अफगानिस्तान–पाकिस्तान टकराव से क्या बदलने वाला है, भारत की क्यों है इस जंग पर पैनी नजर?
अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच हालात तेजी से बिगड़ते दिख रहे हैं, दोनों तरफ से सैन्य कार्रवाई के बाद तनाव चरम पर है. इस्लामाबाद ने 'ओपन वॉर' जैसी स्थिति का दावा किया है, जबकि काबुल ने जवाबी कदम उठाए हैं. ऐसे में क्षेत्रीय स्थिरता और अपने रणनीतिक हितों को लेकर भारत पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए है.
India-Pakistan War: अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच हालात तेजी से बिगड़ते दिख रहे हैं. पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में कथित 'आतंकी ठिकानों' पर हवाई हमले किए, जिसके बाद अफगानिस्तान की ओर से जवाबी कार्रवाई की गई. इसके बाद इस्लामाबाद ने यहां तक कह दिया कि दोनों देशों के बीच 'खुला युद्ध' जैसे हालात बन गए हैं. इस पूरे घटनाक्रम पर भारत करीबी नजर बनाए हुए है.
पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के रिश्ते बुरी तरह बिगड़े हैं. पाकिस्तान का आरोप है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) यानी पाकिस्तान तालिबान उसके देश में आतंकी हमले कर रहा है. इसी आधार पर पाकिस्तान कई बार टीटीपी के खिलाफ लक्षित हमले कर चुका है. इस्लामाबाद का यह भी कहना है कि बलोच विद्रोही भी अफगानिस्तान में शरण लेते हैं. दूसरी ओर, काबुल ने आमतौर पर इन आरोपों का जवाब “जरूरी और संतुलित सैन्य कार्रवाई” बताकर दिया है.
पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में किन जगहों को बनाया निशाना?
लेकिन इस बार स्थिति पहले से अलग रही. पाकिस्तान ने सिर्फ आतंकी ढांचे को निशाना बनाने का दावा नहीं किया, बल्कि काबुल और अन्य शहरों में अफगानिस्तान की सैन्य सुविधाओं को भी निशाना बनाया. इससे दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया है.
भारत और तालिबान के रिश्तों में क्या आया बदलाव?
इसी दौरान भारत और तालिबान के बीच संबंधों में भी बड़ा बदलाव आया है. शुरू में भारत ने बड़े पैमाने पर मानवीय सहायता देकर अफगानिस्तान की मदद की. इसके बाद भारत ने अफगान लोगों की विकास जरूरतों को पूरा करने की प्रतिबद्धता जताई, जबकि तालिबान सरकार को अभी अंतरराष्ट्रीय मान्यता पूरी तरह नहीं मिली है. पाकिस्तान-अफगानिस्तान संकट पर भारत की अब तक की प्रतिक्रिया इसी नई स्थिति को दर्शाती है, जिसे इस्लामाबाद को ध्यान में रखना होगा.
भारत लगातार यह कहता रहा है कि पाकिस्तान की सीमा पार की सैन्य कार्रवाई, जिसमें आम नागरिकों की जान जाती है, वह उसकी घरेलू नाकामियों से ध्यान हटाने की कोशिश है. भारत अफगानिस्तान की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और स्वतंत्रता का भी खुलकर समर्थन करता है.
तालिबान ने भी भारत के इन रुखों का जवाब पॉजीटिव तरीके से दिया है. पिछले साल अक्टूबर में अफगानिस्तान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी की भारत यात्रा के बाद जारी संयुक्त बयान में जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा बताया गया था. इस उल्लेख को तालिबान ने समर्थन दिया, जिससे पाकिस्तान असहज हो गया था.
पाकिस्तान-अफगानस्तान की जंग भारत पर क्यों है करीब से नजर?
हालांकि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनावपूर्ण रिश्ते से यह आशंका कम होती है कि पाकिस्तान अफगानिस्तान का इस्तेमाल 'रणनीतिक गहराई' के तौर पर करेगा, लेकिन अगर दोनों देशों के बीच बड़ा सैन्य संघर्ष छिड़ता है तो इससे पूरे क्षेत्र की स्थिरता खतरे में पड़ सकती है. यह स्थिति भारत के लिए भी अनुकूल नहीं होगी.
दरअसल, एक लंबे समय तक शांति रहने के बाद भारत अब अफगानिस्तान में विकास कार्य फिर से शुरू करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. ऐसे में क्षेत्रीय अस्थिरता भारत की योजनाओं पर असर डाल सकती है.
अहम बात यह है कि भारत तालिबान के उस प्रस्ताव पर विचार कर रहा है, जिसमें अफगानिस्तान के खनन क्षेत्र में निवेश की बात कही गई है. इस क्षेत्र में चीन पहले से सक्रिय है. इसके अलावा भारत अफगानिस्तान के साथ हाइड्रो इलेक्ट्रीसिटी प्रोजेक्ट पर भी काम करने की संभावनाएं देख रहा है.
भारत के लिए यह वह समय है जब वह तालिबान के साथ बने अपने मजबूत कामकाजी संबंधों का फायदा उठा सकता है. लेकिन अगर क्षेत्र में युद्ध छिड़ता है या उसके असर से मानवीय संकट या शरणार्थी समस्या पैदा होती है, तो इससे तालिबान शासित अफगानिस्तान में भारत की बढ़ती मौजूदगी पर रोक लग सकती है.




