Exclusive: खाकी Vs काला कोट- 'नाक की लड़ाई' में कानून क्यों बन रहा तमाशा? 38 साल पुराना विवाद कड़कड़डूमा तक पहुंचा
दिल्ली पुलिस और वकीलों के टकराव पर पूर्व DCP एलएन राव ने ACP के प्रदर्शन को गलत बताया. जानिए 1988 से चली आ रही खाकी-काले कोट की लड़ाई की पूरी कहानी.
जब रखवाला ही बाड़ चरने लगे तो फिर फसल और खेत की रखवाली का गारंटी भला किससे ली जा सकती है. देश में खाकी वर्दी यानी पुलिस और काला कोट यानी कानून के माई-बाप वकील ही जब ‘मूंछ’ की लड़ाई में एक दूसरे की ‘नाक’ काटने की जिद पर उतर आएं तो, सवाल यह पैदा होना लाजिमी है कि कानून की रखवाली कैसे और किसके हवाले की जाए?
याद करो जनवरी 1988 यानी अब से करीब 38 साल पहले उत्तरी दिल्ली जिला पुलिस और दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट में ‘काले-कोट’ वालों के बीच ‘नाक-मूंछ-अहम’ की लड़ाई में हो चुकी जूतम-पैजार की. जिसके बदनुमा द़ाग वकीलों के कोट और दिल्ली पुलिस की खाकी वर्दी पर आज पड़े हुए दिखाई दे जाते हैं.
उस शर्मनाक कहिए या फिर ‘काले-कांड’ के बाद साल 2019 के अंतिम महीनों में तीस हजारी कोर्ट में पार्किंग विवाद को लेकर हुई बे-सिर-पैर की ‘फौजदारी’ में दोनो पक्षों ने न मालूम कितने वकीलों और पुलिस वालों के हाथ-पैर-सिर तोड़-फोड़ डाले. वकीलों से पिटे पुलिस वालों ने उस वक्त भी गुस्से में आकर अपने ही तत्कालीन पुलिस आयुक्त आईपीएस अमूल्य पटनायक को आईटीओ स्थित दिल्ली पुलिस मुख्यालय के अंदर कथित रुप से बंधक बना डाला था. मतलब पुलिस के खिलाफ तब पुलिस ही उतर आई थी धरना-प्रदर्शन करके अपने ही अफसरों के खिलाफ इस सवाल पर कि आखिर, दिल्ली पुलिस ने उस शर्मनाक तीस हजारी खूनी कांड में वकीलों के खिलाफ सख्त एक्शन क्यों नहीं लिया?
38 साल पहले तीस हजारी काला-कांड
जनवरी 1988 और नवंबर 2019 दिल्ली में खाकी बनाम काला कोट के काले कारनामों के द़ाग अभी धुल भी नहीं पाए थे कि अब 6-7 साल के भीतर ही तीसरा शर्मनाक कांड मुंह बाए हुए सामने खड़ा है. शाहदरा (कड़कड़डूमा कोर्ट) के वकीलों और पुलिस के बीच सर-ए-आम जूतम-पैजार का. इस बेतुकी बे-सिर-पैर और अंधे अहम की लड़ाई किसके फायदे की और किसके नुकसान की साबित होगी, यह सवाल बाद का है. पहला सवाल तो यह है कि आखिर पुलिस और वकील जब दोनो ही कानून के रखवाले हैं तो फिर इनके बीच ‘अहम की लड़ाई’ ही क्यों?
आग में घी का काम पुलिस ने किया!
दिल्ली पुलिस के आला-अफसरान ने अपनी-अपनी खाल बचाने की बदनियती से आनन-फानन में वकीलों की डिमांड पर सहायक पुलिस आयुक्त मनस्वी वशिष्ठ और एसएचओ इंस्पेक्टर अरुण कुमार को ट्रांसफर कर दिया. आग में घी का सा काम तब हुआ जब महकमे के इस कदम से खार खाए एसीपी मनस्वी वशिष्ठ अपने समर्थकों की भीड़ के साथ दिल्ली पुलिस मुख्यालय के बाहर धरना और प्रचंड विरोध प्रदर्शन के लिए जा डटे. लिहाजा पहले से ही वकीलों के काले कोट की परछाई से खौफजदा दिल्ली पुलिस मुख्यालय ने आनन-फानन में अपने ही एसीपी मनस्वी वशिष्ठ को ‘सस्पेंड’ करके एक बार फिर अपनी खाल सुरक्षित कर निकलने का दांव चल डाला.
दिल्ली पुलिस आहत तो हुई होगी मगर....
