1979 की क्रांति ने निभाया अहम रोल, खुमैनी ने गढ़ा पावर स्ट्रक्चर; Iran में कैसे बन गया सुप्रीम लीडर इतना ताकतवर?
ईरान में सुप्रीम लीडर का पद सबसे ज्यादा ताकतवर होता है. इसके बाद ही देश के राष्ट्रपति और अन्य सियासी लीडर्स की पावर गिनी जाती हैं. आखिर ईरान में ये पद इतना ताकतवर कैसे हो गया? आइये जानते हैं पूरी डिटेल.
US-Iran-Israel War News: 86 वर्षीय आयतुल्लाह अली खामेनेई, जो ईरान के इस्लामिक गणराज्य के सुप्रीम लीडर थे, उनकी हत्या अमेरिका और इजराइल के हमले में कर दी गई. इसके साथ ही ईरान की राजनीति के एक महत्वपूर्ण दौर का अंत हो गया. उनकी मौत के तुरंत बाद नए सुप्रीम लीडर के सेलेक्शन का प्रोसेस शुरू कर दिया गया है, ताकि ‘असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स’ नाम की संस्था नया नेता चुन सके.
इस बीच संविधान के प्रावधानों के तहत तीन सदस्यों की एक अंतरिम नेतृत्व परिषद बना दी गई है, जो नए सुप्रीम लीडर के चयन तक उनकी जिम्मेदारियां संभालेगी. यह घटनाक्रम दिखाता है कि संकट की स्थिति से निपटने के लिए ईरान की राजनीतिक व्यवस्था में पहले से तय प्रक्रियाएं मौजूद हैं.
ईरान में क्या है राजनीतिक व्यवस्था?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, आयतुल्लाह खामेनेई उस राजनीतिक व्यवस्था का नेतृत्व कर रहे थे, जो 1978-79 की इस्लामी क्रांति के बाद बनी थी. पिछले 47 सालों में यह व्यवस्था कई संस्थाओं और राजनीतिक प्रक्रियाओं के जरिए विकसित हुई. शिया बहुल ईरान में धर्म और राजनीति का संबंध 1979 से पहले भी गहरा रहा है.
ईरान के धार्मिक नेताओं ने हमेशा राजशाही का विरोध किया. 19वीं सदी का तंबाकू आंदोलन, 1906-11 की संवैधानिक क्रांति, 1963 में शाह के ‘व्हाइट रिवोल्यूशन’ के खिलाफ आंदोलन और 1979 की इस्लामी क्रांति- इन सभी में धार्मिक नेताओं की भूमिका रही.
1979 क्रांति में कैसे मिली धार्मिक नेतृत्व को जगह?
1979 की क्रांति में लगभग हर वर्ग के लोग शामिल थे, जिनमें कम्युनिस्ट और मजदूर भी थे. लेकिन धार्मिक नेतृत्व को ज्यादा समर्थन और वैधता मिली. इसकी एक वजह मस्जिदों की भूमिका थी. शाह की गुप्त पुलिस ‘सावाक’ सार्वजनिक स्थानों पर निगरानी रखती थी, लेकिन मस्जिदें राजनीतिक गतिविधियों का सुरक्षित स्थान बन गई थीं. जुमे की नमाज राजनीतिक और धार्मिक सभा का प्रमुख केंद्र मानी जाती थीं.
पहले सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खुमैनी ने निर्वासन के दौरान ही 1979 की क्रांति को वैचारिक दिशा दी. उन्होंने ‘विलायत-ए-फकीह’ यानी धार्मिक विद्वान के शासन का सिद्धांत दिया, जो बाद में ईरान की राजनीतिक व्यवस्था की नींव बना. 1979 के संविधान में सुप्रीम लीडर को सबसे अधिक शक्ति दी गई.
खुमैनी से शुरुआत कैसे हुई?
1989 में खुमैनी की मौत के बाद आयतुल्लाह अली खामेनेई सुप्रीम लीडर बने. 1989 में संविधान में कुछ बदलाव हुए, जैसे प्रधानमंत्री का पद खत्म कर दिया गया और उसकी जिम्मेदारियां राष्ट्रपति और संसद अध्यक्ष में बांट दी गईं. हालांकि व्यवस्था का मूल ढांचा वही रहा.
ईरान-इराक जंग में रहा अहम रोल
खामेनेई इससे पहले 1981 से 1989 तक दो बार ईरान के राष्ट्रपति रह चुके थे. उनके कार्यकाल में ईरान-इराक युद्ध हुआ, जो आठ साल चला. वे खुद युद्ध में शामिल रहे और सुप्रीम लीडर बनने के बाद भी शहीद सैनिकों के परिवारों से मिलते रहे.
खामेनेई का क्या था इंटरनेशनल रुख?
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्हें कड़ा रुख अपनाने वाला नेता माना जाता था, जबकि कुछ विश्लेषक उन्हें व्यवहारिक भी मानते थे. 2022 में महसा अमीनी की मौत के बाद हुए प्रदर्शनों और हाल के आर्थिक मुद्दों पर विरोध ने सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े किए थे. उन्होंने ‘रेजिस्टेंस इकोनॉमी’ यानी आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की बात की, ताकि पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना किया जा सके, लेकिन इससे देश की आर्थिक समस्याएं पूरी तरह दूर नहीं हो सकीं.
आईआरजीसी की भूमिका
ईरान की सत्ता संरचना में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की भी अहम भूमिका है. 1979 की क्रांति के बाद बनी इस संस्था ने न सिर्फ देश की सुरक्षा बल्कि पश्चिम एशिया में ईरान के प्रभाव को बढ़ाने में भी भूमिका निभाई. गाजा में हमास और लेबनान में हिजबुल्लाह जैसे संगठनों को समर्थन देने में इसका योगदान रहा है.
लगातार आर्थिक प्रतिबंध, अंतरराष्ट्रीय अलगाव और लोगों की बढ़ती अपेक्षाओं ने व्यवस्था और जनता के बीच दूरी पैदा की है. 47 साल बाद इस्लामिक गणराज्य के सामने कई सवाल खड़े हैं- खासकर जनता की मांगों और सरकार के कामकाज के बीच बढ़ती खाई को लेकर. मौजूदा युद्ध, देश की संप्रभुता पर हमला और शीर्ष नेतृत्व की हत्या ने ईरान की राजनीतिक व्यवस्था के सामने अभूतपूर्व चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. अब सबकी नजर इस बात पर है कि नया नेतृत्व किस दिशा में देश को आगे ले जाएगा.




