योगी का समर्थन तो है बहाना, विधायक की कुर्सी पर निशाना - अयोध्या के जीएसटी कमिश्नर तो खिलाड़ी निकले
अयोध्या के डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह ने इस्तीफा दे दिया है, अब खुलासा हुआ है कि उन्होंने विधायक बनने की चाह में इस्तीफा दिया और फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र के आधार पर उन्होंने नौकरी ज्वाइन की थी.
कभी-कभी असली कहानी फाइलों में नहीं, सुर्खियों के बीच छिपी होती है. जिस अफसर को लोग कानून का रखवाला, सिस्टम का मजबूत पहिया और ईमानदारी की मिसाल समझ रहे थे, वही अचानक राजनीति, भावनाओं और आरोपों के भंवर में फंसता नजर आया. सीएम योगी के समर्थन में दिया गया इस्तीफा जब सामने आया, तो ऐसा लगा मानो कोई अफसर अपने आत्मसम्मान के लिए कुर्सी ठुकरा रहा हो. लेकिन वक्त के साथ यह साफ होने लगा कि यह फैसला सिर्फ भावनाओं का नहीं, बल्कि किसी बड़ी स्क्रिप्ट का हिस्सा भी हो सकता है.
अब सवाल यह नहीं है कि प्रशांत कुमार सिंह ने इस्तीफा क्यों दिया, बल्कि यह है कि उन्होंने कब और किस मकसद से अपनी चालें चलीं. विधायक बनने की ख्वाहिश, अफसरशाही की ताकत, योगी का नाम लेकर बनाई गई छवि और फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र के गंभीर आरोप इन सबने मिलकर एक ऐसी कहानी गढ़ दी है, जिसमें हीरो और विलेन की रेखा धुंधली हो चुकी है. यह कहानी अब कुर्सी की चाह से आगे बढ़कर जेल की आशंका तक पहुंच चुकी है.
योगी समर्थक अफसर से रातों-रात चर्चित चेहरा
अयोध्या के डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह ने जब सीएम योगी आदित्यनाथ के समर्थन में इस्तीफा दिया, तो प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई. उन्होंने शंकराचार्य की टिप्पणी को मुख्यमंत्री का अपमान बताते हुए इसे समाज को तोड़ने वाला करार दिया. उनका कहना था कि जिस प्रदेश की सरकार से वेतन मिलता है, उसी सरकार के मुखिया का सार्वजनिक अपमान बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. इस बयान ने उन्हें एक साहसी और विचारधारात्मक अफसर की छवि दे दी, जिसे सोशल मीडिया पर जमकर सराहा गया.
इस्तीफे के पीछे छिपा दूसरा चेहरा
लेकिन इस्तीफे की चमक के पीछे धीरे-धीरे स्याह परछाइयां उभरने लगीं. जिस फैसले को आत्मसम्मान से जोड़ा जा रहा था, उस पर अब सवाल उठने लगे कि क्या यह कदम वाकई वैचारिक था या किसी आने वाले संकट से बचने की तैयारी? क्योंकि इस्तीफे के तुरंत बाद ही फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र का मामला फिर से सुर्खियों में आ गया. यहीं से कहानी ने अचानक यू-टर्न ले लिया.
विधायक बनने की अधूरी चाह
दरअसल प्रशांत कुमार सिंह की राजनीतिक महत्वाकांक्षा नई नहीं थी. साल 2022 में, जब वे जीएसटी विभाग में असिस्टेंट कमिश्नर थे, तब उन्होंने मऊ जिले से बीजेपी के टिकट की दावेदारी की थी. स्थानीय स्तर पर पोस्टर-बैनर लगाए गए, समर्थकों के जरिए माहौल बनाया गया और खुद को एक मजबूत दावेदार के तौर पर पेश किया गया. लेकिन टिकट नहीं मिला. दिलचस्प बात यह रही कि उस वक्त न तो उन्होंने इस्तीफा दिया और न ही किसी तरह का विरोध किया० .वे चुपचाप सिस्टम के भीतर बने रहे.