दिल्ली पुलिस और हिंदुस्तानी हुकूमत के इस दांव ने भले ही दिल्ली के वकीलों के एक धड़े को खुश करके हाल-फिलहाल क्यों न साध लिया हो, लेकिन एसीपी के सस्पेंशन ने कहीं न कहीं दिल्ली पुलिस कर्मियों को ‘आहत’ भी जरूर किया है. इस बारे में ‘स्टेट मिरर हिंदी’ ने एक्सक्लूसिव बात की सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया और दिल्ली हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील व दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के रिटायर्ड डीसीपी एल एन राव से. उन्होंने कहा, “झगड़े में पुलिस और वकील दोनो ही पक्ष शामिल हैं. दोनो ही कानून का पालन करने और कराने का संवैधानिक ह़क रखते हैं. जो हुआ या हो रहा है इस प्रकरण में वह किसी एक पक्ष या व्यक्ति के लिए नहीं, दोनो ही पक्षों के लिए हित में नहीं है.”
मैं वकील-पूर्व पुलिस अफसर दोनो हूं
जहां तक सवाल दिल्ली पुलिस या केंद्र सरकार द्वारा इस मामले में गांधी नगर सब-डिवीजन के सहायक पुलिस आयुक्त मनस्वी वशिष्ठ को सस्पेंड करने का है तो, दिल्ली पुलिस का पूर्व पुलिस अफसर (न कि वकील) होने के नाते मैं कहूंगा कि महकमे ने सही कदम उठाया है. एसीपी या इंस्पेक्टर को अगर वकीलों से कोई आपत्ति थी वह अपनी बात जिला डीसीपी, रेंज के ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर और फिर पुलिस मुख्यालय तक लेकर जाते. पुलिस महकमे का अनुशासनात्मक फोर्स होने के नाते एसीपी के पास यही कानूनी विकल्प थे. न कि यह विकल्प कि आप किसी विभागीय परेशानी को ‘निजी-मुद्दा’ बनाकर दल-बल और कुछ समर्थक पुलिस वालों के साथ अपने ही पुलिस मुख्यालय के बाहर जाकर आमजन की मानिंद ‘धरना-प्रदर्शन’ शुरु कर दीजिए.
किसी पुलिसिया किताब में नहीं लिखा
देश की किसी भी पुलिस की किसी भी किताब में यह कहीं नहीं लिखा है कि एक अनुशासन वाली पुलिस-फोर्स का कोई अफसर या कर्मचारी सीधा अपनी परेशानी के समाधान के लिए अपने ही महकमे के मुख्यालय के बाहर नेता-मंत्री या जनता जनार्दन की मानिंद डेरा डालकर उसका घेराव कर डाले. पुलिस का काम कानून व्यवस्था बनाए रखना है. न कि धरना-प्रदर्शन करना.
ACP को यह करने की क्या जरूरत थी...
स्टेट मिरर हिंदी के एक सवाल के जवाब में दिल्ली पुलिस 1970 के दशक में थानेदार से नौकरी शुरु करके 38-39 साल बाद डीसीपी स्पेशल सेल से रिटायर होकर अब सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट के नामदार वकीलों में शुमार एल एन राव ने कहा, “मुझे इस विषय में बात करने में भी शर्मिंदगी हो रही है. इसलिए कि मेरी तकरीबन 70 साल की उम्र का अधिकांश हिस्सा यानी 38-39 साल दिल्ली पुलिस यानी खाकी वर्दी की नौकरी करते और बाकी सन् 2014-2015 से सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट और दिल्ली की तमाम बाकी अदालतों में वकालत करते ही गुजर रही है.
मैं तो पुलिस और वकील दोनो के सुख-दुख का चश्मदीद हूं. हाल-फिलहाल जिस मुद्दे पर दिल्ली पुलिस और वकील आमने-सामने हैं, वह मेरी नजर में इतना बड़ा सब्जेक्ट है ही नहीं कि जो दिल्ली पुलिस के एसीपी को अपने दल-बल और समर्थकों के साथ अपने ही पुलिस मुख्यालय का घेराव करना पड़ जाए. हां, अगर उन्होंने (एसीपी मनस्वी वशिष्ठ) ने अगर ऐसा किया है तो यह उनकी नजर में जायज होगा, मगर हिंदुस्तानी हुकूमत, पुलिस महकमे की रूल-बुक और दिल्ली पुलिस के कायदे-कानून के एकदम खिलाफ है. बेशक एसीपी और इंस्पेक्टर एसएचओ को वकीलों के व्यवहार से फौरी तौर पर परेशानी हुई होगी मैं इससे इनकार नहीं करता हूं. इसका मतलब पुलिस फोर्स की नौकरी में यह नहीं होता है कि आप जाकर अपनी डिमांड या समस्या के समाधान के लिए सीधे पुलिस मुख्यालय खुद ही घेरकर बैठ जाइए. फिर तो छुट्टा घूम रहे आमजन, नेता मंत्री और कानून व अनुशासन से बंधी पुलिस फोर्स के बीच फर्क ही क्या बचा?”
