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दीदी के दुर्ग में दरार: कोलकाता से दिल्ली तक पहुंची नाराज TMC सांसदों-विधायकों की आग, सबकी निगाहें ओम बिरला पर क्यों?

TMC में बढ़ती बगावत ने बंगाल की राजनीति को हिला दिया है. सांसदों-विधायकों के असंतुष्ट गुट और ओम बिरला से मुलाकात के बीच 15 जून को बड़ा राजनीतिक फैसला संभव.

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पश्चिम बंगाल में कभी अजेय मानी जाने वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) आज अपने सबसे बड़े आंतरिक संकट का सामना करती दिख रही है. विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद शुरू हुई नाराजगी अब संगठन, विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा तक फैल चुकी है. एक तरफ ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी का आधिकारिक नेतृत्व है, तो दूसरी तरफ सांसदों और विधायकों का वह असंतुष्ट खेमा है जो पार्टी की कार्यशैली और नेतृत्व पर सवाल उठा रहा है.

स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि बागी सांसदों का गुट काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से सोमवार को मुलाकात तय है. दिल्ली में शक्ति प्रदर्शन की तैयारी भी चल रही है. इसी वजह से 15 जून को TMC के लिए "आर या पार" का दिन माना जा रहा है. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह दिन तय कर सकता है कि पार्टी के भीतर असली ताकत किसके पास है और क्या ममता बनर्जी अपने संगठन पर पहले जैसा नियंत्रण बनाए रख पाएंगी?

हार के बाद कैसे शुरू हुई बगावत?

बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद सबसे पहले असंतोष विधानसभा के भीतर दिखाई दिया. रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व में कई विधायकों ने ममता के फैसलों पर सवाल उठाने शुरू किए. धीरे-धीरे यह असंतोष संगठित रूप लेने लगा और पार्टी के भीतर समानांतर गुटबंदी की चर्चा तेज हो गई.

इसी दौरान राज्यसभा में भी नाराजगी खुलकर सामने आई. राज्यसभा के तीन टीएमसी सांसद इस्तीफा दे चुके है. वरिष्ठ नेता सुखेंदु शेखर राय ने टीएमसी नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल उठाए. इसके बाद लोकसभा के कई सांसद भी खुलकर सामने आने लगे. देखते ही ही देखते यह संकट केवल संगठनात्मक मतभेद नहीं रहा, बल्कि नेतृत्व बनाम असंतुष्ट गुट की लड़ाई में बदल गया.

काकोली घोष दस्तीदार कैसे बनीं बागी खेमे का चेहरा?

लोकसभा में इस विद्रोह का सबसे बड़ा चेहरा काकोली घोष दस्तीदार बनकर उभरी हैं. वह ममता बनर्जी के शुरुआती दिनों के संघर्ष के समय से ही भरोसेमंद चेहरा रही हैं. दावा किया जा रहा है कि लोकसभा में TMC के 28 सांसदों में से 19 से 20 सांसद, उनके साथ हैं. बागी खेमे का कहना है कि उनके पास दो-तिहाई से अधिक समर्थन है और इसलिए उन्हें अलग संसदीय पहचान मिलनी चाहिए. सभी सांसद 15 जून को दिल्ली में स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात करेंगे.

हालांकि, ममता खेमे ने इन दावों को खारिज किया है. पार्टी नेतृत्व का कहना है कि कुछ नेता संख्या बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं और अधिकांश सांसद अब भी आधिकारिक नेतृत्व के साथ हैं. इसके बावजूद यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि पहली बार टीएमसी के भीतर इतनी बड़ी संख्या में सांसद खुले तौर पर नेतृत्व को चुनौती देते दिखाई दे रहे हैं.

विधानसभा में भी ममता के लिए चुनौती

संकट केवल संसद तक सीमित नहीं है. विधानसभा में भी बागी विधायकों का एक बड़ा समूह सक्रिय बताया जा रहा है. रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट का दावा है कि उसके साथ 80 में से 64 विधायक हैं और यदि जरूरत पड़ी तो वह फ्लोर टेस्ट के लिए भी तैयार है. विधानसभा स्पीकर ने तो बागी गुट को मान्यता भी दे दी है.

