जिस Newsclick पर लगा था चीनी फंडिंग का आरोप, कोर्ट से राहत, क्या था पूरा मामला, HC ने क्यों कहा- 'कानून का घोर दुरुपयोग'
न्यूजक्लिक पर चीनी फंडिंग, एफडीआई उल्लंघन और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों पर दिल्ली हाईकोर्ट ने राहत दी. जानिए पूरा मामला और कोर्ट की अहम टिप्पणी.
कभी चीन समर्थित प्रचार और संदिग्ध विदेशी फंडिंग के आरोपों के कारण राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया डिजिटल न्यूज पोर्टल NewsClick अब एक बड़े कानूनी फैसले के चलते फिर सुर्खियों में है. दिल्ली हाईकोर्ट ने न्यूजक्लिक और उसके संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ दर्ज एफआईआर तथा उससे जुड़े प्रवर्तन निदेशालय (ED) के मनी लॉन्ड्रिंग मामले को रद्द कर दिया. अदालत ने साफ कहा कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर न तो धोखाधड़ी का मामला बनता है और न ही मनी लॉन्ड्रिंग का, इसलिए इस तरह की आपराधिक कार्रवाई कानून की प्रक्रिया का "घोर दुरुपयोग" है.
क्या था पूरा मामला?
मामले की शुरुआत 2020 में हुई थी, जब सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की शिकायत के आधार पर दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने न्यूजक्लिक के खिलाफ मामला दर्ज किया. आरोप था कि पोर्टल ने अमेरिकी कंपनी Worldwide Media Holdings से प्राप्त विदेशी निवेश का इस्तेमाल निर्धारित नियमों के विपरीत किया और उसके माध्यम से चीन समर्थक नैरेटिव को बढ़ावा दिया गया.
जांच एजेंसियों का दावा था कि विदेशी निवेश की आड़ में प्राप्त धन का उपयोग ऐसे कंटेंट और गतिविधियों के लिए किया गया जो भारत के हितों के विपरीत हो सकते थे. इसी आधार पर मामले ने राजनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सवाल भी खड़े किए.
ED की एंट्री कैसे हुई?
दिल्ली पुलिस की एफआईआर के बाद Enforcement Directorate ने धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत जांच शुरू की. ईडी ने ECIR दर्ज कर यह जांच शुरू की कि कहीं विदेशी फंडिंग के जरिए धन शोधन या अवैध वित्तीय लेनदेन तो नहीं हुआ. जांच के दौरान कंपनी, उसके निदेशकों और वित्तीय लेनदेन की पड़ताल की गई. हालांकि, एजेंसी लंबे समय तक चली जांच में ऐसे ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सकी जो धन शोधन के अपराध को साबित करते हों.
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने कहा कि एफआईआर में लगाए गए आरोपों को यदि पूरी तरह सही भी मान लिया जाए, तब भी भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी) और धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात) के आवश्यक तत्व स्थापित नहीं होते.
अदालत ने कहा कि जांच एजेंसियां यह साबित नहीं कर पाईं कि किसी व्यक्ति को धोखा देकर लाभ प्राप्त किया गया या किसी के साथ आपराधिक विश्वासघात किया गया. इसलिए आपराधिक मुकदमा चलाने का आधार ही नहीं बनता.
FDI उल्लंघन का दावा क्यों नहीं टिका?
कोर्ट ने अपने आदेश में एक महत्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख किया. अप्रैल 2018 में जब संबंधित विदेशी निवेश प्राप्त हुआ था, उस समय डिजिटल न्यूज़ मीडिया में विदेशी निवेश की कोई निर्धारित सीमा लागू नहीं थी. डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म्स में 26 प्रतिशत एफडीआई सीमा सितंबर 2019 में लागू की गई थी. ऐसे में अदालत ने माना कि बाद में बने नियमों के आधार पर पहले किए गए निवेश को स्वतः अवैध नहीं ठहराया जा सकता. इसलिए एफडीआई उल्लंघन का तर्क भी न्यायिक जांच में टिक नहीं पाया.
सबूतों के अभाव में ढहा पूरा मामला
हाईकोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक चली जांच के बावजूद धन के दुरुपयोग, फंड की हेराफेरी या मनी लॉन्ड्रिंग के कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आए. अदालत के अनुसार केवल आशंकाओं या सामान्य आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ आपराधिक मुकदमा जारी नहीं रखा जा सकता. यही कारण है कि कोर्ट ने मूल एफआईआर को रद्द कर दिया. चूंकि PMLA का मामला उसी एफआईआर पर आधारित था, इसलिए ईडी की ECIR भी स्वतः समाप्त हो गई.
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
यह फैसला इस बात की याद दिलाता है कि जांच एजेंसियों द्वारा लगाए गए आरोप और अदालत में अपराध साबित होना दो अलग-अलग चीजें हैं. न्यूज़क्लिक पर गंभीर आरोप लगे, लेकिन अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों की कसौटी पर उन्हें आपराधिक मुकदमे के लिए पर्याप्त नहीं माना. इसी आधार पर दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि मामले को आगे बढ़ाना "कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग" होता.




