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EXCLUSIVE: Iran Protests के खूनी माहौल में इजराइल कर रहा अमेरिकी इशारे का इंतजार, भारत की खामोशी में ही छिपी है जीत!

ईरान में जारी हिंसक प्रदर्शनों के बीच अमेरिका और इजराइल की भूमिका पर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं. भारतीय वायुसेना के पूर्व एयर वाइस मार्शल अनिल तिवारी का कहना है कि अमेरिका खुद ईरान में सीधे उतरने से बचेगा और अपने हितों के लिए इजराइल का इस्तेमाल कर सकता है. उनका मानना है कि डोनाल्ड ट्रम्प की खामोशी रणनीतिक है. वहीं भारत की चुप्पी कमजोरी नहीं, बल्कि परिपक्व कूटनीति का संकेत है. मौजूदा हालात में भारत संतुलन बनाकर ही वैश्विक मंच पर अपनी जीत सुनिश्चित करेगा.

EXCLUSIVE: Iran Protests के खूनी माहौल में इजराइल कर रहा अमेरिकी इशारे का इंतजार, भारत की खामोशी में ही छिपी है जीत!
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संजीव चौहान
By: संजीव चौहान

Updated on: 13 Jan 2026 7:19 PM IST

करीब एक सप्ताह से जिस तरह अपनों के ही द्वारा ईरान को आग में झोंक डाला गया है. सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं. हजारों घायल हो चुके हैं. इसके बाद भी मगर अमेरिका और उसका घाघ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खामोश है. आखिर क्यों? ईरान के दो कट्टर दुश्मन अमेरिका और इजराइल कहीं खामोश रहकर भी तो ईरान की तबाही की इबारत नहीं लिख रहे हैं.

ईरान और इजराइल दोनो ही भारत के पक्के दोस्त हैं. अमेरिका से भारत की बीते साल से तनातनी चल रही है. फिर भी अमेरिका और भारत एक दूसरे से आमने-सामने आकर भिड़ने की हाल-फिलहाल दुनिया के मौजूदा हालातों में भिड़ने की तो कतई नहीं सोचेंगे. क्योंकि दोनो के ही एक दूसरे से अपने अपने लाभ जुड़े हैं. भले ही तल्खियों के बीच ही क्यों न सही.

जरूरी है अनिल तिवारी को जानना

यह तमाम बेबाक बातें स्टेट मिरर हिंदी के एडिटर इनवेस्टीगेशन से विशेष लंबी बातचीत में अनिल तिवारी ने बयान की हैं. नई दिल्ली में मौजूद अनिल तिवारी भारतीय वायुसेना के रिटायर्ड एअर वाइस मार्शल (Anil Tiwari Retired Air Vice Marshal, Indian Air Force) हैं. उन्होंने आगे कहा, “आज के बुरे माहौल में ईरान भले ही अपनों के ही हाथों क्यों न बर्बाद हो रहा हो. ईरान का कभी दोस्त रहा और आज के वक्त में कट्टर दुश्मन इजराइल भी अपनों के ही हाथों जलाये जा रहे ईरान को देखकर खामोश खड़ा है. ऐसे में सवाल यह पैदा होना लाजिमी है कि आखिर जब इजराइल-ईरान, भारत के दो दोस्त देश एक दूसरे को तबाह करने की जिद पर अड़े खड़े हों तो ऐसे में भारत की क्या भूमिका होगी?

खोखले अमेरिका की अंदरूनी हकीकत

स्टेट मिरर हिंदी से खास बातचीत में भारतीय वायुसेना के पूर्व एअर वाइस मार्शल अनिल तिवारी बोले, “दरअसल अमेरिका खुद को दुनिया का दादा बनाने के चक्कर में खुद भी बर्बाद हो रहा है. अमेरिका अंदर से खोखला हो चुका है. उसकी आर्थिक रुप से कमर टूटी पड़ी है. अमेरिका के पास खाने-कमाने और जिंदा रहने के लिए सिर्फ और सिर्फ हथियार बम गोला बारूद बेचने के सिवाए, आय का कोई और मजबूत स्थाई जरिया बाकी नहीं बचा है. रोजगार हो या फिर मजबूत सामाजिक व्यवस्था या फिर विदेश-कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का विषय. अमेरिका इन तमाम अहम मुद्दों पर चारो खाने चित हुआ पड़ा है.”

