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पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है! मोदी को बधाई, ममता का भी नहीं छोड़ा साथ, क्या शत्रुघ्न सिन्हा अभी नहीं खोल रहे अपने पत्ते?

मोदी को बधाई और ममता के प्रति वफादारी के बीच शत्रुघ्न सिन्हा का संदेश चर्चा में है. क्या टीएमसी सांसद अभी अपनी अगली राजनीतिक चाल छिपाकर चल रहे हैं?

TMC MP Shatrughan Sinha Mamata Banerjee Narendra Modi
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भारतीय राजनीति में कुछ नेता ऐसे होते हैं जिनकी पहचान किसी एक पार्टी से नहीं बल्कि उनकी अपनी शैली से बनती है. शत्रुघ्न सिन्हा भी उन्हीं नेताओं में गिने जाते हैं. कभी बीजेपी के स्टार प्रचारक रहे, फिर पार्टी से दूरी बनाई, कांग्रेस का दामन थामा और बाद में तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा पहुंच गए. ऐसे में जब उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके कार्यकाल के 12 साल पूरे होने पर सार्वजनिक रूप से बधाई दी तो राजनीतिक गलियारों में सवाल उठना स्वाभाविक था.

दिलचस्प बात यह रही कि मोदी की तारीफ के कुछ ही समय बाद उन्होंने ममता बनर्जी और टीएमसी के प्रति अपनी निष्ठा भी दोहराई. ऐसे में सवाल यही है कि आखिर शत्रुघ्न सिन्हा की राजनीति का असली संदेश क्या है?

मोदी को बधाई सिर्फ शिष्टाचार या सियासी संकेत?

फिल्म अभिनेता से राजनेता बने शत्रुघ्न सिन्हा ने सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बधाई देते हुए, उन्हें देश और समाज का मित्र तथा मार्गदर्शक बताया. उन्होंने मोदी के लंबे और स्वस्थ जीवन की कामना भी की. सामान्य तौर पर इसे लोकतांत्रिक शिष्टाचार माना जा सकता है, लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल में हर बयान के पीछे राजनीतिक अर्थ तलाशे जाते हैं. खासकर तब, जब बयान देने वाला नेता विपक्षी दल का सांसद हो.

राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में यह ट्वीट सिर्फ बधाई नहीं बल्कि यह संदेश भी था कि शत्रुघ्न सिन्हा ने अपने पुराने रिश्तों के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं किए हैं. आखिर बीजेपी में बिताए गए उनके लंबे राजनीतिक सफर को कोई एक झटके में कैसे भूल सकता है?

वफादारी दोहराने की जरूरत क्यों पड़ी?

मोदी को बधाई देने के बाद जब टीएमसी के भीतर उठापटक और पार्टी में असंतोष की चर्चा तेज हुई तो शत्रुघ्न सिन्हा ने सामने आकर साफ कहा कि वह ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के साथ हैं और आगे भी रहेंगे. उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी आज भी जनता के बीच बेहद लोकप्रिय हैं और उनके पास करीब 41 प्रतिशत वोट शेयर है.

यह बयान सिर्फ समर्थन नहीं था, बल्कि पार्टी के अंदर और बाहर दोनों जगह एक संदेश था. शायद इसलिए उन्होंने एक ही बात अलग-अलग शब्दों में कई बार दोहराई कि "मैं ममता जी और तृणमूल कांग्रेस के साथ हूं", "मैं उनके साथ था" और "मैं आगे भी उनके साथ रहूंगा". राजनीति में जब कोई नेता किसी बात को बार-बार दोहराता है तो अक्सर लोग यह भी पूछते हैं कि आखिर उसे इतनी बार दोहराने की जरूरत क्यों पड़ रही है?

TMC में फूट की चर्चाओं ने बढ़ाई बेचैनी?

पश्चिम बंगाल में टीएमसी के भीतर हाल के दिनों में असहमति की खबरें सामने आई हैं. कुछ नेताओं के बयानों और संगठन के भीतर खींचतान ने विपक्ष को हमला करने का मौका दिया है. ऐसे समय में शत्रुघ्न सिन्हा का बयान पार्टी नेतृत्व के लिए राहत का संदेश माना जा सकता है.