बे-सिर पैर की मूंछ की इस बेतुकी लड़ाई में आपके हिसाब से कौन सही कौन गलत है? पूछने पर पूर्व डीसीपी और मौजूदा सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील एल एन राव ने कहा, “यह जांच का विषय है. इस पर अभी कुछ बोलना जल्दबाजी होगी. मैं चूंकि बीते कल में दिल्ली पुलिस का कारिंदा और अफसर रहा हूं तो आज मौजूदा वक्त में वकील हूं. इसलिए मुझे अपनी नजर से दोनो ही पक्ष सही नहीं लग रहे हैं और दोनो ही अपनी अपनी जगह सही हो भी सकते हैं. मैं मानता हूं कि पुलिस को विशेषाधिकार है कि वह थाने से अपने स्तर से कानून के दायरे में रहते हुए कुछ मामलों में आरोपी को जमानत दे सकती है. सो इस घटनाक्रम की जड़ में मौजूद एफआईआर में भी पुलिस ने अपने विशेषाधिकार का उपयोग करते हुए किया.
मैं इसके एकदम खिलाफ हूं...
अब यही पुलिस का कदम अगर वकीलों के एक धड़े को अखर गया या न-गवार गुजर गया तो यह वकीलों को भी सोचना होगा कि वे कितना सही और कितना गलत हैं. हां, पुलिस की जहां तक बात है तो मैं इसका कतई समर्थक नहीं हूं कि अगर वकीलों से कोई मन-मुटाव पुलिस का हुआ तो पुलिस वाले सीधे अपने ही पुलिस मुख्यालय को जा घेरें. एसीपी के समर्थकों में तो दिल्ली पुलिस के एक थानेदार के यह कहते हुए भी वीडियो वायरल हो रहे हैं कि अगर उनके किसी वकील ने हाथ लगाया तो वे पूरी एके-47 राइफल की खाली कर डालेंगे वकीलों के ऊपर. यह कहां की पुलिसिंग है. और किस किताब में लिखा है कि कोई पुलिस वाला किसी गुंडे मवाली की मानिंद इस तरह वकील हो या फिर कोई और आमजन ही क्यों न हो, उसके बदन में एके-47 की सब गोलियां उतार डालने की खुलेआम बात कहे.
वकील हो सकते हैं गलत मगर पुलिस ने...
ऐसे में तो मैं कहूं कि पुलिस ने अपना पक्ष खुद ही कमजोर कर लिया है. मैं यह नहीं कहता हूं कि दोनो ही पक्ष दूध के धुले हैं. गलती सिर्फ पुलिस की ही होगी या सिर्फ वकील ही गलत हैं. सवाल यह है कि जनता और कायदा-कानून तो वही देखेगा न जो मीडिया में वायरल हो रहा है. इस समय वकील उतना ज्यादा नकारात्मकता के साथ वायरल नहीं हो रहे इस मामले में जितना की अपने ही पुलिस मुख्यालय को घेरने जा पहुंचे एसीपी साहब और उनके समर्थक दिल्ली पुलिस की मिट्टी पलीद करवा कर पुलिस वालों का ही पक्ष मजबूत करने की बजाए कमजोर करने में जुटे हैं. इस वक्त कहूं तो एसीपी और उनके कुछ समर्थकों ने यह घातक कदम उठाकर अपने पांव पर न केवल कुल्हाड़ी मार ली है अपितु खुद को “भस्मासुर” वाली स्थिति में भी ला खड़ा किया है.
मूंछ की लड़ाई में न इज्जत बचेगी न ‘नाक’
अब अगर इस लड़ाई के शुरुआती दौर में वकील गलत रहे भी होंगे तो भी वे पुलिस वालों के इस कमजोर कदम को अपनी ‘मजबूती-ताकत’ बनाकर इसका जायज-नाजायज फायदा उठाएंगे. मुझे तो लगता है कि मूंछ-अहम की इस बेतुकी बेसिर-पैर की लड़ाई में ऐसा न हो कि किसी की ‘नाक’ बचे ही न. क्योंकि पुलिस और वकील दोनो ही कानून के रखवाले हैं और अपने अहम को हवा देकर आग को भड़का कर दोनो ही कानून का मखौल उड़वाने वालों के रुप में जन-मानस की नजर में न चढ़ जाएं.




