रामपुर की सियासत में नवाब फैमिली से 50 साल पुरानी रंजिश की कहानी! कैसे आजम खान के लिए खड़ी की नई चुनौती?
रामपुर में आजम खान और नवाब परिवार की 50 साल पुरानी रंजिश की कहानी. जौहर यूनिवर्सिटी विवाद और ईडी की कार्रवाई ने इस सियासी टकराव को फिर चर्चा में ला दिया है.
रामपुर की राजनीति में नवाब फैमिली और समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता आजम खान के बीच करीब पांच दशक पुरानी अदावत है. कभी रामपुर में नवाब फैमिली का दबदबा था, लेकिन आजम खान ने इसे चुनौती देकर अपनी राजनीतिक पहचान बनाई. उन्होंने नवाबों के विरोध को अपनी राजनीति का आधार बनाया और धीरे-धीरे रामपुर में मजबूत पकड़ बना ली. अब जौहर यूनिवर्सिटी की जमीन और ईडी की कार्रवाई ने इस पुरानी लड़ाई को फिर चर्चा में ला दिया है. नवाब परिवार की नई पीढ़ी भी आजम खान पर हमलावर है.
कैसे शुरू हुई आजम खान और नवाब फैमिली के बीच अदावत?
1974 से 1977 के बीच रजा टेक्सटाइल मिल की मजदूर हड़तालों के दौरान आजम खान छात्र नेता के रूप में उभरे. उन्होंने तत्कालीन नवाब जुल्फिकार अली खां उर्फ मिक्की मियां के राजनीतिक प्रभाव को चुनौती दी. 1980 में आजम खान ने रामपुर सदर सीट से विधानसभा चुनाव जीता. दूसरी तरफ मिक्की मियां कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीतते रहे. यहीं से रामपुर की राजनीति में नवाब परिवार और आजम खान के बीच मुकाबला शुरू हुआ.
कैसे आजम खान रामपुर के सियासी नवाब बन गए?
1990 के दशक में मुलायम सिंह यादव के साथ आजम खान के राजनीतिक संबंध मजबूत हुए. उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री बनने के बाद उनका प्रभाव बढ़ा. बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद उन्होंने मुस्लिम राजनीति में भी अपनी पहचान बनाई. 1996 में मिक्की मियां के निधन के बाद उनकी पत्नी नूरबानो ने कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीतकर नवाब परिवार की राजनीतिक विरासत संभाली. बाद में काजिम अली खान उर्फ नवेद मियां भी सक्रिय हुए. इस तरह रामपुर में दोनों फैमिली के बीच राजनीतिक मुकाबला जारी रहा.
जौहर यूनिवर्सिटी की स्थापना कैसे बनी विवाद की वजह?
2006 में आजम खान ने मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की नींव रखी. इसका संचालन मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट करता है. लेकिन समय के साथ विश्वविद्यालय की जमीन को लेकर विवाद शुरू हो गया. आरोप लगे कि इसके निर्माण के लिए किसानों की जमीन जबरन ली गई और सरकारी धन व निर्माण सामग्री का इस्तेमाल किया गया. ईडी ने 28 अक्टूबर 2026 को यूनिवर्सिटी की जमीन और इमारतों को अस्थायी रूप से कुर्क किया. इनकी बाजार कीमत करीब 1,170 करोड़ रुपये बताई गई है. हालांकि, इन आरोपों पर अंतिम फैसला अदालत को करना है.
क्या नवाबी विरासत को लेकर आमने-सामने आए आजम और नवाब?
2012 से 2017 के बीच अखिलेश यादव सरकार में नगर विकास मंत्री रहते हुए आजम खान ने रामपुर के कई पुराने शाही द्वारों को जर्जर बताकर हटवाया था. नवेद मियां ने आरोप लगाया कि इससे नवाबी दौर की ऐतिहासिक विरासत को नुकसान पहुंचा. रामपुर के किले की दीवारों और पुराने शाही निर्माणों को लेकर भी विवाद हुआ. नवाब परिवार ने इन मामलों में कानूनी रास्ता अपनाया. इससे दोनों पक्षों के बीच पहले से चला आ रहा टकराव और बढ़ा.
आजम खान पर मुकदमों की झड़ी कैसे लगी?
2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद आजम खान के खिलाफ कई शिकायतें और मुकदमे दर्ज हुए. इनमें किसानों की जमीन पर कब्जे, शत्रु संपत्ति, जौहर यूनिवर्सिटी में चोरी की किताबें और बेटे अब्दुल्ला आजम के जन्म प्रमाण पत्र व पैन कार्ड से जुड़े मामले शामिल थे. फरवरी 2020 में आजम खान, उनकी पत्नी तंजीन फात्मा और बेटे अब्दुल्ला आजम ने अदालत में आत्मसमर्पण किया और जेल चले गए.
