गोबर-गोमूत्र से कैंसर के इलाज का दावा, करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद खुल गई पोल; जांच शुरू
गाय के गोबर, गोमूत्र और दूध से तैयार पंचगव्य के जरिए कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज का दावा करने वाला एक सरकारी शोध प्रोजेक्ट अब बड़े विवाद में घिर गया है. जबलपुर स्थित नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय में संचालित यह परियोजना कथित वित्तीय अनियमितताओं, बजट से बाहर खर्च और संदिग्ध यात्राओं को लेकर जांच के घेरे में आ गई है.
गाय के गोबर, गोमूत्र और दूध से तैयार पंचगव्य के जरिए कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज का दावा करने वाला एक सरकारी शोध प्रोजेक्ट अब बड़े विवाद में घिर गया है. जबलपुर स्थित नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय में संचालित यह परियोजना कथित वित्तीय अनियमितताओं, बजट से बाहर खर्च और संदिग्ध यात्राओं को लेकर जांच के घेरे में आ गई है.
जिला प्रशासन को मिली शिकायत के बाद शुरू हुई जांच में कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जिन्होंने इस बहुचर्चित परियोजना की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं. अतिरिक्त कलेक्टर की अध्यक्षता वाली जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है, जिसमें करोड़ों रुपये के खर्च को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज की गई हैं.
2011 में शुरू हुआ था पंचगव्य प्रोजेक्ट
यह प्रोजेक्ट साल 2011 में लगभग 8 करोड़ रुपये के प्रस्ताव के साथ शुरू किया गया था, हालांकि सरकार ने इसमें केवल 3.5 करोड़ रुपये की ही मंजूरी दी थी. जिसका उद्देश्य था पंचगव्य के माध्यम से गंभीर बीमारियों, खासकर कैंसर के इलाज पर शोध करना. लेकिन जांच रिपोर्ट में सामने आया है कि परियोजना के क्रियान्वयन में वित्तीय अनुशासन का पालन नहीं किया गया.
जांच के आदेश और समिति की रिपोर्ट
शिकायत मिलने के बाद संभागायुक्त ने कलेक्टर को जांच के निर्देश दिए. इसके बाद कलेक्टर ने अतिरिक्त कलेक्टर की अध्यक्षता में जांच समिति गठित की. समिति ने अब अपनी रिपोर्ट सौंप दी है, जिसमें स्वीकृत बजट से बाहर जाकर और बाजार दरों से कहीं अधिक खर्च किए जाने की ओर इशारा किया गया है.
गोबर-गोमूत्र पर करोड़ों का खर्च
जांच रिपोर्ट के मुताबिक 2011 से 2018 के बीच परियोजना के खर्च में कई गंभीर अनियमितताएं सामने आईं. लगभग 1.92 करोड़ रुपये गोबर, गोमूत्र, बर्तन, कच्चा माल और मशीनों पर खर्च दिखाया गया, जबकि इन वस्तुओं की बाजार कीमत कथित तौर पर केवल 15 से 20 लाख रुपये आंकी गई है. रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि शोध के नाम पर गोवा और बेंगलुरु सहित कई शहरों की 23-24 हवाई यात्राएं की गईं. जांच में कहा गया है कि विश्वविद्यालय की टीम ने पंचगव्य परियोजना की आड़ में गोवा की यात्रा की, जिससे खर्च की नीयत पर सवाल उठते हैं.
बिना मंजूरी के खरीदी गई कार
जांच में सामने आया कि लगभग 7.5 लाख रुपये की कार खरीदी गई, जबकि यह खर्च मूल स्वीकृत अनुमान का हिस्सा नहीं था. इसके अलावा ईंधन और रखरखाव पर 7.5 लाख रुपये से अधिक, मजदूरी भुगतान के नाम पर 3.5 लाख रुपये, मेज-कुर्सी और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर करीब 15 लाख रुपये खर्च दिखाया गया.
एक दशक बाद भी कोई ठोस नतीजा नहीं
जांच रिपोर्ट का सबसे अहम निष्कर्ष यह है कि लगभग 10 साल तक चले इस प्रोजेक्ट के बावजूद पंचगव्य के जरिए कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का कोई प्रभावी इलाज विकसित नहीं किया जा सका. यह तथ्य परियोजना की उपयोगिता और खर्च की वैधता पर बड़ा सवाल उठ रहा है.
वहीं, विश्वविद्यालय प्रशासन ने सभी आरोपों से इनकार किया है. रजिस्ट्रार डॉ. एस. एस. तोमर ने कहा “हर खरीद और भुगतान सरकारी नियमों और टेंडर प्रक्रिया के तहत हुआ है.” उन्होंने यह भी दावा किया कि परियोजना पूरी तरह पारदर्शी है और इसके तहत किसानों और युवाओं को ट्रेनिंग दी जा रही है.





