977, 1989, 2019 और अब 2026 सियासी गोलबंदी का टर्निंग प्वाइंट है?
1969, 1977, 1989 और 2019 की तरह क्या 2026 भी भारतीय राजनीति में बड़े पुनर्गठन का साल बनेगा? दल-बदल, गठबंधन और नए सत्ता समीकरणों का विश्लेषण.
भारतीय राजनीति में कुछ साल केवल चुनावी कैलेंडर का हिस्सा नहीं होते, बल्कि वे सत्ता, विचारधारा और राजनीतिक वफादारियों की दिशा बदल देते हैं. 1969, 1977, 1989 और 2019 ऐसे ही साल रहे हैं जिन्होंने देश की राजनीति को नए रास्ते पर खड़ा किया. 2026 को लेकर भी इसी तरह की चर्चा शुरू हो चुकी है. पश्चिम बंगाल में TMC संकट, क्षेत्रीय दलों के भीतर बढ़ती बेचैनी, NDA और INDIA गठबंधन के बदलते समीकरण तथा 2029 की तैयारियों के बीच सवाल उठ रहा है कि क्या भारत एक बार फिर बड़े राजनीतिक गोलबंदी (Political Realignment) के दौर में प्रवेश कर रहा है.
1969: कांग्रेस का विभाजन और Magnetic नेतृत्व जन्म
1969 भारतीय राजनीति का पहला बड़ा टर्निंग प्वाइंट था. कांग्रेस उस समय देश की एक मात्र राजनीतिक शक्ति थी, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पार्टी के शक्तिशाली संगठनात्मक नेताओं के बीच टकराव बढ़ गया. राष्ट्रपति चुनाव को लेकर शुरू हुआ विवाद इतना गहरा गया कि कांग्रेस दो हिस्सों (कांग्रेस-ओ और कांग्रेस-आर) में बंट गई. आजाद भारत में नेता संगठन पर भारी पड़ गया.
इंदिरा गांधी ने सीधे जनता से संवाद स्थापित कर पारंपरिक संगठनात्मक ढांचे को चुनौती दी. इसके बाद भारतीय राजनीति में करिश्माई नेतृत्व केंद्र में आ गया. आज क्षेत्रीय दलों में दिखाई देने वाला "वन लीडर मॉडल" काफी हद तक उसी दौर की राजनीतिक विरासत माना जाता है.
दरअसल, 1969 भारतीय राजनीति का पहला बड़ा गोलबंदी (Realignment) था. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और कांग्रेस संगठन पर नियंत्रण रखने वाले 'सिंडिकेट' नेताओं के बीच टकराव चरम पर पहुंच गया. उसी दौर में इंदिरा गांधी ने 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, जो केवल आर्थिक फैसला नहीं बल्कि राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन भी माना गया. बैंक राष्ट्रीयकरण ने उन्हें गरीबों और ग्रामीण भारत की नेता के रूप में स्थापित किया तथा सिंडिकेट के प्रभाव को चुनौती दी.
कांग्रेस का पारंपरिक सामूहिक नेतृत्व मॉडल कमजोर हुआ और व्यक्तित्व आधारित राजनीति मजबूत हुई. बाद में ममता बनर्जी, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, जयललिता, नवीन पटनायक, उद्धव ठाकरे और अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं की पार्टियों में जो "एक नेता-केंद्रित मॉडल" दिखा, उसकी जड़ें काफी हद तक 1969 के बाद की राजनीति में देखी जाती हैं.
1977: Emergency के बाद कांग्रेस की पहली बड़ी हार
1977 का चुनाव भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी राजनीतिक घटनाओं में गिना जाता है. 1975 में लगाए गए आपातकाल के बाद विपक्ष पहली बार एकजुट होकर जनता पार्टी के बैनर तले चुनाव मैदान में उतरा. परिणामस्वरूप कांग्रेस को केंद्र की सत्ता से बाहर होना पड़ा और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी.
1977 ने यह मिथक तोड़ दिया कि कांग्रेस को हराया नहीं जा सकता. इसी दौर में गठबंधन राजनीति की नींव पड़ी और क्षेत्रीय नेताओं को राष्ट्रीय स्तर पर जगह मिलने लगी. जनता पार्टी सरकार भले ज्यादा समय नहीं चली, लेकिन उसने भारतीय राजनीति को बहुदलीय प्रतिस्पर्धा के नए युग में प्रवेश करा दिया. आज INDIA गठबंधन और NDA की राजनीति की जड़ें भी काफी हद तक इसी दौर में दिखाई देती हैं.
1989: गठबंधन युग और क्षेत्रीय दलों का उदय
1989 का चुनाव भारतीय राजनीति में स्थायी बदलाव लेकर आया. बोफोर्स विवाद से घिरी कांग्रेस कमजोर हुई और वी.पी. सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा सत्ता में आया. बीजेपी और वाम दलों ने बाहर से समर्थन दिया. यही वह दौर था जब राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय दल निर्णायक भूमिका निभाने लगे.
इसके बाद लगभग तीन दशक तक कोई भी राष्ट्रीय दल क्षेत्रीय दलों को नजरअंदाज नहीं कर सका. बिहार में लालू प्रसाद यादव, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव, तमिलनाडु में करुणानिधि और जयललिता, ओडिशा में नवीन पटनायक, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, पंजाब में प्रकाश सिंह बादल जैसे नेताओं का प्रभाव इसी दौर में बढ़ा. 1989 ने "दिल्ली की सत्ता राज्यों के रास्ते जाएगी" वाली राजनीति को स्थापित किया.
