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'ममता' चाहकर भी नहीं कर सकतीं TMC का कांग्रेस में विलय! सबसे बड़ा रोड़ा और खतरा क्या?

ममता बनर्जी चाहकर भी TMC का कांग्रेस में आसानी से विलय नहीं कर सकतीं. जानिए दल-बदल कानून, संगठनात्मक चुनौतियों और राजनीतिक जोखिमों का पूरा गणित.

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पश्चिम बंगाल की राजनीति में समय-समय पर यह चर्चा उठती रही है कि क्या तृणमूल कांग्रेस का Congress में विलय संभव है. लेकिन सवाल सिर्फ राजनीतिक इच्छा का नहीं, बल्कि कानूनी और संगठनात्मक वास्तविकताओं का भी है. टीएमसी कोई निजी संस्था नहीं, बल्कि एक मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है, जिसके सांसदों, विधायकों और संगठनात्मक इकाइयों के अपने अधिकार हैं. ऐसे में यदि पार्टी के भीतर मतभेद मौजूद हों, तो केवल पार्टी नेतृत्व की इच्छा से विलय का रास्ता नहीं खुलता.

ऐसा इसलिए कि दलबदल विरोधी कानून, दो-तिहाई बहुमत की संवैधानिक शर्त, पार्टी संविधान और चुनाव आयोग की भूमिका ऐसे कारक हैं, जो किसी भी संभावित विलय को जटिल बना देते हैं. इसलिए असली सवाल यह नहीं कि ममता बनर्जी क्या चाहती हैं, बल्कि यह है कि क्या उनके पास ऐसा करने के लिए आवश्यक संगठनात्मक, विधायी और संसदीय समर्थन मौजूद हैं.

दरअसल, भारत के कानून में "राष्ट्रीय या राज्य पार्टी के दूसरी पार्टी में विलय" की विधायी प्रक्रिया वैसी नहीं है, जैसी किसी कंपनी के विलय में होती है. वास्तविक लड़ाई चुनाव आयोग की मान्यता, पार्टी संविधान और निर्वाचित प्रतिनिधियों की स्थिति पर होती है.

1. सबसे बड़ा कानूनी रोड़ा क्या?

टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी कांग्रेस में पार्टी का विलय करना भी चाहें तो उनकी राह में सबसे बड़ा रोड़ा संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) यानी दलबदल विरोधी कानून है. पहले दलबदल कानून में "स्प्लिट" (1/3 सदस्य) और "मर्जर" की छूट थी. लेकिन 2003 के 91वें संविधान संशोधन के बाद "स्प्लिट" की छूट खत्म कर दी गई. आज केवल Merger Exception बचा है.

2. दलबदल कानून में मर्जर की शर्त क्या है?

दसवीं अनुसूची के पैरा 4 के अनुसार यदि किसी विधायक दल या संसदीय दल के कम-से-कम दो-तिहाई (2/3) सदस्य दूसरी पार्टी में विलय का निर्णय लेते हैं, तो उन्हें दलबदल के आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता.

यानी लोकसभा में टीएमसी के 2/3 सांसद, राज्यसभा में टीएमसी के 2/3 सांसद और पश्चिम बंगाल विधानसभा में टीएमसी के 2/3 विधायक जिस गुट के पास होगा, वही अलग पार्टी बनाने या पार्टी के माजूदा चुनाव चिन्ह और संगठन पर दावा कर सकता है. यदि इस सीमा से कम संख्या जाती है, तो उस गुट में शामिल सांसद और विधायकों की अयोग्यता का खतरा पैदा हो सकता है.

3. अगर TMC में दो गुट हों तो...

यहीं असली समस्या शुरू होती है. मान लीजि गुट A में ममता समर्थक हैं और गुट बी में ममता विरोधी. यदि गुट A कांग्रेस में विलय चाहता है लेकिन उसके पास 2/3 विधायक या सांसद नहीं हैं, तो दलबदल कानून की सुरक्षा नहीं मिलेगी. यदि गुट B बहुमत में है और विलय का विरोध करता है, तो ममता के लिए केवल राजनीतिक घोषणा कर देना पर्याप्त नहीं होगा.

4. क्या पार्टी संगठन और विधायक दल अलग चीजें हैं?

