झारखंड के इस गांव में इंसान और सुअर आज भी पीते हैं एक ही गड्ढे का पानी, VIDEO देख खुद को कंट्रोल नहीं कर पाए CM हेमंत
झारखंड के कोडरमा जिले के काली पहाड़ी गांव से सामने आए एक वायरल वीडियो ने पूरे सिस्टम को झकझोर दिया, जहां ग्रामीण और जंगली सूअर एक ही गड्ढे का गंदा पानी पीने को मजबूर थे. वीडियो वायरल होने के बाद मुख्यमंत्री Hemant Soren ने तुरंत कार्रवाई के निर्देश दिए.
सोशल मीडिया के इस दौर में अब कोई भी दर्द ज्यादा दिनों तक छिपा नहीं रह पाता. कभी किसी सड़क पर भूख से तड़पता बच्चा कैमरे में कैद हो जाता है, तो कहीं अस्पताल के बाहर इलाज के इंतजार में दम तोड़ती जिंदगी. लेकिन झारखंड के कोडरमा जिले से सामने आई एक तस्वीर ने लोगों को अंदर तक हिला दिया. यह तस्वीर सिर्फ गरीबी की नहीं थी… यह तस्वीर उस मजबूरी की थी, जहां इंसान और जंगली सूअर एक ही गड्ढे का गंदा पानी पीने को मजबूर थे.
मामला कोडरमा जिले के मरकच्चो प्रखंड की डगरनवां पंचायत के आदिवासी टोला काली पहाड़ी का है. यहां रहने वाले करीब 100 से ज्यादा ग्रामीणों के पास पीने के साफ पानी तक की व्यवस्था नहीं थी. गांव की महिलाएं हर दिन कई किलोमीटर पहाड़ी रास्ता पार कर गड्ढा खोदकर पानी निकालती थीं और उसी पानी से पूरा परिवार गुजारा करता था.
जब वायरल हुई दर्द की तस्वीर
सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में देखा गया कि गांव की महिलाएं एक छोटे से चुआं यानी गड्ढे से पानी भर रही हैं. उसी गंदे पानी को पास में खड़ा एक जंगली सूअर भी पी रहा था. यह नजारा देखकर लोग सन्न रह गए. जिस पानी को जानवर पी रहे थे, उसी पानी से गांव के बच्चे प्यास बुझा रहे थे, उसी पानी से खाना बन रहा था और उसी पानी से जिंदगी चल रही थी. वीडियो सामने आने के बाद पूरे प्रशासन में हड़कंप मच गया. मामला मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन तक पहुंचा और उन्होंने तुरंत कोडरमा डीसी को कार्रवाई के निर्देश दिए.
कई सालों से मूलभूत सुविधाओं से दूर था गांव
काली पहाड़ी और चटनिया दह में करीब 10 परिवार रहते हैं. लेकिन हैरानी की बात यह है कि आजादी के इतने साल बाद भी यहां सड़क, बिजली और साफ पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंच पाई थीं. गांव के लोगों का कहना है कि सबसे ज्यादा परेशानी तब होती थी, जब कोई बीमार पड़ जाता था. न अस्पताल पहुंचने का रास्ता आसान, न पीने के पानी का इंतजाम. गर्मी के दिनों में हालात और भयावह हो जाते थे. महिलाएं सुबह होते ही पानी की तलाश में निकल जाती थीं और उनका पूरा दिन सिर्फ पानी जुटाने में गुजर जाता था.
एक किलोमीटर दूर से सिर पर ढोकर लाया जाता था पानी
गांव की महिलाएं अपने सिर पर बर्तन रखकर लगभग एक किलोमीटर दूर पहाड़ी और जंगल के रास्तों से होकर सोती नाला तक पहुंचती थीं. वहां पहले गंदे पानी से बर्तन साफ किए जाते, फिर मिट्टी खोदकर छोटा सा गड्ढा बनाया जाता, ताकि उसमें थोड़ा पानी जमा हो सके.
- वही पानी फिर घर लाया जाता था.
- उसी पानी से बच्चे प्यास बुझाते थे.
- उसी पानी से खाना पकता था.
- और उसी पानी से जिंदगी चलती थी.
बरसात के मौसम में हालात और खराब हो जाते थे. नाले और गड्ढों में जमा गंदे पानी को छानकर पीना मजबूरी बन जाता था.
मुख्यमंत्री के आदेश के बाद बदली तस्वीर
जैसे ही यह मामला सामने आया, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने तुरंत अधिकारियों को कार्रवाई के निर्देश दिए. इसके बाद प्रशासन हरकत में आया और कुछ ही घंटों में गांव में ट्यूबवेल लगाने का काम पूरा कर दिया गया. कोडरमा उपायुक्त ने जानकारी देते हुए कहा कि काली पहाड़ी में अब शुद्ध पेयजल की व्यवस्था सुनिश्चित कर दी गई है.