सजा और विधायकी जाने से कैसे बदली रामपुर की राजनीति?
2022 में जेल में रहते हुए आजम खान ने रामपुर से दसवीं बार विधानसभा चुनाव जीता. हालांकि, नफरती भाषण मामले में तीन साल की सजा के बाद उनकी विधायकी चली गई. 2023 में दोहरे पैन कार्ड मामले में आजम खान और अब्दुल्ला आजम को सात-सात साल की सजा सुनाई गई. इसके बाद अब्दुल्ला आजम की विधायकी भी चली गई. इन फैसलों का असर रामपुर की राजनीति पर पड़ा और नवाब परिवार को आजम खान पर हमला करने का नया आधार मिला.
जमानत के बाद ईडी की गिरफ्तारी ने क्यों बढ़ाई मुश्किलें?
29 अक्टूबर 2026 को दो पैन कार्ड मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद आजम खान 31 अक्टूबर को रामपुर जेल से बाहर आए. लेकिन कुछ ही देर बाद ईडी ने जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े धनशोधन मामले में उन्हें गिरफ्तार कर लिया. 1 नवंबर को गाजियाबाद की विशेष अदालत ने उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया. ईडी ने यूनिवर्सिटी की जमीन और इमारतों को भी कुर्क किया है. आजम खान ने अपनी गिरफ्तारी को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.
क्या नवाब परिवार को फिर मिल रहा है राजनीतिक मौका?
आजम खान और नवाब परिवार की अदावत अब नई पीढ़ी तक पहुंच गई है. नवाब परिवार के हमजा मियां जैसे सदस्य भी आजम खान पर हमलावर हैं. दूसरी तरफ कानूनी मामलों और सजाओं के चलते आजम खान के परिवार की चुनावी राजनीति प्रभावित हुई है. ऐसे में रामपुर में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का स्वरूप बदल रहा है. सवाल यह है कि क्या नवाब परिवार की नई पीढ़ी इस बदले हुए राजनीतिक माहौल में अपनी पकड़ मजबूत कर पाएगी?
नवाब परिवार और आजम खान की अदावत: टाइमलाइन
1974–1977: रजा टेक्सटाइल मिल की मजदूर हड़तालों के दौरान छात्र नेता आजम खान उभरे और मिक्की मियां के राजनीतिक प्रभाव को चुनौती दी.
1980: आजम खान ने रामपुर सदर विधानसभा सीट से पहली बार चुनाव जीता और नवाब परिवार के सामने नया राजनीतिक नेतृत्व खड़ा किया.
1990 का दशक: मुलायम सिंह यादव की सरकार में मंत्री बनने के बाद आजम खान का राजनीतिक प्रभाव बढ़ा और उन्हें सियासी नवाब कहा जाने लगा.
1996: मिक्की मियां के निधन के बाद नूरबानो ने कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीतकर नवाब परिवार की राजनीतिक विरासत संभाली.
2006: आजम खान ने मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की नींव रखी, जो आगे चलकर जमीन विवादों का केंद्र बनी.
2012–2017: रामपुर के पुराने शाही द्वार हटाए जाने पर नवेद मियां ने आजम खान पर ऐतिहासिक धरोहरों को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगाए.
2017: भाजपा सरकार बनने के बाद किसानों और अन्य शिकायतों के आधार पर आजम खान के खिलाफ कई मामलों में कार्रवाई शुरू हुई.
2019: जमीन, शत्रु संपत्ति, चोरी की किताबों और अब्दुल्ला आजम के दस्तावेजों से जुड़े कई मुकदमे दर्ज हुए.
फरवरी 2020: आजम खान, उनकी पत्नी तंजीन फात्मा और बेटे अब्दुल्ला आजम ने अदालत में आत्मसमर्पण किया और जेल गए.
2022: जेल में रहते हुए आजम खान ने दसवीं बार विधानसभा चुनाव जीता, लेकिन नफरती भाषण मामले में सजा के बाद विधायकी गंवा दी.
2023: दोहरे पैन कार्ड मामले में आजम खान और अब्दुल्ला आजम को सात-सात साल की सजा सुनाई गई.
2025–2026: ईडी ने जौहर यूनिवर्सिटी की करीब 1,170 करोड़ रुपये की संपत्तियां धनशोधन जांच के तहत कुर्क कीं.
31 अक्टूबर 2026: जेल से बाहर आने के कुछ देर बाद आजम खान को ईडी ने जौहर ट्रस्ट से जुड़े मामले में गिरफ्तार कर लिया.