यही कारण है कि यह लड़ाई केवल लोकसभा सांसदों की बगावत नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे संगठन, विधानसभा और संसदीय राजनीति में समानांतर शक्ति संघर्ष के रूप में देखा जा रहा है. यदि विधायकों और सांसदों के असंतुष्ट गुट एक मंच पर आते हैं तो यह ममता बनर्जी के लिए अब तक की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बन सकती है.

किस खेमे में कौन?

ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व वाले आधिकारिक खेमे में कल्याण बनर्जी, डेरेक ओ'ब्रायन, डोला सेन, कीर्ति आजाद और कई पुराने संगठनात्मक नेता शामिल माने जा रहे हैं.

वहीं बागी खेमे में काकोली घोष दस्तीदार के अलावा शत्रुघ्न सिन्हा, यूसुफ पठान, सायोनी घोष, माला रॉय, शताब्दी रॉय, पार्थ भौमिक और दीपक अधिकारी सहित 20 सांसद हैं. हाल के दिनों में वरिष्ठ सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय के रुख को लेकर भी राजनीतिक अटकलें बढ़ी हैं, जिसने ममता खेमे की चिंता और बढ़ा दी है.

शुभेंदु अधिकारी की भूमिका क्यों अहम?

दिल्ली में चल रही राजनीतिक गतिविधियों के बीच शुभेंदु अधिकारी की सक्रियता ने भी अटकलों को हवा दी है. बागी नेताओं के साथ उनकी मुलाकातों और लगातार संपर्क की खबरों के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या बंगाल की राजनीति का यह संकट राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित कर सकता है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि बागी सांसदों को लोकसभा में अलग पहचान मिलती है या वे किसी बड़े राजनीतिक गठबंधन के करीब जाते हैं, तो इसका असर केवल बंगाल तक सीमित नहीं रहेगा. इससे संसद में विपक्षी राजनीति और एनडीए दोनों की रणनीतियों पर असर पड़ सकता है.

15 जून को क्यों माना जा रहा है निर्णायक दिन?

15 जून को बागी सांसदों की दिल्ली में प्रस्तावित बैठक और लोकसभा अध्यक्ष से संभावित मुलाकात को पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम पड़ाव माना जा रहा है. बागी नेता अपने संख्याबल का प्रदर्शन करना चाहते हैं, जबकि ममता खेमा इसे महज दबाव की राजनीति बता रहा है.

दिल्ली में होने वाला यह शक्ति प्रदर्शन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके जरिए बागी खेमा यह संदेश देना चाहता है कि असंतोष कुछ नेताओं तक सीमित नहीं बल्कि एक बड़े राजनीतिक वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है. इसी दिन आगे की रणनीति, संसदीय पहचान और संभावित राजनीतिक विकल्पों पर भी चर्चा हो सकती है.

दिल्ली में खिंच जाएगी लक्ष्मण रेखा?

ममता बनर्जी और बागी गुट के बीच टकराव अब उस स्तर पर पहुंच चुका है जहां समझौते की संभावना लगातार कम होती दिखाई दे रही है. आरोप-प्रत्यारोप, कानूनी नोटिस, संगठनात्मक फेरबदल और दिल्ली में समानांतर शक्ति प्रदर्शन यह संकेत दे रहे हैं कि दोनों पक्ष अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे हैं.

यदि बागी सांसद लोकसभा अध्यक्ष के सामने अपेक्षित संख्या दिखाने में सफल रहते हैं और विधायकों का समर्थन भी उनके साथ बना रहता है, तो TMC के भीतर औपचारिक विभाजन की स्थिति बन सकती है. दूसरी ओर यदि ममता बनर्जी अपने सांसदों और विधायकों को एकजुट रखने में सफल रहती हैं, तो यह उनके नेतृत्व की बड़ी जीत मानी जाएगी.

फिलहाल, बंगाल से दिल्ली तक एक ही सवाल चर्चा में है कि क्या 15 जून TMC में सत्ता संघर्ष का निर्णायक मोड़ बनेगा, या फिर ममता बनर्जी एक बार फिर अपने विरोधियों को मात देकर पार्टी पर पकड़ मजबूत कर लेंगी? आने वाले कुछ घंटे इस सवाल का जवाब दे सकते हैं.

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