अमेरिका हर हद से गिर सकता है

ऐसे में अमेरिका के सामने अपनी हवा-हवाई ताकत को दुनिया की नजरों में दिखाने या बनाए रखने के लिए कुछ तो दुनिया को करके दिखाने की चुनौती हर वक्त बनी ही रहती है. तो वह (ट्रंप) कभी रात में महल में सोते हुए वेनेजुएला के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी का अपहरण करवा ले रहा है. कभी ईरान, इराक, अफगानिस्तान जैसे अपने कट्टर दुश्मन देशों में उन्हीं के लोगों से इन देशों के भीतर तिकड़म भिड़ाकर ईरान का सा अंदरूनी खून-खराबा करवा डालता है. दुनिया में खुद को दादा और सुपर पावर बनाए रखने के लिए धूर्त अमेरिका और उसके राष्ट्रपति किसी भी हद तक जाकर गिरने को तैयार हैं.


ट्रंप खुद ही आकर कूद पड़े

स्टेट मिरर हिंदी के एक सवाल के जवाब में अनिल तिवारी ने कहा, “दरअसल जो हालात ईरान के अंदर बने हुए हैं. उसके लिए ईरान में मौजूदा वहां की हुकूमत की कट्टरता-चरमपंथी विचारधारा तो जिम्मेदार है ही. अमेरिका और ट्रंप भी इस खून-खराबे के लिए अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार हैं. अमेरिका विशेषकर उसके मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कभी नहीं चाहेंगे कि उनका कोई दुश्मन देश या फिर कोई दुनिया का कोई भी शांति-प्रिय देश अमन-चैन से आगे बढ़ सके. यही वजह है कि पहलगाम आतंकवादी हमले के जवाब में भारत द्वारा ट्रेलर के बतौर पाकिस्तान के ऊपर शुरू किए गए ऑपरेशन सिंदूर में भी ट्रंप खुद ही आकर कूद पड़े.

ट्रंप से ज्यादा अमेरिकन जनता पर तरस आता है

यह कहते हुए कि उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता करके बड़ा युद्ध टलवा दिया था. इसके ऐवज में ट्रंप खुद ही दुनिया से शांति के लिए नोबल पुरस्कार भी मांगने लगे थे. अमेरिका जैसी महाशक्ति के प्रमुख के लिए यह कतई शोभा नहीं देता है. जिस तरह से किसी गली-कूंचे के आवारागर्द की तरह राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठे ट्रंप कर रहे हैं. ऐसे ट्रंप से शांति की उम्मीद करना बेईमानी है.

जिस भारत को लेकर कल तक ट्रंप साहब कसीदे गढ़ते थकते नहीं थे. जिद्दी ट्रंप जब अपनी बेबकूफी भरी हरकतों पर उतरे तो उन्होंने हमारे लोगों को हथकड़ी बेड़ियों में बांधकर स्वदेश भेजने में भी शर्म नहीं की. मुझे ट्रंप की ओछी हरकतों से ज्यादा हैरत होती है अमेरिका की उस जनता की छोटी सोच पर जिसने, ट्रंप जैसे तमाशबीन को दुबारा से देश का राष्ट्रपति चुन डाला.”

भारत फिर से त्रिशुंक में आ लटका है

जब दोस्त देश ईरान अपनों के ही द्वारा जलाया-फूंका जा रहा है. तब भारत चुप क्यों है? पूछने पर भारतीय वायुसेना के पूर्व एअर वाइस मार्शल अनिल तिवारी ने कहा, “ईरान-इजराइल और अमेरिका को लेकर भारत इस वक्त तिराहे पर खड़ा है. इस दौर में भारत की खामोशी उसकी कमजोरी नहीं अपितु विदेश, कूटनीति और सामरिक व सैन्य रक्षा नीति की परिपक्वता को सिद्ध करता है.