क्या पार्टी संगठन और विधायक दल अलग चीजें हैं? इसको लेकर भारतीय राजनीति में अक्सर भ्रम होता है. हकीकत यह है कि इसके दो स्तर होत हैं. पहला पार्टी का संगठन यानी पार्टी अध्यक्ष, कार्यसमिति, राष्ट्रीय परिषद, राज्य इकाई आदि. दूसरा विधायी दल यानी सांसद और विधायक. किसी दल का संगठन विलय का प्रस्ताव पारित कर दे, तब भी विधायी दल के सदस्यों की स्थिति अलग प्रश्न बन जाती है. इसलिए केवल पार्टी अध्यक्ष की घोषणा से मामला खत्म नहीं होता.

5. चुनाव आयोग की भूमिका कहां आती है?

यदि पार्टी का बड़ा हिस्सा विलय का दावा करे और दूसरा गुट विरोध करे, तो मामला चुनाव आयोग तक पहुंच सकता है. शिवसेना के मामले में यही विवाद सामने आया था. लोज जनशक्ति पार्टी के मामले में भी यही प्रश्न उठा था.

सवाल यह है कि पार्टी में दो गुट होने पर अहम सवाल यह उठ खड़ा होता है कि असली पार्टी कौन है? पार्टी का संविधान क्या कहता है? संगठन का बहुमत किसके साथ है? सांसद-विधायक किसके साथ हैं? चुनाव आयोग ऐसे मामलों में पार्टी के दस्तावेज, संगठनात्मक चुनाव, पदाधिकारियों की सूची और समर्थन का परीक्षण करता है.

6. अधिकांश सांसद, विधायक और संगठन ममता के खिलाफ हों तो...

अगर तृणमूल कांग्रेस के अधिकांश सांसद, विधायक और संगठन ममता के खिलाफ हों तो व्यावहारिक स्थिति उलटी हो जाती है. यदि अधिकांश सांसद विरोध में हों या अधिकांश विधायक विरोध में हों या अधिकांश संगठनात्मक पदाधिकारी विरोध में हों, तो केवल अध्यक्ष होने के आधार पर ममता पूरे दल को कांग्रेस में नहीं मिला सकतीं. ऐसी स्थिति में चुनौती यह होगी कि "टीएमसी का वैध निर्णय" किसे माना जाए.

7. असल कानूनी खतरा क्या?

सबसे बड़ा रोड़ा कोई "मर्जर प्रतिबंध कानून" नहीं है. असल रोड़ा है, पार्टी संविधान में निर्धारित निर्णय प्रक्रिया. निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए दसवीं अनुसूची (दलबदल कानून). दो तिहाई बहुमत की शर्तें. विवाद होने पर चुनाव आयोग द्वारा असली पार्टी की पहचान का प्रश्न.

यानी यदि ममता के पास संगठन, सांसदों और विधायकों का निर्णायक समर्थन न हो, तो केवल पार्टी अध्यक्ष होने के आधार पर टीएमसी को कांग्रेस में विलय कर देना कानूनी और व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन हो जाएगा. यही वह बिंदु है जहां दलबदल कानून और संगठनात्मक वैधता उनकी राह में सबसे बड़ा संस्थागत बाधा है. इसके बावजूद अगर वह टीएमसी का कांग्रेस में विलय का एलान करती हैं तो, उनके समर्थक विधायक दो तिहाई बहुमत न होने पर संबंधित सदन यानी सांसद होने की स्थिति में लोकसभा और राज्यसभा और विधायकों को आयोग्य करार दिया जा सकता है.

हालांकि, ममता या उनके गुट के किसी नेता ने टीएमसी का कांग्रेस में विलय को लेकर आधिकारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन वो ऐसा करना भी चाहें तो कानूनी बाध्यताओं की वजह से वह, वैसा नहीं कर सकती.

ऐसा इसलिए कि ममता विरोधी गुट के ऋतब्रत बनर्जी ने विधानसभा गुट अलग बनाने की सूचना स्पीकर को दे चुके हैं. स्पीकर ने उन्हें अलग गुट का दर्जा भी दे दिया है. इसी तरह कि टीएमसी सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने लोकसभा स्पीकर को 20 सांसदों के समर्थन का लेटर दे चुकी है. राज्यसभा में ममता विरोधी गुट के नेता भी इसी तरह का लेटर भेजने की रणनीति पर काम कर रहा है.

ऋतब्रत बनर्जी का दावा है कि बंगाल के नगर निगमों, नगपालिकाओं, जिला पंचायतों और पार्टी संगठन के अधिकांश अधिकारी व सदस्य उनके साथ हैं. ऐसे में ममता बनर्जी की ओर से टीएमसी का कांग्रेस में विलय की कोशिश उल्टा पड़ सकता है.

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