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Harvard University से छिना नंबर-1 का ताज, CWTS लीडेन रैंकिंग चीन की यूनिवर्सिटीज का दबदबा, जानें भारत की Position

दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी मानी जाने वाली हार्वर्ड यूनिवर्सिटी को CWTS Leiden Ranking 2025 (Science Category) में बड़ा झटका लगा है. हार्वर्ड अब नंबर-1 या नंबर-2 नहीं, बल्कि तीसरे स्थान पर पहुंच गई है. इस बार टॉप-2 पोजिशन चीन की झेजियांग यूनिवर्सिटी और शंघाई जिओ टोंग यूनिवर्सिटी ने हासिल की हैं. टॉप-10 की सूची में अधिकांश स्थान चीनी यूनिवर्सिटीज के नाम हैं, जो इस बात का संकेत है कि वैश्विक रिसर्च और साइंस लीडरशिप अमेरिका से चीन की ओर शिफ्ट हो रही है.

Harvard University से छिना नंबर-1 का ताज, CWTS लीडेन रैंकिंग चीन की यूनिवर्सिटीज का दबदबा, जानें भारत की Position
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( Image Source:  sora ai )
नवनीत कुमार
By: नवनीत कुमार

Published on: 17 Jan 2026 2:40 PM

दुनिया की शिक्षा और रिसर्च व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव साफ नजर आने लगा है. वर्षों तक जिस हार्वर्ड यूनिवर्सिटी को नंबर-1 का प्रतीक माना गया, वह अब उस स्थान पर नहीं रही. CWTS लीडेन रैंकिंग 2025 (साइंस कैटेगरी) में हार्वर्ड तीसरे पायदान पर फिसल गई है. इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि पहले और दूसरे स्थान पर चीन की यूनिवर्सिटीज ने कब्जा जमा लिया है, जो वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव का संकेत देता है.

इस साल की रैंकिंग में झेजियांग यूनिवर्सिटी पहले और शंघाई जिओ टोंग यूनिवर्सिटी दूसरे नंबर पर पहुंच गई है. टॉप-10 की सूची देखें तो हार्वर्ड को छोड़कर बाकी ज्यादातर स्थान चीनी संस्थानों के नाम हैं. यह सिर्फ एक रैंकिंग का आंकड़ा नहीं, बल्कि यह बताता है कि रिसर्च, साइंस और टेक्नोलॉजी में चीन ने कितनी तेजी से छलांग लगाई है. अमेरिका का लंबे समय से चला आ रहा दबदबा अब कमजोर पड़ता दिख रहा है.

CWTS Leiden Ranking क्या है?

CWTS लीडेन रैंकिंग को नीदरलैंड की लीडेन यूनिवर्सिटी का सेंटर फॉर साइंस एंड टेक्नोलॉजी स्टडीज तैयार करता है. इसमें 1,500 से अधिक यूनिवर्सिटीज की वैज्ञानिक रिसर्च परफॉर्मेंस को आंका जाता है. यह रैंकिंग पूरी तरह डेटा-आधारित होती है और Web of Science जैसे भरोसेमंद डेटाबेस पर टिकी रहती है. रिसर्च आउटपुट, क्वालिटी और इम्पैक्ट—तीनों को इसमें अहम माना जाता है, इसलिए इसे बेहद विश्वसनीय माना जाता है.

जब अमेरिका का था एकतरफा राज

2006 से 2009 के शुरुआती डेटा में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी नंबर-1 थी. उस दौर में टॉप-10 की सूची पर अमेरिका का लगभग पूरा कब्जा था. टोरंटो यूनिवर्सिटी और मिशिगन यूनिवर्सिटी जैसी संस्थाएं भी ऊंचे स्थानों पर थीं. यह वह समय था जब वैश्विक रिसर्च का केंद्र अमेरिका माना जाता था और बाकी देश उससे काफी पीछे नजर आते थे.

अब तस्वीर पूरी तरह बदली हुई क्यों है?

आज वही अमेरिकी यूनिवर्सिटीज टॉप-15 से भी बाहर हो चुकी हैं, जो कभी टॉप-10 की पहचान थीं. मिशिगन, UCLA, जॉन्स हॉपकिंस, वाशिंगटन यूनिवर्सिटी (सिएटल), पेंसिलवेनिया और स्टैनफोर्ड जैसे नाम इस बदलाव के गवाह हैं. इसका मतलब साफ है- रिसर्च फंडिंग, सरकारी समर्थन और रणनीतिक फोकस में अमेरिका पीछे रह गया है, जबकि चीन लगातार आगे बढ़ा है.

हार्वर्ड की गिरावट की शुरुआत कब हुई?

हार्वर्ड की रैंकिंग में गिरावट अचानक नहीं आई. 2019–2022 के दौरान पहली बार झेजियांग यूनिवर्सिटी ने उसे पीछे छोड़ा. 2020–2023 में हार्वर्ड तीसरे स्थान पर आ गई, जबकि इससे पहले वह एक दशक से ज्यादा समय तक शीर्ष पर बनी हुई थी. CWTS लीडेन रैंकिंग 2025 इस ट्रेंड को पुख्ता करती है कि बदलाव अब स्थायी हो चुका है.

चीन की सफलता के पीछे क्या है रणनीति?

चीन ने साइंस और टेक्नोलॉजी में भारी निवेश किया, रिसर्च फंडिंग बढ़ाई और इंटरनेशनल कोलैबोरेशन को प्राथमिकता दी. विश्वविद्यालयों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए सरकारी समर्थन भी मजबूत रहा. इसी रणनीतिक अप्रोच का नतीजा है कि आज ग्लोबल साइंस रैंकिंग में चीन का वर्चस्व साफ दिखाई दे रहा है.

भारत कहां खड़ा है इस रेस में?

भारत के लिए तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है. VIT (Vellore Institute of Technology) देश में सबसे ऊपर रहा है, जबकि IIT खड़गपुर, IIT दिल्ली, IIT बॉम्बे और IIT मद्रास ने भी अच्छी रैंकिंग हासिल की है. भले ही भारत अभी टॉप ग्लोबल पोजिशन से दूर हो, लेकिन रिसर्च बेस मजबूत हो रहा है. यह संकेत देता है कि सही निवेश और नीति से भारत भी भविष्य में इस दौड़ में बड़ी भूमिका निभा सकता है.

India Newsवर्ल्‍ड न्‍यूजकरियर
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