कमोबेश यूक्रेन-रूस के बीच अब से चार साल पहले जब जंग शुरू हुई थी तब भी भारत के सामने इसी तरह की समस्या खड़ी हुई थी कि भारत अपने दोस्त रूस के खिलाफ कैसे जाएगा? साथ ही लोकतंत्र और मानवता में विश्वास रखने वाला भारत यूक्रेन के ऊपर बरसाए जा रहे रूसी गोला-बारूद को रुकवाने को अगर नहीं बोलेगा तब भी भारत इंसानियत का विरोधी कहलाएगा. जमाने ने देखा कि कैसे उस विकट अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति में भी भारत ने खुद को कैसे संभाला. न तो भारत ने दोस्त रूस को नाराज किया न ही यूक्रेन के ऊपर हो रहे रूसी हमलों का समर्थन ही किया.”

भारत की चिंता छोड़िए...

जहां तक सवाल ईरान में मचे खूनी घमासान के दौर में भारत के खामोश रहने का सवाल है. तो भारत ईरान में हो रहे हर घटनाक्रम पर पैनी नजर रखे है. भारत, कभी भी अमेरिका पाकिस्तान चीन की तरह यह नहीं चाहेगा कि किसी भी देश में अस्थिरता पैदा हो. कोई देश अगर जल रहा है तो भारत अपने घर में बैठकर हंसे. देखते जाइए ईरान में उपजे विपरीत हालातों में हाल-फिलहाल खामोश दिखाई दे रहा भारत, रूस और यूक्रेन के बीच छिड़े युद्ध की तरह ही कोई न कोई ऐसा बड़ा और शांति के लिए सकारात्मक कदम उठा लेगा, जिससे फिर दुनिया भारत की लोकतांत्रिक सोच, विदेश और कूटनीति का लोहा मानेगी.

क्या ईरान को अपनों के द्वारा ही जलाए जाने की घटना में अमेरिका का हाथ है? स्टेट मिरर हिंदी के इस अहम सवाल के जवाब में भारतीय वायुसेना के पूर्व एअर वाइस मार्शल अनिल तिवारी बोले, “अमेरिका जब-जब घात या विश्वासघात करता है तब तब वह खामोश रहता है. मुझे लगता है कि अमेरिका दुनिया की नजरों में खामोश दिखाई पड़ रहा है. मगर ईरान के हालात इस कदर उनके अपनों को ही आपस में भिड़वा कर बदतर करवाने में ट्रंप और उनकी एजेंसियों का अप्रत्यक्ष रूप से हाथ जरूर होगा.

ईरान के खिलाफ अमेरिका करेगा इजराइल का इस्तेमाल!

हां, इतना जरूर है कि ईरान से सीधे भिड़ने के लिए अपनी फौज उतारने की गलती ट्रंप नहीं करेंगे. अगर अमेरिका को (ट्रंप) ईरान का अभी और ज्यादा नुकसान कराना ही होगा तो वह ईरान के जंग-ए-मैदान में खुद न उतरकर, उसके कट्टर दुश्मन यहूदी देश इजराइल और उसकी फौजों को उतारने में नहीं शरमाएगा. ट्रंप खुद की सेना लाव-लश्कर ईरान में भेजने की गलती कतई नहीं करेंगे. क्योंकि अमेरिका और उसके मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जानते हैं कि हाल-फिलहाल के बीते वर्षों में इराक, अफगानिस्तान, सन् 1812 उसके बाद के काल में यूनाइटेड किंगडम, मैक्सिको, स्पेनिश (स्पेन), जर्मनी, ऑस्ट्रिया, हंगरी, इटली, बुल्गारिया, रोमानिया जिस जिससे भी अमेरिका भिड़ा. वहां वहां अमेरिका को नफा कम और नुकसान ही ज्यादा उठाना पड़ा है.

हां, इस वक्त खुद ईरान में अपनी फौज उतारने की बजाए ईरान को बर्बाद करने के लिए ट्रंप इस वक्त इजराइल को ईरान से भिड़ाने की हर संभव कोशिश करने से नहीं चूकेंगे. अगर अमेरिका के इशारे पर इजराइल, ईरान से जंग लड़ने पहुंचता है तो यह भी तय है कि पीछे से पूरा सपोर्ट इजराइल को अमेरिका ही करेगा.”

स्टेट मिरर स्पेशलवर्ल्‍ड न्‍यूज
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