जब 11 दिन बाद उत्तराखंड पहुंची भगवान राम के लौटने की खबर, तब मनाया गया इगास त्योहार, जानें क्यों कहलाई बूढ़ी दीवाली
उत्तराखंड के पहाड़ों में दीपावली के बाद भी एक खास त्योहार का इंतजार रहता है. यहां दिवाली के करीब 11 दिन बाद इगास मनाई जाती है. इसे इगास-बग्वाल और बूढ़ी दिवाली के नाम से भी जाना जाता है. इस दिन पहाड़ों में एक बार फिर घर रोशनी से जगमगा उठते हैं.
दीपावली के दिन पूरा देश भगवान राम के अयोध्या लौटने की खुशी में दीप जलाता है, लेकिन उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में यह जश्न 11 दिन बाद भी मनाया जाता है. कहा जाता है कि जब भगवान राम के वनवास खत्म करके लौटने की खबर पहाड़ों तक पहुंची, तब लोगों ने दीप जलाकर खुशियां मनाईं. इसी परंपरा को इगास या बूढ़ी दिवाली कहा जाने लगा.
इगास के पीछे एक दूसरी कहानी भी प्रचलित है. इसका संबंध गढ़वाल के वीर सेनापति माधव सिंह भंडारी की युद्ध में जीतकर वापसी से जोड़ा जाता है. इस दिन लोग भैलो जलाते हैं, लोकगीत गाते हैं और पारंपरिक पकवान बनाकर त्योहार का आनंद लेते हैं.
इस साल कब मनाई जाएगी इगास?
साल 2026 में इगास का पर्व 20 नवंबर, शुक्रवार को मनाया जाएगा. यह त्योहार कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी देवउठनी एकादशी के दिन पड़ता है. उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्रों में इसे खास उत्साह के साथ मनाया जाता है. हालांकि, इसकी परंपराएं और उत्सव का तरीका अलग-अलग इलाकों में थोड़ा बदल सकता है.
कब पहुंची पहाड़ों में राम जी के लौटने की खबर?
इगास मनाने के पीछे एक पौराणिक मान्यता भगवान राम से जुड़ी है. कहा जाता है कि जब भगवान राम 14 साल का वनवास पूरा करके अयोध्या लौटे, तो उनकी खुशी में पूरे देश में दीप जलाए गए. इसी खुशी में दीपावली मनाई गई. लेकिन उस समय पहाड़ों में न तो आज जैसी सड़कें थीं और न ही खबर पहुंचाने के साधन. ऐसे में भगवान राम के अयोध्या लौटने की सूचना उत्तराखंड के दूर-दराज के गांवों तक देर से पहुंची. मान्यता है कि जब यह खुशखबरी करीब 11 दिन बाद पहाड़ों में पहुंची, तब लोगों ने दीप जलाकर अपनी खुशी जाहिर की. तभी से यहां इगास मनाने की परंपरा शुरू हुई.
वीर माधव सिंह भंडारी की जीत का जश्न
इगास से जुड़ी एक दूसरी ऐतिहासिक मान्यता भी प्रचलित है. इसके मुताबिक, करीब 400 साल पहले गढ़वाल के वीर सेनापति माधव सिंह भंडारी अपनी सेना के साथ तिब्बत की ओर युद्ध करने गए थे. दीपावली तक उनके वापस नहीं लौटने पर गांव के लोग परेशान हो गए. उन्हें डर था कि कहीं सेनापति और उनके सैनिक युद्ध में शहीद तो नहीं हो गए. लेकिन दीपावली के कुछ दिन बाद जब माधव सिंह भंडारी जीत हासिल करके सुरक्षित लौटे, तो पूरे इलाके में खुशी छा गई. लोगों ने दीप जलाकर जश्न मनाया. इसी घटना को भी इगास की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है.
भैलो जलाकर कैसे मनाते हैं इगास?
इस त्योहार की सबसे खास परंपरा भैलो जलाना है. इसमें राल वाली लकड़ियों से मशाल जैसी रोशनी तैयार की जाती है. लोग इसे जलाकर घुमाते हैं और उत्सव मनाते हैं. इसके अलावा गांवों में झुमैलो जैसे लोकगीत गाए जाते हैं और लोकनृत्य होते हैं. घरों में अरसा, स्वाला और झंगोरे की खीर जैसे पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं.




