क्या खामेनेई के बाद ‘बेलगाम’ हुई IRGC, ओमान हमले पर ईरान ने क्यों झाड़ा पल्ला?
ईरान के विदेश मंत्री ने चौंकाने वाला बयान देते हुए कहा है कि Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) अब “स्वतंत्र” तरीके से काम कर रही है और ओमान पर हुआ हमला “हमारी पसंद नहीं” था. मंत्री के बयान से यह स्पष्ट है कि ईरान की यह एलीट फोर्स अब बेकाबू हो गई है.
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ईरान के विदेश मंत्री ने चौंकाने वाला बयान देते हुए कहा है कि Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) अब “स्वतंत्र” तरीके से काम कर रही है और ओमान पर हुआ हमला “हमारी पसंद नहीं” था. मंत्री के बयान से यह स्पष्ट है कि ईरान की यह एलीट फोर्स अब बेकाबू हो गई है.
यह बयान ऐसे समय आया है जब ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद सत्ता और सैन्य कमान को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है. सवाल यह है कि क्या IRGC अब सीधे सरकार के बजाय पहले दिए गए निर्देशों पर कार्रवाई कर रही है?
क्या है पूरा मामला?
अमेरिका और इज़राइल के साथ जारी संघर्ष के बीच ओमान के एक बंदरगाह को निशाना बनाए जाने की खबरों ने खाड़ी क्षेत्र में हलचल मचा दी. इस पर ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरघाची ने अल जज़ीरा को दिए इंटरव्यू में कहा, “ओमान में जो हुआ, वह हमारी पसंद नहीं था. हमने अपने सशस्त्र बलों से कहा है कि वे अपने लक्ष्यों का चयन सावधानी से करें.” उन्होंने आगे कहा कि सैन्य इकाइयां अब “किसी हद तक स्वतंत्र और अलग-थलग” होकर पहले से दिए गए सामान्य निर्देशों के आधार पर कार्रवाई कर रही हैं. इस बयान ने संकेत दिया कि IRGC मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व के प्रत्यक्ष नियंत्रण में नहीं हो सकती.
IRGC की स्थापना और संरचना
IRGC की स्थापना मई 1979 में ईरानी क्रांति के बाद रुहोल्लाह खुमैनी ने की थी. क्रांति के बाद बनाए गए नए संविधान में दो समानांतर सैन्य ढांचे तय किए गए-एक पारंपरिक सेना, जिसे इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान (आर्टेश) कहा जाता है, और दूसरी रिवोल्यूशनरी गार्ड यानी पासदारान (IRGC), जिसका उद्देश्य इस्लामी व्यवस्था की रक्षा करना है. IRGC सीधे सुप्रीम लीडर को रिपोर्ट करती है. खामेनेई की मौत के बाद यह सवाल उठ रहा है कि अब इसका सर्वोच्च कमांडर कौन है. जब तक नया सुप्रीम लीडर नहीं चुना जाता, IRGC प्रभावी रूप से बिना प्रत्यक्ष “बॉस” के काम कर सकती है.
क्यों कहा जा रहा है कि ईरान ‘स्पेशल केस’ है?
दुनिया भर की सेनाएं आपात स्थितियों के लिए पूर्व-योजना (contingency planning) करती हैं. लेकिन ईरान का मामला अलग है. IRGC देश के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और ड्रोन बेड़े का बड़ा हिस्सा कंट्रोल करती है. खामेनेई ने IRGC को सैन्य दायरे से आगे बढ़कर आर्थिक गतिविधियों में भी प्रवेश की अनुमति दी थी. आज यह संगठन निर्माण कंपनियां, बंदरगाह, टेलीकॉम नेटवर्क और अन्य व्यावसायिक संस्थान चलाता है. यानी इसके पास वित्तीय और लॉजिस्टिक संसाधनों की कोई कमी नहीं है.
बदले की कसम और सख्त रुख
खामेनेई की हत्या के बाद IRGC ने बदला लेने की कसम खाई है. अपने आधिकारिक टेलीग्राम चैनल पर संगठन ने कहा कि “ईरानी राष्ट्र का बदले का हाथ हत्यारों को नहीं छोड़ेगा.” संगठन ने यह भी कहा कि वह अपने नेता की विरासत की रक्षा करते हुए आंतरिक और बाहरी साजिशों के खिलाफ मजबूती से खड़ा रहेगा और हमलावरों को “सबक सिखाने वाली सजा” देगा.
IRGC की ताकत कितनी?
हालांकि पारंपरिक सेना के मुकाबले IRGC के पास लगभग दो लाख कम सैनिक हैं, लेकिन उसे ईरान की सबसे प्रभावशाली सैन्य ताकत माना जाता है. इसके अपने थल, वायु और नौसैनिक विंग हैं. इसके अलावा, इसका विशेष दस्ता ‘कुद्स फोर्स’ गुप्त और विदेशी अभियानों के लिए जिम्मेदार है. कुद्स फोर्स को ईरान के तथाकथित “एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस” नेटवर्क की रीढ़ माना जाता है, जिसमें क्षेत्रीय सहयोगी समूह शामिल हैं. IRGC का अपना खुफिया तंत्र भी है, साथ ही ‘बसीज’ नामक स्वयंसेवी बल, जिसे घरेलू विरोध प्रदर्शनों को दबाने में इस्तेमाल किया जाता रहा है.
आगे क्या?
विदेश मंत्री का बयान दो तरह से देखा जा रहा है - एक ओर यह संकेत देता है कि सरकार हालात को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर यह पड़ोसी देशों को संदेश हो सकता है कि ईरान सीधे टकराव नहीं चाहता. लेकिन जब तक नया सुप्रीम लीडर नहीं चुना जाता और कमान स्पष्ट नहीं होती, तब तक IRGC की स्वतंत्र कार्रवाई क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बड़ी चुनौती बनी रह सकती है. खाड़ी क्षेत्र और वैश्विक शक्तियाँ अब बारीकी से देख रही हैं कि ईरान की सैन्य और राजनीतिक दिशा किस ओर जाती है.