2019: बहुमत वाली पॉवर सेंट्रिक सरकार
2019 का लोकसभा चुनाव 1989 के बाद बने राजनीतिक ढांचे के लिए एक बड़ा झटका था. बीजेपी ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लगातार दूसरी बार पूर्ण बहुमत हासिल किया. पहली बार ऐसा लगा कि राष्ट्रीय राजनीति फिर से एक मजबूत केंद्रीय नेतृत्व के इर्द-गिर्द सिमट रही है.
कई क्षेत्रीय दल अपने राज्यों तक सीमित होते चले गए और राष्ट्रीय विमर्श पर बीजेपी का प्रभाव बढ़ा. 2019 ने यह संदेश दिया कि क्षेत्रीय दल अभी भी राज्यों में मजबूत हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता का केंद्र फिर से एक बड़े राष्ट्रीय दल के हाथ में जा सकता है. यही वह दौर था जब विपक्षी दलों ने बीजेपी के मुकाबले संयुक्त रणनीति की जरूरत महसूस की, जिससे आगे चलकर INDIA गठबंधन की अवधारणा मजबूत हुई.
2026: क्या क्षेत्रीय दलों के पुनर्गठन का साल?
यदि 1969 ने कांग्रेस को बदला, 1977 ने सत्ता परिवर्तन की संभावना साबित की, 1989 ने क्षेत्रीय दलों को ताकत दी और 2019 ने राष्ट्रीय राजनीति को फिर से केंद्र सरकार को पॉवर सेंट्रिक बना दिया. अब 2026 शायद क्षेत्रीय दलों की फिर से गोलबंदी के संकेत मिलने लगे हैं. ऐसा हुआ तो यह साल फिर से 1977 बन सकता है.
पश्चिम बंगाल में TMC के भीतर उभरा संकट केवल एक राज्य की कहानी नहीं है. 2025 में चुनाव के बाद बिहार में आरजेडी के सामने अस्तित्व का संकट, महाराष्ट्र में शिवसेना और NCP में हुई टूट, पंजाब में AAP की चुनौतियां, झारखंड में बदलते समीकरण और कई क्षेत्रीय दलों में उत्तराधिकार की राजनीति को लेकर उठ रहे सवाल यह संकेत दे रहे हैं कि करिश्माई नेतृत्व आधारित दलों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं.
आज आरजेडी, टीएमसी, आम आदमी पार्टी, शिरोमणि अकाली दल, शिवसेना यूबीटी, एनसीपीएसपी, डीएमके, जेएमएम सहित कई क्षेत्रीय दलों की सबसे बड़ी समस्या बीजेपी नहीं, बल्कि संगठन के भीतर नेतृत्व परिवर्तन, दूसरी पीढ़ी की राजनीति और सत्ता से बाहर होने के बाद पैदा होने वाली अस्थिरता बनती जा रही है.
2026 टर्निंग प्वाइंट कैसे?
यही वह बिंदु है, जहां 2026 की कहानी TMC से आगे निकल जाती है. बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी में चल रहा संघर्ष, पंजाब में AAP की चुनौतियां, झारखंड में JMM पर नजर, उत्तर प्रदेश में SP की 2027 तैयारी, कांग्रेस की विस्तार महत्वाकांक्षा और बीजेपी की 2029 रणनीति- ये सभी अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं.
इन सबको एक साथ देखें तो तस्वीर एक बड़े राजनीतिक गोलबंदी की दिखाई देती है. 1989 के बाद जिस क्षेत्रीय दलों के युग का विस्तार हुआ था, 2026 उस मॉडल की नई परीक्षा बन सकता है. सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि कौन-सा नेता किस दल में जाएगा, बल्कि यह है कि क्या भारत की राजनीति एक बार फिर नए शक्ति केंद्रों, नए गठबंधनों और नई राजनीतिक वफादारियों की ओर बढ़ रही है.
इसलिए 2026 को केवल दल-बदल का साल कहना पर्याप्त नहीं होगा. यह वह साल भी हो सकता है जो 2029 की राजनीति, विपक्ष की संरचना और क्षेत्रीय दलों के भविष्य की दिशा तय करे.
दल-बदल कोई नई घटना नहीं
भारतीय राजनीति में दल-बदल कोई नई घटना नहीं है, लेकिन 2026 की खासियत यह है कि यह बदलाव केवल नेताओं तक सीमित नहीं दिख रहा. कई जगहों पर पूरे राजनीतिक समूह, क्षेत्रीय दल और गठबंधन अपनी नई पहचान तलाश रहे हैं. यही वजह है कि 2026 को "टूटते दल, बदलते नेता और नई राजनीतिक वफादारियों का साल" कहा जाने लगा है.
अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि कौन-सा दल टूटेगा, कौन-सा गठबंधन मजबूत होगा और कौन-सा नेता नई भूमिका में दिखाई देगा. लेकिन इतना तय है कि 2026 में शुरू हुई राजनीतिक हलचल का असर 2029 के लोकसभा चुनाव तक महसूस किया जाएगा.