टिकट नहीं मिला, तो कुर्सी नहीं छोड़ी
टिकट की निराशा के बावजूद प्रशांत कुमार सिंह ने अफसरशाही का रास्ता नहीं छोड़ा. वे अपनी नौकरी में बने रहे, प्रमोशन मिला और धीरे-धीरे ऊंचे पद तक पहुंच गए. सहारनपुर और कानपुर जैसी जगहों पर तैनाती के बाद 21 अक्टूबर 2023 को उनकी पोस्टिंग अयोध्या में डिप्टी कमिश्नर के पद पर हुई. बाहर से देखने पर यह एक सफल अफसर की कहानी लगती थी, लेकिन अंदर ही अंदर विवाद की नींव रखी जा चुकी थी.
भाई ने खोली पोल
इस्तीफे के बाद सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब उनके सगे बड़े भाई डॉ. विश्वजीत सिंह सामने आए. उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशांत कुमार सिंह ने फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र के जरिए सरकारी नौकरी हासिल की. यह कोई अचानक लगाया गया आरोप नहीं था. डॉ. विश्वजीत सिंह ने 2021 में ही इसकी शिकायत दर्ज कराई थी और प्रमाण पत्र की दोबारा जांच की मांग की थी. जब आरोप भाई की ओर से आए, तो मामला और भी गंभीर हो गया.
मेडिकल बोर्ड से दूरी और बढ़ता शक
20 अगस्त 2021 को मंडलीय चिकित्सा परिषद ने प्रशांत कुमार सिंह को मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होने के लिए बुलाया था. लेकिन वे दो बार बुलाए जाने के बावजूद उपस्थित नहीं हुए. यही वह बिंदु था, जहां शक और गहरा गया. डॉ. विश्वजीत सिंह का दावा है कि जिस आंख की बीमारी के आधार पर दिव्यांग प्रमाण पत्र बनवाया गया, वह बीमारी 50 साल से कम उम्र में बेहद दुर्लभ है. अब इस मामले में CMO मऊ ने जांच शुरू कर दी है.
क्या इस्तीफा था बचाव की ढाल?
डॉ. विश्वजीत सिंह ने यह भी आरोप लगाया कि इस्तीफा देना सिर्फ एक रणनीति थी, ताकि जांच और संभावित रिकवरी से बचा जा सके. उनका कहना है कि अगर इस्तीफा मंजूर हो जाता, तो प्रशांत कुमार सिंह खुद को एक ‘पीड़ित’ के रूप में पेश कर सकते थे. यही वजह है कि अब योगी समर्थन वाला इस्तीफा भी संदेह के घेरे में आ गया है.
खेल गए फैमिली कार्ड
इस्तीफे के बाद पत्नी से फोन पर बातचीत में प्रशांत कुमार सिंह ने खुद को बेहद भावुक बताया. उन्होंने कहा कि दो रातों से सो नहीं पाए, दो छोटी बेटियां हैं और आत्मसम्मान से समझौता नहीं कर सकते. उन्होंने यह भी कहा कि इस्तीफा मंजूर होने तक वे अपने दायित्व निभाते रहेंगे. लेकिन अब जब गंभीर आरोप सामने हैं, तो ये भावनात्मक बयान भी लोगों को रणनीति का हिस्सा लगने लगे हैं.
अब फैसला जांच करेगी
आज प्रशांत कुमार सिंह की कहानी सिर्फ एक अफसर के इस्तीफे की नहीं रह गई है. यह कहानी है सत्ता की चाह, राजनीति की महत्वाकांक्षा और सिस्टम की कमजोरियों की. अगर फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र के आरोप साबित होते हैं, तो विधायक बनने का सपना तो टूटेगा ही, अफसर की कुर्सी भी जेल की चारदीवारी में बदल सकती है. अब सबकी निगाहें जांच पर टिकी हैं, क्योंकि यही तय करेगी कि यह कहानी किस मोड़ पर खत्म होगी.