उन्होंने ममता बनर्जी को "स्ट्रीट फाइटर" यानी जुझारू नेता बताया और कहा कि जनता का समर्थन आज भी उनके साथ मजबूती से खड़ा है. लेकिन राजनीति में केवल समर्थन जताना ही काफी नहीं होता, समय और परिस्थितियां भी मायने रखती हैं. इसलिए यह बयान जितना ममता के समर्थन में था, उतना ही उन अटकलों को रोकने की कोशिश भी था जो उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर लगाई जा रही थीं.

शत्रुघ्न सिन्हा सारे विकल्प खुले रखना चाहते हैं?

शत्रुघ्न सिन्हा की राजनीति की सबसे बड़ी खासियत हमेशा यह रही है कि उन्होंने व्यक्तिगत रिश्तों को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर रखा है. यही वजह है कि वह अलग-अलग दलों के नेताओं के साथ सहज दिखाई देते हैं. मोदी की तारीफ और ममता के समर्थन के बीच शायद यही राजनीति छिपी हुई है.

वह न तो बीजेपी के खिलाफ तीखी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं और न ही टीएमसी से दूरी बना रहे हैं. ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या वह फिलहाल किसी राजनीतिक खेमे में पूरी तरह बंधना नहीं चाहते? या फिर यह उनकी पुरानी शैली है, जिसमें हर दरवाजा खुला रखा जाता है और अंतिम फैसला वक्त पर छोड़ दिया जाता है?

क्या अभी अपने पत्ते नहीं खोल रहे?

सबसे बड़ा सवाल यही है. शत्रुघ्न सिन्हा ने साफ कहा है कि उनका पाला बदलने का कोई इरादा नहीं है. लेकिन राजनीति में "फिलहाल" शब्द अक्सर बहुत महत्वपूर्ण होता है. आज जो नेता किसी पार्टी के साथ मजबूती से खड़ा दिखाई देता है, वह कल नई परिस्थितियों में अलग फैसला भी ले सकता है.

फिलहाल शत्रुघ्न सिन्हा का संदेश साफ है- मोदी को सम्मान, ममता को समर्थन और खुद को किसी विवाद से दूर रखना. लेकिन यह भी सच है कि उनके लंबे राजनीतिक अनुभव को देखते हुए शायद वह जानते हैं कि राजनीति में अंतिम पत्ता कब और कैसे खोला जाता है. इसलिए अभी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं दिखती.

इतना जरूर है कि शत्रुघ्न सिन्हा ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह सिर्फ बयान नहीं देते, बल्कि ऐसा बयान देते हैं जिस पर कई दिनों तक राजनीतिक चर्चा चलती रहे.

क्या रहा है सिन्हा का सियासी सफर?

शत्रुघ्न सिन्हा का राजनीतिक करियर भी उनकी फिल्मी पारी की तरह उतार-चढ़ाव और चर्चाओं से भरा रहा है. बॉलीवुड में लोकप्रियता हासिल करने के बाद उन्होंने 1990 के दशक में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का दामन थामा और जल्द ही पार्टी के बड़े चेहरों में शामिल हो गए. बिहार की राजनीति में उनका प्रभाव बढ़ा और वे अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री भी रहे. उन्होंने स्वास्थ्य, जहाजरानी और परिवहन जैसे मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली.

BJP से बढ़ी दूरी, फिर बदला सियासी ठिकाना

समय के साथ शत्रुघ्न सिन्हा और बीजेपी नेतृत्व के बीच मतभेद सामने आने लगे. खासकर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार के दौरान उन्होंने कई मुद्दों पर सार्वजनिक रूप से असहमति जताई. 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने बीजेपी छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया और पटना साहिब से चुनाव लड़ा, हालांकि उन्हें सफलता नहीं मिली.

TMC में नई पारी

इसके बाद 2022 में शत्रुघ्न सिन्हा तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए. टीएमसी ने उन्हें पश्चिम बंगाल की आसनसोल लोकसभा सीट से उपचुनाव में उम्मीदवार बनाया, जहां उन्होंने जीत दर्ज की. 2024 के लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने आसनसोल सीट बरकरार रखी. आज वह टीएमसी के प्रमुख राष्ट्रीय चेहरों में गिने जाते हैं, हालांकि उनकी राजनीतिक शैली ऐसी रही है कि विभिन्न दलों के नेताओं से उनके व्यक्तिगत संबंध लगातार बने रहे हैं.

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